03 अक्तूबर, 2011

मरुस्थल में हरे नखलिस्तान सरीखा माउंट आबू

माउंट आबू : राजस्थान जिसे बाकि देश भर के लोग हमारे देश का रेगिस्तान मानते हैं | लेकिन ऐसा नहीं है यहाँ भी सुन्दर झीलें और प्रकृति के वरदान से भरपूर नजारे, हरी-भरी वादियों से सजी-धजी पहाडियां और वन्य जीवों से भरपूर अभ्यारण्य भी हैं। क्या सोच रहें हैं कि हम कुछ गलत बता रहे हैं ,बिलकुल नहीं हम जो भी बता रहें हैं वो 100 प्रतिशत सही हैं राजस्थान में भी है "हिल स्टेशन|"


‘माउण्ट आबू’ राजस्थान का इकलौता हिल स्टेशन है, यही नहीं पड़ोसी प्रान्त गुजरात के लिये भी हिल स्टेशन की कमी को महसूस नहीं होने देता। राजस्थान के दक्षिणी इलाके में गुजरात की सीमा से सटा यह हिल स्टेशन समुद्र से चार हजार फीट की ऊंचाई पर बसा है। माउण्ट आबू कभी राजा-महाराजो का ‘समर रिसॉर्ट’ हुआ करता था।

अरावली पर्वत के दक्षिणी किनारे पर ये हिल स्टेशन अपने ठण्डे मौसम और वानस्पतिक सम्पदा की वजह से देशभर के पर्यटकों का पसंदीदा सैरगाह है ,मरुस्थल में हरे नखलिस्तान का आभास देता है। है। माउंट आबू तक पहुंचने का रास्ता खासा सुन्दर है। माउंट आबू न केवल सैलानियों का स्वर्ग है बल्कि ग्यारहवीं और तेरहवीं शताब्दी की अनूठी और बेजोड स्थापत्य कला के श्रेष्ठतम नमूने दिलवाडा के मन्दिरों में देखे जा सकते हैं। मन्दिरों के कारण ये जैनियों का प्रमुख तीर्थ भी है। जगत विख्यात प्रजापति ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय साधना केन्द्र भी यहीं है। इस से लगी गुजरात सीमा पर अम्बाजी का प्रसिद्ध मन्दिर है।

झीलों के नगर उदयपुर से लगभग 185 किलोमीटर दूर हरी-भरी पहाडियों के मध्य स्थित इस पर्वतीय स्थल के ठण्डे और सुहाने मौसम से आकर्षित होकर पर्यटक यहां खिंचे चले आते हैं। 1219 मीटर ऊंची पहाडी पर स्थित यहां की प्रसिद्ध नक्की झील 800 मीटर लम्बी और चार सौ मीटर चौडी है।मान्यता के अनुसार इस झील को देवताओं ने अपने नाखूनों से खोदा था। माउंट आबू का नाम यहां स्थित प्राचीन मन्दिर अर्बूदा देवी के नाम पर ही पडा है। 450 सीढियों वाले इस मन्दिर में स्थापित अर्बूदा देवी को आबू की रक्षक देवी कहा जाता है।

मान्यता के अनुसार ‘आबू’- ‘हिमालय पुत्र’ के प्रतीक रूप में जाना जाता है जिसकी उत्पत्ति अर्बद से हुई थी, इसने भगवान शिव के पवित्र बैल नन्दी को बलिष्ठ सांप के चंगुल से बचाया था। वशिष्ठ ऋषि उन प्रमुख संतों में से एक थे जिन्होंने पृथ्वी को दैत्यों से बचाने के लिये पवित्र मन्त्रों से यज्ञ करते हुए अग्नि से चार अग्निकुल राजपूत वंशों परमार, परिहार, सोलंकी और चौहान का सृजन किया था। कहा जाता है यह यज्ञ उन्होंने आबू की पहाडी के नीचे स्थित प्राकृतिक झरने के पास किया था। ये झरना गाय के सिर की आकृति वाली पहाडी से निकलता है, इसे गौमुख भी कहते हैं।अरावली पर्वत श्रंखलाओं की सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर पर्वत भी माउंट आबू में ही है जिसकी ऊंचाई 1722 मीटर है।

पर्यटन स्थल

नक्की झील: माउंट आबू में 3937 फुट की ऊंचाई पर स्थित नक्की झील करीब ढाई किलोमीटर के दायरे में पसरी है, इसमें बोटिंग करने का लुत्फ अलग ही है। हरीभरी वादियां, खजूर के वृक्षों की कतारें, पहाडियों से घिरी झील और झील के बीच आइलैंड, कुल मिलाकर देखें तो सारा दृश्य फ़िल्मी लगता है।

सनसेट प्वाइंट: यहां से आप देखिये सूर्यास्त का खूबसूरत नजारा, ढलते सूर्य की सुनहरी रंगत कुछ पलों के लिये पर्वत श्रंखलाओं को स्वर्ण मुकुट पहना देती है। हजारों लोग प्रतिदिन शाम ढलते इस मनोहारी दृश्य का आनन्द लेते हैं। देख कर ऐसा महसूस होता है कि मानों सूर्य आसमान से नीचे गिर रहा है।

हनीमून प्वाइंट: सनसेट प्वाइंट से दो किलोमीटर दूर नवयुगल के लिये यहां हनीमून प्वाइंट बना हुआ है। शाम के वक्त यहां नवयुगलों का जमावड़ा होता है। इसे आंद्रा प्वाइंट के नाम से भी जाना जाता है। हनीमून प्वाइंट से नज़र आने वाले हरेभरे मैदान और घाटियों के दृश्य लोगों को अपने पाश में ले लेते हैं। घाटी के जादुई दृश्य देखकर लोग यहां से हिलना भी पसन्द नहीं करते।

टॉड रॉक: नक्की झील से कुछ दूरी पर ही स्थित टॉड रॉक चट्टान है जिसकी आकृति मेंढक की है |

दिलवाडा जैन मन्दिर: 11वीं से 13वीं सदी के बीच बने संगेमरमर के नक्काशीदार जैन मन्दिर स्थापत्य कला के बेहतरीन नमूने हैं। विमल वासाही और लूणवासाही मन्दिर सबसे पुराने मंदिर हैं।इनकी वास्तुकला की अदभुत कारीगरी देखने लायक है।

गुरू-शिखर: यह अरावली पर्वत की सबसे ऊंची चोटी है। गुरू शिखर समुद्र तल से लगभग 1722 मीटर ऊंचा है। शिखर के नीचे और आसपास का नजारा देखना सैलानियों को एक अलग ही जहां में पहुंचा देता है।

अचलगढ: दिलवाडा से करीब आठ किलोमीटर दूर स्थित इस प्राचीन स्थल में आबू के अधिष्ठाता देव अचलेश्वर महादेव का मन्दिर है। इसमें शिव के पैर के अंगूठे का चिन्ह है, जिसकी पूजा होती है। मन्दिर के सामने पीतल के विशाल नन्दी है। नन्दी से कुछ आगे विशाल त्रिशूल है।

गोमुख : बाजार से करीब ढाई किलोमीटर दूर हनुमान जी का मन्दिर है। इस मन्दिर से करीब 700 सीढियां नीचे उतरने पर वशिष्ठ आश्रम है। यहां पर पत्थर के बने गोमुख से सदा जल बहता है, इस स्थान को गोमुख कहते हैं।

वन्यजीव अभयारण्य: राज्य सरकार ने 228 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य 1960 में घोषित किया गया था। अभयारण्य में वानस्पतिक विविधता, वन्य जीव, स्थानीय व प्रवासी पक्षी आसानी से देखे जा सकते हैं |

राजभवन: माउंट आबू राज्यपाल का ग्रीष्मकालीन मुख्यालय है। गर्मियां शुरू होने के बाद कुछ समय के लिये ये राज्यपाल का ग्रीष्मकालीन कैम्प बन जाता है

कब-कहां-कैसे जाया जाये

यहां पूरे सालभर आया जा सकता है। सर्दियों में ठण्ड आसपास के बाकी मैदानी इलाकों से काफी ज्यादा रहती है। कडाके की सर्दी पडी तो नक्की झील का पानी जम जाता है। सर्दियों के अलावा जायें तो मोटे सूती कपडे में काम चल सकता है। शाम व रात तो पूरे सालभर ठण्डक देगी।

वायु मार्ग : निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर है जोकि 185 किलोमीटर दूर है। अहमदाबाद हवाई अड्डा 235 किलोमीटर की दूरी पर है, जोधपुर हवाई अड्डा 267 किलोमीटर दूर है।

रेल मार्ग: रेलवे स्टेशन आबू रोड है जोकि 28 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। रेलवे स्टेशन दिल्ली-अहमदाबाद लाइन पर है जहां सभी प्रमुख रेलगाडियां रुकती हैं।

सडक मार्ग: देश प्रमुख शहरों से सडक मार्ग द्वारा माउंट आबू पहुंचा जा सकता है। उदयपुर 185 किलोमीटर की दूरी पर है और उदयपुर से ईसवाल, गोगुंदा, जसवंतगढ, पिंडवाडा होते हुए माउंट आबू जाते है। अहमदाबाद से वाया पालनपुर 222 किलोमीटर और वाया अम्बाजी 250 किलोमीटर। जोधपुर से माउंट आबू 267 किलोमीटर, अजमेर 360 किलोमीटर, जयपुर 490 किलोमीटर, दिल्ली 752 किलोमीटर, आगरा 732 किलोमीटर और मुम्बई 751 किलोमीटर है।

कोई टिप्पणी नहीं: