03 अक्तूबर, 2011

कंचनजंघा का स्वर्ग- सिक्किम

गंगटोक : यदि महानगरों की भाग दौड़ से दिल भर गया है तो एक बार सिक्किम घूम लें |यकीं मानिये वहां जाकर वापस लौटने के बाद भी आप अपने तो सिक्किम के सहर में बंधा महसूस करेंगे | हमारे देश के सबसे छोटे राज्यों में शुमार सिक्किम हिमालय के पूर्वी छोर पर स्थित है।
हिमालय से करीब होने के कारण यहाँ वर्ष भर मौसम बहुत ही खूबसूरत होता है| सिक्किम के निवासी कंचनजंघा पर्वत को देवता की तरह पूजते हैं।सिक्किम का स्थानीय नाम डेनजोंग है जिसका अर्थ होता है चावल की घाटी।चावल यहां की मुख्य फसल है। लेकिन सिक्किम सबसे ज्यादा जिस चीज के लिये जाना जाता है,वह हैं यहां के ऑर्किड जिनकी राज्य में 450 से ज्यादा किस्में होती हैं। डेंड्रोबियम फैमिली का नोबल ऑर्किड यहां का राजकीय फूल है ये दुनियां का सबसे सुन्दर ऑर्किड माना जाता हैं । इसके अलावा दस हजार फुट की ऊंचाई पर मिलने वाले रोडोडेंड्रोन की लगभग 36 किस्में पायी जाती हैं|

सिक्किम में 224 मीटर से लेकर 8590 मीटर तक की ऊंचाई वाले स्थल हैं। बर्फ से ढकी पर्वतों की चोटियां हैं घने जंगल हैं।तो दूसरी ओर धान के हरे-हरे खेत हैं पर्वतों पर उछलती-कूदती अटखेलियाँ करती नदियां भी है।यही वो वजह है जिसके कारण सिक्किम में फल-फूलों, वन्य-प्राणियों आदि की जैव-विविधता देखने को मिलती है|

विश्व में दूसरे किसी भी स्थान पर एक साथ इतनी तरह के जीव-जन्तु देखने को नहीं मिलते।आप यकीन नहीं मानेंगे सिक्किम में पांच सौ से ज्यादा पंछी देखने को मिलतें हैं जिनमें दस फुट के विशालकाय डैने वाले दाढी गिद्ध से लेकर फुदकी,600 से ज्यादा किस्म की तितलियां हैं जिनमें से कई लुप्तप्राय हैं,शामिल हैं। यहाँ के जंगलों में बार्किंग डीयर, रेड पांडा, नीली भेड[भराल], तिब्बती जंगली खच्चर [कयांग] और हिमालयन काला भालू भी आसानी से देखने को मिल जाता है। सिक्किम में सुकून शांति खोजने वालों के लिये शान्ति है और रोमांच का मजा लेने वालों के लिए कदम कदम पर बेशुमार चुनौतियां।


तिस्ता नदी की बेलौस धारा में लाइफ जैकेट पहनकर छोटी सी डोंगी को खेने का अनुभव सोच कर ही सिहरन पैदा कर देता है। तीस्ता और रांगित, दोनों ही नदियां राफ्टिंग के लिये आदर्श हैं। तीस्ता में राफ्टिंग माखा से की जा सकती है, धार में आप सिरवानी व मामरिंग होते हुए रांगपो तक पहुँच सकते हैं।दूसरी ओर रांगित नदी में सिकिप से राफ्टिंग की शुरूआत करके जोरथांग व माजितार के रास्ते मेल्लि तक जाया जा सकता है|

एक खास बात सिक्किम की तीन तरफ की सीमाएं तीन देशों से लगी होने से कई इलाके ऐसे हैं जहां जाने के लिये परमिट की जरुरत होती है।सिक्किम ने तिब्बत के बाद बौद्ध धर्म की सबसे विशाल थाती समेट कर रखी है। रूमटेक जैसे मठ दुनियाभर में विख्यात हैं। अब बताते है आप को कुछ और सिक्किम 1975 में जनमत के द्वारा स्वाधीन भारत में शामिल हुआ। सिक्किम का ज्ञात इतिहास 17वीं सदी के बाद मिलता है जब 1642 ईस्वीं में प्रथम चोग्याल राजा का राज्याभिषेक किया गया। चोग्याल तिब्बती शब्द है, जिसका अर्थ है ‘जो धर्मानुसार शासन चलाये’।

बौद्ध गुरु पदमसम्भव की 135 फुट ऊंची विशाल प्रतिमा यहाँ है पदमसम्भव को सिक्किम का संरक्षक संत भी माना जाता है।दलाई लामा ने 22 अक्टूबर 1997 को इस प्रतिमा का उद्घाटन किया था। करीब साढे चार करोड की लागत से बनी इस प्रतिमा को फरवरी 2004 में लोगों के लिये खोल दिया गया।

सिक्किम के ज्यादातर इलाके में मौसम वर्ष भर रूमानी रहता है| गंगटोक और सिक्किम के अन्य शहरों में सभी तरह के होटल हैं।यहाँ द रॉयल प्लाजा पांच सितारा होटल है। यहां से पर्यटक मनोहारी धान के खेत, बेगवती नदी, ढलवें वन क्षेत्र और कंचनजंघा रेंज की हिम आच्छादित चोटियों का दीदार कर सकते हैं। यहां आपको आधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ पारम्परिक सिक्किमी संस्कृति की महक भी बखूबी मिलेगी। ट्रैकिंग के शौकीनों के लिये भी तमाम सुविधायें हैं।

सिक्किम का अपना कोई हवाई अड्डा नहीं है| नजदीकी एयरपोर्ट पश्चिम बंगाल का बागडोगरा है जो की गंगटोक से 124 किलोमीटर दूर है। लेकिन निराशा की कोई बात नहीं है क्योंकि बागडोगरा से गंगटोक तक के लिये हेलीकॉप्टर सेवा उपलब्ध है।यहाँ से हेलीकॉप्टर दिन में पांच बार उडता है। पांच सवारियों की क्षमता वाला हेलीकॉप्टर गंगटोक पहुंचने में सिर्फ आधा घण्टा लेता है, इसका किराया लगभग डेढ हजार रुपये है। सिक्किम रेल मार्ग से सीधा नहीं जुड़ा है। निकट के रेलवे स्टेशन सिलीगुडी 114 ,न्यू जलपाईगुडी 125 किलोमीटर हैं ये दिल्ली, कोलकाता व गुवाहाटी से दैनिक ट्रेनों से जुडे हैं।

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