01 जुलाई, 2013

उत्तराखंड त्रासदी: कुलियों, खच्चरों की सुध किसी को नहीं

उत्तराखंड में आए 'हिमालयी सुनामी' के कारण हुई तबाही में सैकड़ों की संख्या में बोझा ढोने वाले कुलियों तथा उनके लगभग 2,000 खच्चर अभी भी लापता हैं। कुछ गैर सरकारी संगठनों का दावा है कि उनमें से कुछ बाढ़ में बह गए तथा कुछ अभी भी फंसे हुए हैं, तथा बचाव करने वाले अधिकारियों की बाट जोह रहे हैं। 

गैर सरकारी संगठनों के अनुसार, इनमें से कुछ लोगों तथा उनके खच्चरों को तुरंत निकाले जाने की जरूरत है, अन्यथा वे भूख के कारण एक धीमी और क्रूर मौत की भेंट चढ़ जाएंगे। इस तरह के एक गैर सरकारी संगठन 'जनादेश' के सचिव लक्ष्मण नेगी ने बताया, "केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनोत्री एवं गंगोत्री वाले चार धाम के अतिरिक्त गौरीकुंड, गोविंदघाट, रुद्रप्रयाग तथा उत्तराखंड के अन्य इलाकों में लगभग 2,000 खच्चर फंसे हुए हैं। बाढ़ के कारण उनकी जान बचाने के लिए या तो उनके मालिकों ने उन्हें छोड़ दिया है या उनके मालिक खुद बह गए हैं और अपने पीछे खच्चरों को छोड़ गए हैं।"

उत्तराखंड में लगभग एक पखवाड़े पहले हुई मानसूनी बारिश के कारण आई भयानक बाढ़ के कारण सैकड़ों लोगों की मौत हो गई है, बल्कि कुछ तो हजारों के मरने की बात भी कर रहे हैं। राहत एवं बचाव कर्मियों ने अब तक राज्य से एक लाख से भी अधिक लोगों को सुरक्षित बचा लिया है, तथा अभी भी कुछ लोग फंसे हुए हैं।

नेगी ने बताया कि राज्य के अधिकारियों का पूरा ध्यान तीर्थयात्रियों एवं पर्यटकों को ही बचाने पर है तथा स्थानीय लोगों के बचाव कार्य के प्रति वे जरा भी चिंतित नहीं हैं। नेगी ने बताया, "गोविंदघाट में सबसे बुरा हाल है। मैंने सुना है कि वहां सैकड़ों की संख्या में खच्चर फंसे हुए हैं। अधिकारियों को उनके बारे में विचार करना चाहिए, अन्यथा हमें उनकी ठठरियां ही मिलेंगी। उन्हें बचाने के लिए सेना का सहयोग लिया जाना चाहिए।"

एक अन्य गैरसरकारी संगठन, पर्वतीय नियोजन एवं विकास संस्थान के चंद्रमोहन ने भी यहीं चिंता व्यक्त की। चंद्रमोहन ने बताया, "मुझे लगता है कि इस बाढ़ प्रभावित इलाके में लगभग 2,500 खच्चर फंसे हुए हैं। बाढ़ प्रभावित इलाकों से भागकर आए गांववालों ने ये बातें बताईं। ऐसी बातें भी सुनने में आई हैं कि अपने खच्चरों के साथ ही रुक गए कुछ लोगों की हालत भूख के कारण बेहद नाजुक है।"

'ऐक्शनएड' की कार्यक्रम अधिकारी बर्षा चक्रबर्ती के अनुसार, खच्चरों के जरिए बोझा ढोने वाले समुदाय राज्य सरकार के अंतर्गत पंजीकृत नहीं हैं। मोटे अनुमान के आधार पर राज्य में बोझा ढोने वाले लगभग 20,000 लोग हैं, जो पर्यटकों को या तो खच्चरों पर या अपनी पीठ पर ढोकर तीर्थस्थलों तक पहुंचाते हैं।

पर्दाफाश से साभार

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