09 अप्रैल, 2016

धरती के गर्भ का पानी हो रहा है जहरीला, यूपी के एक तिहाई जिलों के पानी की गुणवत्ता खराब

लखनऊ: इस बार गर्मी का शुरुआती तेवर अभी से डरा रहा है। कहने को अभी अप्रैल का पहला सप्ताह बीता है लेकिन गर्मी अपने चरम पर है। इसके साथ ही पानी के संकट हर ओर आने लगे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में प्रदूषित जल की वजह से लोग खतरनाक बीमारी की चपेट में है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने यूपी की अखिलेश सरकार और संबंधित प्राधिकरण को भूजल में मौजूद भारी धातुओं की जांच कराए जाने के निर्देश दिए है। यह निर्देश अदालत ने एक याची की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए हैं। बेंच ने सरकार को जिन जिलों में पानी की जाँच के निर्देश दिए हैं उनमें गाजियाबाद, मेरठ, सहारनपुर, बागपत, मुजफ्फरनगर और शामली शामिल हैं।

बागपत जिले के दो गांवों में प्रदूषित पानी की वजह से कैंसर ग्रसित हुए 6 मरीजों की पहचान की यूपी सरकार ने की है। इनमें से तीन की मौत भी हो चुकी है और तीन जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं। इसके अलावा सरकारी प्राधिकरणों के जरिए बागपत जिले में पानी के करीब 331 सैंपल लिए गए थे। इनमें सभी प्रदूषित पाए गए। इस जानकारी के बाद बेंच ने याची की शिकायत पर संबंधित जिलों में भूजल जांच का निर्देश दिया है। जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच ने शुक्रवार को याची डॉ सीवी सिंह के मामले में यह निर्देश दिया।

याची का आरोप है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इन छह जिलों में लेड, मर्करी, कैडमियम जैसे हैवी मेटल के कारण भू-जल प्रदूषित होकर जानलेवा हो गया है। जबकि स्थानीय प्रशासन इस मामले में आंख मूंदे हुए है। बागपत स्थानीय प्रशासन की ओर से एनजीटी में दाखिल किए गए हलफनामे में भी यह स्वीकार किया गया है कि जिले में हिंडन और कृष्णा नदी के किनारे आबादी के बीच हैंडपंप और भूजल के कुल 80 सैंपल लिए गए थे। इनमें 77 से अधिक प्रदूषित पाए गए। मालूम हो कि इससे पहले भी एनजीटी ने बीते वर्ष पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इन छह जिलों में टैंकर के जरिए स्वच्छ पानी मुहैया कराने का आदेश दिया था। साथ ही स्थानीय प्राधिकरणों को जमकर फटकार भी लगाई थी। बावजूद इसके सरकार टैंकर के जरिये सबको शुद्ध पानी मुहैया नहीं करा सकी है।

यूपी के एक तिहाई जनपदों में पीने योग्य नहीं है पानी

पिछले कई वर्षों से कम बारिश के चलते जहाँ एक ओर भूगर्भ जल इकठ्ठा न होने के कारण सूखे के हालात बन गए हैं वहीँ दूसरी ओर जो पानी उपलब्द्ध भी है तो उसकी गुणवत्ता इतनी ख़राब है कि वह पीने योग्य नहीं है। पश्चिमी यूपी के जिलों में जहाँ फ्लोराइड, क्लोराइड और नाइट्रेट की मौजूदगी पानी को जहरीला बना रही है वहीँ पूर्वी यूपी में आर्सेनिक पानी को जहरीला बना रहा है। पस्चिमी यूपी में आगरा के अछनेरा, बिचपुरी, एत्मादपुर और फतेहाबाद विकास खण्ड में फ्लोराइड की मात्रा तय मानक से तीन गुना अधिक पाया गया। वहीँ प्यूरी यूपी के कई जनपदों में तय मानक से कहीं अधिक आर्सेनिक पाया गया।

लोग अपनी जिंदगी की प्यास बुझाने के लिए जाने-अनजाने में आर्सेनिक का जहर पानी के साथ सीधे गटक रहे हैं। इसी कड़ी में सीमावर्ती तराई के जिले बहराइच के 14 विकास खंडों में से 10 विकास खंड के पानी में आर्सेनिक के जहर की पुष्टि जांच के दौरान हो चुकी है। 18 लाख से भी ज्यादा की आबादी इस स्लीपिंग प्वाईजन के प्रकोप का दंस बुरी तरह झेल रही है। इस जहरीले पानी से जहां लोग अपनी प्यास बुझा रहे हैं। वहीं इस जिले की भारी आबादी जहरीले पानी के बेधड़क इस्तेमाल से न सिर्फ गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं बल्कि अपनी जिंदगी बचाने के लिए पीने वाले शुद्ध पानी से ही दिन बदिन मौत के नजदीक जा रहे हैं। हालाकि जल निगम विभाग द्वारा लोगों को इस जहर के प्रकोप से जागरूक करने के लिए कई हाई रिस्क एरिया में लोगों को आगाह करने के लिए आर्सेनिक जहर उगलने वाले हैण्डपम्पों में लाल रंग से निशान लगाकर ऐसे हैंड पम्पों के पानी को न पीने की हिदायद दी जा रही है। उसके बावजूद तमाम लोग मजबूरन प्यास के लिए आर्सेनिक युक्त पानी के इस्तेमाल से गंभीर बीमारी की चपेट में जा रहे हैं।

कानपुर शहर का एक ऐसा मोहल्ला है, जहां 35 साल से लोग एक-एक बूंद पानी के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं, लेकिन इनके इस मर्ज का जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अमले के पास कोई इलाज नहीं है। राखीमंडी में रहने वाले करीब 5 हजार लोग सालों से जनप्रतिनिधियों व अधिकारियों की उपेक्षा का शिकार होकर बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं। करीब पचास वर्ष पहले जूही राखीमंडी में शहर की कई फैक्ट्रियों के ब्वायलर से निकलने वाली राख को डंप किए जाने का काम शुरू किया गया था। इससे क्षेत्र का भूगर्भ प्रदूषित होने से हैंडपंपों व कुंओं से केमिकलयुक्त पानी निकलने लगा। क्षेत्र में संक्रामक बीमारी ने पांव पसारने शुरू कर दिए, जिसमें बीते सालों में कई लोगों की जानें भी चली गईं। जांच में केमिकलयुक्त पानी निकलने से स्वास्थ्य अधिकारियों ने हैंडपंपों में पानी स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होने का बोर्ड लटका दिया था। इसके बाद पानी पीना तो दूर नहाने तक पर रोक लग गई थी।

गर्मी शुरू होते ही जूही राखीमंडी के लोगों को एक बार फिर से बूंद-बूंद पानी की किल्लत सताने लगी है। पूरे दिन हाड़तोड़ मेहनत और फिर दूसरे दिन के लिए पानी का जुगाड़ करना यहां के लोगों की दिनचर्या में शामिल हो गया है। पानी के लिए यह लोग एक-दो से नहीं, बल्कि 36 सालों से मोहताज हैं। जनप्रतिनिधि हों या अधिकारी, सभी इनकी बदहाली को देखने के बाद भी मुंह फेरे हैं। राखी मंडी निवासी राजीव पाल ने बताया कि वो जब पैदा हुए थे, तब भी पानी की समस्या बनी थी, आज 28 साल का हो गया हैं, लेकिन स्वच्छ पानी की सप्लाई नहीं हो पाई है| अमजद भाई ने कहा कि पिछले साल कमिश्नर और डीएम के पास पानी की समस्या की शिकायत लेकर पहुंचे, लेकिन दोनों साहबों ने जल्द समस्या का हल करने की बजाए उन्हें टाल दिया।

एक किलोमीटर दूर स्थित हैंडपंप से पानी लाकर लोग काम चला रहे हैं। जहां हर रोज सुबह से ही लोग पूरे परिवार के साथ पानी के लिए कई घंटे तक लाइन में लगते हैं। जहां से पानी डिब्बों में भरने के बाद ठेले में लादकर ले जाते हैं। इतना सब होने के बाद भी आज तक किसी जन प्रतिनिधि और अधिकारियों को इनकी बदहाली पर तरस नहीं आया। क्षेत्रीय लोगों ने बताया कि बीते विधानसभा चुनाव के दौरान कुछ जनप्रतिनिधियों ने करीब तीन महीने तक पानी के टैंकर लगा दिए थे। चुनाव के बाद शुद्ध पेयजल पाइप लाइन डलवाने की बात कहकर घर-घर पानी पहुंचाने का वादा भी किया था, पर चुनाव खत्म होते ही पाइप लाइन डलवाना तो दूर टैंकरों का क्षेत्र में आना भी बंद हो गया।

राजधानी में पेयजल संकट-

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी पेयजल संकट का सामना लोगों को करना पड़ रहा है। राजधानी के पारा थाना क्षेत्र के अंतर्गत नरपतखेड़ा डूडा निकट सिन्धी कालोनी की 6 साल पुरानी वैध कालोनी है, जिसमें 165 घर में लगभग 4200 लोग रहते हैं। इस कॉलोनी में पानी की आपूर्ति के लिए तीन पम्पिंग स्टेशन बनें हैं, परन्तु आज तक पानी नहीं चालू हुआ न ही इस वैध कालोनी में पानी सप्लाई आई। क्षेत्रीय लोगों की मानें तो तमाम प्रयास होता है। लेकिन असर कुछ भी नहीं होता। विभाग अपना पल्ला झाड़ते हुए कहता हैं कि मुझे हैंडओवर नहीं हुआ तो डूडा कहता है कि मकान देना मेरा काम है, पानी देना नहीं। कुछ ऐसे ही शहर में हजारों लोग पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। रविवार को समाजसेवी प्रताप चन्द्रा की अध्यक्षता में पंचायत हुई, जिसमें सैकड़ों लोग जुटे और सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि यदि जल्द ही पानी न मिला तो आरपार की लड़ाई लड़ी जाएगी। इसके अलावा बक्शी का तालाब और इंटौंजा क्षेत्र में भी सूखे की मार से लोग परेशान हैं। गोमती का भी जलस्तर कम होता जा रहा है।

ग्रामीण इलाकों में 40 फीसदी खराब पड़े हैं हैंडपंप

लखनऊ जनपद के ग्रामीण इलाकों में गर्मी की तपिश बढ़ने के साथ ही पेयजल संकट गहराने लगा है। जाँच में सामने आया है कि आठ ब्लॉक क्षेत्र के करीब 40 फीसदी नलकूप व हैंडपंप खराब पड़े हुए हैं। सिचाईं के लिए नहरों व माइनरों में पानी न होने से गरीब किसान खासा परेशानी झेल रहा है। पेयजल संकट के लिए डीएम ने तीन विभागों की संयुक्त टीम बनाने का निर्देश दिया है। यह टीम क्षेत्र में जाकर खराब पड़े नलकूपों व हैंडपंप का सर्वेक्षण कर सूची तैयार करेगी और जिम्मेदार अभियंता व कर्मचारियों को चिन्हित कर अपनी रिपोर्ट जिलाधिकारी को देंगे। डीएम ने इस कार्य के लिए एक सप्ताह का समय दिया है। जिला पंचायत सदस्यों की माने तो उनका कहना है कि बक्शी का तालाब में 250 नलकूपों में 105, मलिहाबाद में 24 में से 8, माल में 92 में से 40 और सरोजनीनगर में 28 में से 12 नलकूप खराब पड़े हैं।

14 करोड़ में लगेंगे 210 नए हैंडपंप

लखनऊ: गर्मी पर पानी की समस्या से जूझ रहे शहरवासियों को इस साल राहत मिल सकती है। शहर में नगरीय पेजयल कार्यक्रम के तहत कुल 344 नए व रिबोर हैंडपंप लगाए जाएंगे। इसके लिए 114.32 लाख रुपए जल निगम को प्राप्त हो चुके हैं। पहले चरण में इस योजना के तहत दर्जन भर क्षेत्रों में 210 नए व रिबोर योग्य हैंडपंपों का कार्य किया जाएगा। जलकल विभाग से कार्यसूची मिलते ही काम शुरू हो जाएगा। पानी की किल्लत को दूर करने के लिए जल निगम और जल कल विभाग ने कार्ययोजना तैयार की है। प्लानिंग के तहत पंप हाउस लगाने के साथ ही नए हैंडपंप व रिबोर करने योग्य हैंडपंप का काम किया जाएगा।

वित्तीय वर्ष 2015-16 में नगरीय पेयजल कार्यक्रम (जिला योजना सामान्य) के तहत शहर में पेयजल सुविधा के लिए धनराशि जारी की गई है। इस धनराशि में शहर में नए हैंडपंप व रिबोर करने योग्य हैंडपंप का काम किया जाएगा। जल निगम में द्वितीय निर्माण खंड के अधिशासी अभियंता आरके गुप्ता ने इस संबंध में जलकल विभाग के महाप्रबंधक राजीव वाजपेई को पत्र लिखकर खराब हैंडपंपों की सूची मांगी है। इस कार्य के लिए गत वर्ष अगस्त 2015 व फरवरी 2016 में प्रस्ताव भेजा गया था। जलापूर्ति आदि कार्यों के लिए शहर में नए हैंडपंप व रिबोर करने के लिए 114.32 लाख की स्वीकृति मिलने के साथ ही फंड भी जल निगम को प्राप्त हो चुका है।

जल निगम के अधिशासी अभियंता से बजट मिलने की जानकारी प्राप्त हुई है। हमंे खराब हैंडपंपों की सूची देनी है। उन क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाएगी जहां पानी की सबसे ज्यादा जरूरत है। राजीव वाजपेईमहाप्रबंधक, जलकल विभाग
इस धनराशि से कुल 210 नए अथवा रिबोर करने योग्य हैंडपंप लगंेगे। मुख्यमंत्री से प्राप्त शिकायतें, प्रशासन, जन सुविधा केंद्र, तहसील दिवस, आरटीआई तथा महाप्रबंधक जल कल से प्राप्त होने वाली खराब हैंडपंपों की शिकायतों का निस्तारण किया जाएगा। शिकायतों के माध्यम से 74 नए व 270 रिबोर सहित कुल 344 हैंडपम्प की सूची तैयार की गई है। इनमें से प्राथमिकता के आधार पर नगरीय पेजयल कार्यक्रम के तहत प्राप्त धनराशि से काम होंगे।

समझें पानी की कीमत-

अगली जनरेशन को पानी कि किल्लत ना हो इसके लिए हमें आपको अभी से ध्यान देने की जरूरत है। कई इलाके अक्सर इसलिए जलमग्न रहते हैं क्योंकि वहां वॉटर टैंक फुल होने के बाद ट्यूबवेल मशीन को बंद करने वाला कोई नहीं होता। वहीं कुछ इलाके ऐसे भी हैं, जहां पानी के लिए सुबह से ही लाइन लग जाती है। ऐसे में वॉटर वेस्टेज को रोकने की जरूरत है। पानी की बर्बादी पर लगाम लगाएं और व्यर्थ का पानी बहने से बचाने के लिए संकल्प लें।

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