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जन्माष्टमी विशेष: जहां आज भी गोपियों संग रास-लीला रचाते हैं भगवान मुरली मनोहर

उत्तर प्रदेश के वृंदावन शहर के बीचोबीच एक ऐसी वाटिका है जिसमें लोग मानतें हैं कि रात में भगवान श्रीकृष्ण यहां आते हैं और गोपियों के साथ रास-लीला रचाते हैं। ये वन यमुना नदी से भी ज्यादा दूरी पर नहीं है। इस वाटिका को लोग ‘निधि-वन’ के नाम से जानते है। 

मथुरा बृंदावन में स्थित वाटिका निधि वन, जहाँ की मान्यता है की रात श्री कृष्ण गोपियों संग रास लीला करतें हैं। साथ में ये भी मान्यता प्रचलित है कि यहाँ मौजूद पेड़ पौधे रात में गोपियों में बदल जातें हैं। रात्रि के समय निधि वन में कोई प्राणी नहीं रहता है, पशु-पक्षी भी नहीं। लोगों का मानना है कि अगर कोई व्यक्ति इस परिसर में रात्रि में रुक जाता है और भगवान की क्रीड़ा का दर्शन कर लेता है, तो सासारिक बंधन से मुक्त हो जाता है। ऐसे उदाहरण विगत कई वर्षों में देखने में भी आये हैं। इस वन में मौजूद मंदिर में भगवान के स्वागत के लिए आज भी मंदिर के रंग महल में प्रसाद (माखन मिश्री) प्रतिदिन रखा जाता है। 

शयन के लिए पलंग लगाया जाता है। राधारानी के लिए श्रृंगार कि हर वस्तु रखी जाती है। सबको बाहर निकलने का आदेश दे दिया जाता है। रात में मंदिर के दरवाजे पर पांच ताले लगाये जातें हैं। ताकि कोई अंदर न जा सके। सुबह जब मंदिर का दरवाजा खुलता है तो सब कुछ अस्त व्यस्त मिलता है देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ निश्चित ही कोई रात्रि विश्राम करने आया तथा प्रसाद (माखन मिश्री) भी ग्रहण किया है। लोगों का कहना है कि रात में बांसुरी और घुंघुरुओं कि आवाज सुनाई देती है। 

निधि वन कहने से इंसान के मस्तिष्क में किसी जंगल का दृश्य सामने आता है लेकिन ये कोई जंगल नहीं है। वास्तव में यहाँ आने पर वन जैसा ही दृश्य देखने को मिलते हैं, यहाँ के वृक्ष आज भी अपनी पौराणिकता को दर्शाते हैं। इन वृक्षों को देखने से आभास होता है कि यह अति प्राचीनकाल से स्थापित वृक्ष हैं। इस प्रकार के वृक्ष वृन्दावन में निधि वन, सेवाकुंज एवं तटिय स्थान पर ही देखने को मिलते हैं, इन वृक्षों की खासियत है कि इनमें से किसी भी वृक्ष के तने सीधे नहीं मिल पायेंगे तथा इन वृक्षों की डालिया नीचे की ओर झुकी हुई प्रतीत होती हैं। मान्यता है कि ये वृक्ष भगवान को प्रणाम करने की मुद्रा में हमेशा झुके रहते हैं। इन वृक्षों के बारे में शास्त्रों गोपी रूप से वर्णन किया गया है।

इस वन में कई साधू संतों की समाधियां मौजूद हैं जो अपने प्रिय भगवान के एक दर्शन-मात्र करना चाहते थे। मौत से पहले उन्होने दर्शन कर भी लिए हो, कौन जानता है। लेकिन लोगों की मान्यता है कि उनकी मौत भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन के बाद ही होती होगी। यही वजह है कि उन सभी लोगों की समाधि इसी वन में बनाई गई है। इस निधि वन में आकर अजीब अनुभूति होती है। एक बार आने के बाद यहाँ बार-बार आने कि इच्छा जागृत हो जाती है।

ब्रम्हा जी ने यहां की थी सृष्टि की रचना

महान क्रांतिकारी तात्या टोपे, नाना राव पेशवा और झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई जैसे क्रांतिकारियों की यादें अपने दामन में समेटे हुए है बिठूर। यह ऐसा दर्शनीय स्थल है जिसे ब्रह्मा, महर्षि वाल्मीकि, वीर बालक ध्रुव, माता सीता, लव कुश ने किसी न किसी रूप में अपनी कर्मस्थली बनाया। रमणीक दृश्यों से भरपूर यह जगह सदियों से श्रद्धालुओं और पर्यटकों को लुभा रही है। तो आइये शुरू करते हैं बिठूर की यात्रा| 

सन् 1857 में भारतीय स्वतंत्रता का प्रथम संग्राम बिठूर में ही प्रारम्भ हुआ था। यह शहर उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से 22 किलोमीटर दूर कन्नौज रोड़ पर स्थित है। पवित्र पावनी गंगा के किनारे बसा बिठूर का कण-कण नमन के योग्य है। यह दर्शनीय इसलिए है कि महाकाव्य काल से इसकी महिमा बरकरार है। यह महर्षि वाल्मीकि की तपोभूमि है। यह क्रांतिकारियों की वीरभूमि है। यहाँ महान क्रांतिकारी तात्या टोपे ने क्रांति मचा दी थी। यहाँ नाना साहब पेशवा की यादें खण्डहरों के बीच बसती हैं। यही नहीं तपस्वी बालक ध्रुव और उसके पिता उत्तानपाद की राजधानी भी कभी यहीं पर थी। 

कहते हैं कि 'ध्रुव का टीला' ही उस समय ध्रुव के राज्य की राजधानी थी। आज राजधानी की झलक देखने को नहीं मिलती लेकिन ऐतिहासिकता की कहानी यहाँ के खण्डहर सुनाते हैं। बिठूर के किनारे से होकर गंगा कल-कल करती बहती है। सुरम्यता का आलम यह है कि जिधर निकल जाइए, मन मोहित हो जाता है। कहते हैं कि इसी स्थान पर भगवान राम ने सीता का त्याग किया था और यहीं संत वाल्मीकि ने तपस्या करने के बाद पौराणिक ग्रंथ रामायण की रचना की थी। 

बिठूर के विषय में कहा जाता है कि ब्रह्मा ने वहीं पर सृष्टि रचना की थी और सृष्टि रचना के पश्चात अश्वमेध यज्ञ किया था उस यज्ञ के स्मारक स्वरूप उन्होंने घोड़े की एक नाल वहां स्थापित की थी, जो ब्रह्मावर्त घाट के ऊपर अभी तक विद्यमान है। इसे ब्रह्मनाल या ब्रह्म की खूंटी भी कहते हैं क्योंकि महर्षि वाल्मीकि की यह तपोभूमि है, इसलिए इसका राम कथा से जुड़ाव स्वाभाविक है। धोबी के ताना मारने के बाद जब राजा राम ने सीता को राज्य से निकाला तो उन्हें यहाँ पर वाल्मीकि के आश्रम में शरण मिली थी। यहीं पर उनके दोनों पुत्र लव और कुश का जन्म हुआ। 

यही नहीं जब मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने अश्वमेघ यज्ञ किया तो उनके द्वारा छोड़े गए घोड़े को यहीं पर लव-कुश ने पकड़ा। ज़ाहिर है कि इस तरह यह भूमि प्रभु राम और माता सीता के आख़िरी मिलन की भूमि है। भगवान शंकर ने मां पार्वती देवी को इस तीर्थस्थल का महात्म्य समझाते हुए कहा है-

ब्रह्मवर्तस्य माहात्म्यं भवत्यै कथितं महत्।
यदा कर्णन मात्रेण नरो न स्यात्स्नन्धयः।

यही नहीं, सन 1818 में अंतिम पेशवा बाजीराव अंग्रेज़ों से लोहा लेने का मन बनाकर बिठूर आ गए। नाना साहब पेशवा ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ क्रांति का बिगुल इसी ज़मीन पर बजाया। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का शैशवकाल यहीं बीता। इस ऐतिहासिक भूमि को तात्या टोपे जैसे क्रांतिकारियों ने अपने ख़ून से सींचकर उर्वर बनाया है। यहाँ क्रांतिकारियों की गौरव गाथाएँ आज भी पर्यटक सुनने आते हैं।

बिठूर के दार्शनिक स्थल निम्न प्रकार है| पहले तो बात करते हैं वाल्मीकि आश्रम की| हिन्दुओं के लिए इस पवित्र आश्रम का बहुत महत्व है। यही वह स्थान है जहां रामायण की रचना की गई थी। संत वाल्मीकि इसी आश्रम में रहते थे। राम ने जब सीता का त्याग किया तो वह भी यहीं रहने लगीं थीं। इसी आश्रम में सीता ने लव-कुश नामक दो पुत्रों को जन्म दिया। यह आश्रम थोड़ी ऊंचाई पर बना है, जहां पहुंचने के लिए सीढि़यां बनी हुई हैं। इन सीढि़यों को स्वर्ग जाने की सीढ़ी कहा जाता है। आश्रम से बिठूर का सुंदर दृश्य देखा जा सकता है।

ब्रह्मावर्त घाट- इसे बिठूर का सबसे पवित्रतम घाट माना जाता है। भगवान ब्रह्मा के अनुयायी गंगा नदी में स्नान करने बाद खड़ाऊ पहनकर यहां उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा ने यहां एक शिवलिंग स्थापित किया था, जिसे ब्रह्मेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा यहाँ एक लाल पत्थरों से बना हुआ घाट है जिसे पाथर घाट कहते हैं| अनोखी निर्माण कला के प्रतीक इस घाट की नींव अवध के मंत्री टिकैत राय ने डाली थी। घाट के निकट ही एक विशाल शिव मंदिर है, जहां कसौटी पत्थर से बना शिवलिंग स्थापित है।

यहाँ एक टीला भी है जिसे आज ध्रुव टीला के नाम से जाना जाता है| कहते हैं कि बालक ध्रुव ने एक पैर पर खड़े होकर तपस्या की थी। ध्रुव की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे एक दैवीय तारे के रूप में सदैव चमकने का वरदान दिया था। इन धार्मिक स्थानों के अलावा भी बिठूर में राम जानकी मंदिर, लव-कुश मंदिर, हरीधाम आश्रम, जंहागीर मस्जिद और नाना साहब स्मारक अन्य दर्शनीय स्थल हैं।

बाबरी मस्जिद विध्वंस की 21वीं बरसी पर विशेष.......

6 दिसम्बर 1992 के दिन एक ऐसी बर्बर घटना घटी जिसे याद करके आज भी हमारी रूह कांप उठती है। धर्म के नाम पर जो कुछ हुआ वो न भुलाये जाने वाली घटना बन कर रह गई। लोग लड़े-भिड़े, कत्लेआम हुए, आज तक उन घावों के दर्द बरकरार हैं। और आज-तक उस घटना से उत्पन्न टकराव जारी है… आज के दिन कोई अपने आन मान की लड़ाई के लिए कोई शौर्य दिवस मनाता है, तो कोई कलंक दिवस, लेकिन जिन पर वो सब गुजरा उनसे पूछें वो …वो क्या मनाते हैं?…क्या सोचते हैं?…आज उस अमानुशिक घटना की 21 बरसी है।

गंगा-जमुनी तहजीब का संगम है अयोध्या, हिंदुओं के लिए रामलला, हनुमंतलाल और नागेश्वरनाथ जैसे तीर्थ का स्थान, कुंभ की नगरी यहीं मुस्लिमों के पैगंबरों, बौद्धों के धर्मगुरुओं और जैनियों के तीर्थकरों का केंद्र भी यहीं हैं…इस धरती ने समय-समय पर विदेशी के कई घाव झेले फिर भी शान से खड़ा रहा। लेकिन इस धरती के अपनों ने ही उसे ऐसे घाव दे डाले जिसके नासूर आज भी कायम हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ देश में साम्प्रदायिक दंगे हुए। आजादी मिली तो दंगे, आजाद हुए तो दंगे। वर्ष 1947 में देश आजाद होने के साथ भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय हिन्दू- मुस्लिम एक दूसरे के खून के प्यासे बन गए। वर्ष 1984 में दो सिक्खों की गलती की सजा पूरे सिक्ख समुदाय को भुगतनी पड़ी और देश में नरसंहार हुआ। 1984 के जख्म के नासूर भरे नहीं थे कि 1992 में एक बार फिर देश के सीने पर एक घाव दे दिया गया। हिन्दू-मुसलमान आमने-सामने थे। एक बार फिर धर्म के आग में मासूमों की बलि चढ़ाई गई।

इसके बाद बांग्लादेश और पाकिस्तान समेत देश के भी कई हिस्सों में बेगुनाह हिन्दुओं का खून बहा। इस घटना कि सबसे बड़ी विडंबना ये थी कि इस नरसंहार में वह भी मारे गए जिन्हें यह तक मालूम न था कि अयोध्या का असली मुद्दा क्या है? बाबरी मस्जिद क्या है? फिर गुजरात में दंगे हुए। कब तक देश को धर्म के नाम पर इन दंगों को झेलना पड़ेगा।

अयोध्या की कहानी

1528: पांच सौ साल पहले अयोध्या में एक ऐसे स्थल पर मस्जिद का निर्माण किया गया जिसे हिंदू भगवान राम का जन्म स्थान मानते हैं। समझा जाता है कि मुग़ल सम्राट बाबर ने ये मस्जिद बनवाई थी जिस कारण इसे बाबरी मस्जिद के नाम से जाना जाता था।

1853: फिर दंगा हुआ हिंदुओं का आरोप कि भगवान राम के मंदिर को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ। इस मुद्दे पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पहली हिंसा हुई।

1859: ब्रिटिश सरकार ने तारों की एक बाड़ खड़ी करके विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिदुओं को अलग-अलग प्रार्थनाओं की इजाजत दे दी।

1885: मामला पहली बार अदालत में पहुंचा। महंत रघुबर दास ने फैजाबाद अदालत में बाबरी मस्जिद से लगे एक राम मंदिर के निर्माण की इजाजत के लिए अपील दायर की।

23 दिसंबर, 1949: करीब 50 हिंदुओं ने मस्जिद के केंद्रीय स्थल पर कथित तौर पर भगवान राम की मूर्ति रख दी। इसके बाद उस स्थान पर हिंदू नियमित रूप से पूजा करने लगे। मुसलमानों ने नमाज पढ़ना बंद कर दिया।

5 दिसम्बर, 1950: महंत परमहंस रामचंद्र दास ने हिंदू प्रार्थनाएं जारी रखने और बाबरी मस्जिद में राममूर्ति को रखने के लिए मुकदमा दायर किया। मस्जिद को ‘ढांचा’ नाम दिया गया।

17 दिसम्बर, 1959: निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल हस्तांतरित करने के लिए मुकदमा दायर किया।

18 दिसम्बर, 1961: उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया।

1984: विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने बाबरी मस्जिद के ताले खोलने और राम जन्मस्थान को स्वतंत्र कराने व एक विशाल मंदिर के निर्माण के लिए अभियान शुरू किया।

1 फरवरी, 1986: फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिदुओं को पूजा की इजाजत दी। ताले दोबारा खोले गए। नाराज मुस्लिमों ने विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया।

11 नवंबर 1986 को विश्व हिंदू परिषद ने विवादित मस्जिद के पास की ज़मीन पर गड्ढे खोदकर शिला पूजन किया।

1987 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में एक याचिका दायर की कि विवादित मस्जिद के मालिकाना हक़ के लिए ज़िला अदालत में चल रहे चार अलग अलग मुक़दमों को एक साथ जोड़कर उच्च न्यायालय में उनकी एक साथ सुनवाई की जाए।

जून 1989: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने विहिप को औपचारिक समर्थन देना शुरू करके मंदिर आंदोलन को नया जीवन दे दिया।

जुलाई, 1989: भगवान रामलला विराजमान नाम से पांचवा मुकदमा दाखिल किया गया

9 नवम्बर, 1989: तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने बाबरी मस्जिद के नजदीक शिलान्यास की इजाजत दी।

25 सितम्बर, 1990: भाजपा अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली, जिसके बाद साम्प्रदायिक दंगे हुए।

नवम्बर 1990: आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया। भाजपा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया। सिंह ने वाम दलों और भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई थी। बाद में उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

अक्टूबर 1991: उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार ने बाबरी मस्जिद के आस-पास की 2.77 एकड़ भूमि को अपने अधिकार में ले लिया।

6 दिसम्बर, 1992: हजारों की संख्या में कार सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढाह दिया, जिसके बाद सांप्रदायिक दंगे हुए। जल्दबाजी में एक अस्थाई राम मंदिर बनाया गया। प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने मस्जिद के पुनर्निर्माण का वादा किया।

16 दिसम्बर, 1992: मस्जिद की तोड़-फोड़ की जिम्मेदार स्थितियों की जांच के लिए एम.एस. लिब्रहान आयोग का गठन हुआ।

जनवरी 2002: प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यालय में एक अयोध्या विभाग शुरू किया, जिसका काम विवाद को सुलझाने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों से बातचीत करना था।

अप्रैल 2002: अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर उच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू की।

मार्च-अगस्त 2003: इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का दावा था कि मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष होने के प्रमाण मिले हैं। मुस्लिमों में इसे लेकर अलग-अलग मत थे।

सितम्बर 2003: एक अदालत ने फैसला दिया कि मस्जिद के विध्वंस को उकसाने वाले सात हिंदू नेताओं को सुनवाई के लिए बुलाया जाए।

अक्टूबर 2004: आडवाणी ने अयोध्या में मंदिर निर्माण की भाजपा की प्रतिबद्धता दोहराई।

जुलाई 2005: संदिग्ध इस्लामी आतंकवादियों ने विस्फोटकों से भरी एक जीप का इस्तेमाल करते हुए विवादित स्थल पर हमला किया। सुरक्षा बलों ने पांच आतंकवादियों को मार गिराया।

जुलाई 2009: लिब्रहान आयोग ने गठन के 17 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी।

28 सितम्बर 2010: सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहबाद उच्च न्यायालय को विवादित मामले में फैसला देने से रोकने वाली याचिका खारिज करते हुए फैसले का मार्ग प्रशस्त किया।

30 सितम्बर 2010: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

6 दिसम्बर 1992 कैसे क्या हुआ..

1992: विश्व हिंदू परिषद, शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया। इसके परिणामस्वरूप देश भर में हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे जिसमें 2000 से ज़्यादा लोग मारे गए।

5 दिसंबर, 1992 लाखों की संख्या में भीड़ इकट्ठा हो रही है। दूर दूर से लोग इसमें हिस्सा लेने अयोध्या पहुँच रहें हैं। कारसेवको का नारा बार-बार गूंज रहा है... मिट्टी नहीं सरकाएंगे, ढांचा तोड़ कर जाएंगे। ये तैयारी एक दिन पहले की गयी थी। कारसेवकों की भीड़ ने अगले दिन 12 बजे का वक्त तय किया कारसेवा शुरू करने का। सबके चेहरे पर जोश और एक जूनून देखा जा रहा था।

6 दिसंबर, सुबह 11 बजे: सुबह 11 बजते ही कारसेवकों के एक बड़ा जत्था सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश करता है, लेकिन उन्हें वापस पीछे धकेला दिया जाता है। तभी वहां नजर आतें हैं वीएचपी नेता अशोक सिंघल, कारसेवकों से घिरे हुए और वो उन्हें कुछ समझाते हैं। थोड़ी ही देर में उनके साथ बीजेपी के बड़े नेता मुरली मनोहर जोशी भी इन कारसेवकों से जुड़ जातें हैं। तभी भीड़ में एक और चेहरा नजर आता है लालकृष्ण आडवाणी का। सभी सुरक्षा घेरे के भीतर मौजूद हैं और लगातार बाबरी मस्जिद की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। कारसेवकों के नारे वातावरण में गूंज रहें हैं। सभी मंदिर के दरवाजे पर पहुंचतें हैं और मंदिर के दरवाजे को तोड़ने की कोशिश करतें हैं| पहली बार मस्जिद का बाहरी दरवाजा तोड़ने की कोशिश की जाती है लेकिन पुलिस इनके कोशिश को नाकाम करती है।

6 दिसंबर, सुबह साढ़े 11 बजे: मस्जिद अब भी सुरक्षित थी। आज के दिन ऐसी थी जो सदियों तक नासूर बने रहने वाली थी। तभी वहां पीली पट्टी बांधे कारसेवकों का आत्मघाती दस्ता आ पहुंचता है। उसने पहले से मौजूद कारसेवकों को कुछ वो कुछ समझातें हैं। सबके चेहरे के भाव से लगता है कि वो किसी बड़ी घटना के लिए सबको तैयार कर रहे हैं। तभी एक चौकाने वाली घटना होती है। बाबरी मस्जिद की सुरक्षा में लगी पुलिस की इकलौती टुकड़ी धीरे धीरे बाहर निकल रही है। न कोई विरोध, न मस्जिद की सुरक्षा की परवाह। पुलिस के निकलते ही कारसेवकों का दल मस्जिद के मेन गेट की तरफ बढ़ता है| दूसरा और बड़ा धावा बोला दिया जाता है। जो कुछ पुलिसवाले वहां बचे रह गए थे वो भी पीठ दिखाकर भाग खड़े होतें हैं।

6 दिसंबर, घडी में दोपहर के 12 बज रहे थे एक शंखनाद पूरे इलाके में गूंज उठाता है। वहाँ सिर्फ कारसेवकों के नारों की आवाज गूंज रही है। कारसेवकों का एक बड़ा जत्था मस्जिद की दीवार पर चढ़ने लगा है। बाड़े में लगे गेट का ताला भी तोड़ दिया गया है। लाखों के भीड़ में कारसेवक मस्जिद में टूट पड़तें हैं और कुछ ही देर में मस्जिद को कब्जे में ले लेतें हैं। तभी इस वक्त तत्कालीन एसएसपी डीबी राय पुलिसवालों को मुकाबला करने के लिए कहतें हैं कोई उनकी बातें नहीं सुनता है। सबके दिमाग में एक ही सवाल उभरा कि क्या पुलिस ड्रामा कर रही हैं। या कारसेवकों के साथ हैं। पुलिस पूरी तरह समर्पण कर चुकी होती है। हाथों में कुदाल लिए और नारे लगते हुए कारसेवक तब तक मस्जिद गिराने का काम शुरू कर देतें हैं। एक दिन पहले की गई रिहर्सल काम आई और कुछ ही घंटों में बाबरी मस्जिद को पूरी तरह ढहा दिया गया।

1990 बैच की आईपीएस अधिकारी अंजु गुप्ता का बयान: 1990 बैच की आईपीएस अधिकारी अंजु गुप्ता 6 दिसंबर 1992 को ढांचे के ध्वस्त होने के समय फैजाबाद जिले की असिस्टेंट एसपी थीं और उन्हें आडवाणी की सुरक्षा का जिम्मा दिया गया था। साल 2010 में आईपीएस अफसर अंजु गुप्ता ने कहा कि घटना के दिन आडवाणी ने मंच से बहुत ही भड़काऊ और उग्र भाषण दिया था। इसी भाषण को सुनने के बाद कार सेवक और उग्र हो गए थे। अंजु गुप्ता का कहना था कि वह भी मंच पर करीब 6 घंटे तक मौजूद थी, इसी 6 घंटे में विवादित ढांचे को ध्वस्त किया गया था लेकिन उस वक़्त मंच पर आडवाणी मौजूद नहीं थे।

6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरा दी गई हजरों निर्दोष मारे गए। राजनीति में भी इसका असर देखने को मिला। इस घटना के बाद कल्याण सिंह की सरकार बर्खास्त कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया।

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मोदी रॉकेट, प्रियंका फुलझड़ी से सजा पटाखा बाजार

रोशनी के त्योहार दीपावली के मौके पर इस बार नेताओं ने अभिनेताओं को पूरी तरह से पछाड़ दिया है। राजनीति के अखाड़े में जोर आजमाइश करने वाले इन राजनेताओं की प्रतिद्वंद्विता दीपावली के इस खास मौके पर भी नजर आ रही है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का चेहरा बन चुके नरेंद्र मोदी के नाम पर बने रॉकेट की जबर्दस्त बिक्री हो रही है, वहीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका वाड्रा के नाम पर बिक रही फुलझड़ियां भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

सूबे के अलग-अलग शहरों के बाजारों में नेताओं के चित्र वाले पटाखों की भरमार है। पटाखों के खरीदार पटाखों की प्रति को नेताओं के व्यवहार से भी जोड़ कर देख रहे हैं। अगर बाजार में मोदी, सोनिया और लाल कृष्ण आडवाणी के नाम से रॉकेट बिक रहे हैं तो मुलायम सिंह यादव व राहुल गांधी के नाम वाले अनार की भी खूब खरीदारी हो रही है। दुकानदारों का कहना है कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी के चित्र वाले रॉकेट की मांग सबसे अधिक है। मोदी के बाद सोनिया रॉकेट व प्रियंका फुलझड़ी बिक रही हैं, अन्य नेताओं को लेकर जनता में विशेष रुचि नहीं है।

हर बार की अपेक्षा इस बार दीपावली के मौके पर पटाखों में बॉलीवुड के अभिनेता, अभिनेत्रियों की तुलना में राजनेताओं की तस्वीरें ज्यादा दिखाई दे रही हैं। पटाखा विक्रेताओं को राजनेताओं के सहारे माल बिकने की उम्मीद भी है। पटाखों के थोक विक्रेता साबिर अली कहते हैं कि चुनावी मौसम में पटाखा बाजार भी उसी रंग में रंगे हुए हैं। खरीदार अपने पसंद के नेता की तस्वीर वाले पटाखे ले रहे हैं, बच्चे, युवाओं व बुजुर्गो सभी की पसंद मोदी रॉकेट बना है।

हर बार की अपेक्षा इस बार पटाखा बाजार में रौनक कम है। पटाखों की दुकानें तरह-तरह के अनार, फुलझड़ी, बम, चकरी से सजी हैं, लेकिन उन्हें खरीदने के लिए हर बार की अपेक्षा भीड़ कम है। सिविल लाइंस के दुकानदार राजेश शर्मा के अनुसार, इस बार बच्चों की भीड़ काफी कम है, इससे उनकी बिक्री प्रभावित हुई है। चौक के दुकानदार अनवर कहते हैं कि तेज आवाज के पटाखों की बिक्री न के बराबर हुई है, बिना आवाज वाले अनार, फुलझड़ी, चकरी ही लोग ले जा रहे हैं। 

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सोने की खोज: 'एस-5 के फेर में अंधविश्वासी बना देश!

इसे अंधविश्वास की जकड़न ही कहेंगे कि 'शोभन-सपना-सोना-संप्रग-सोनिया जैसे पांच 'एस अक्षर से शुरू होने वाले नामों यानि 'एस-5 पर विश्वास कर उन्नाव के डौंडि़याखेड़ा किले से सोने का कथित 'महाखजाना मिलने की आस में समूचा देश 'अंधविश्वासी बन गया और वहां एक टका सोना हाथ नहीं लगा।

पूरे देश को मालूम है कि बक्सर आश्रम के संत शोभन सरकार को उन्नाव के डौंडि़याखेड़ा के राजा राव रामबक्श सिंह के 155 साल से वीरान और खंड़हर हो गए किले में एक हजार टन सोना दबा होने का सपना आया था, इस सपने को सच मान कर केन्द्रीय मंत्री चरणदास महंत ने केन्द्र की संप्रग सरकार के कैबिनेट के कर्इ मंत्रियों के अलावा सोनिया गांधी व राहुल गांधी तक न सिर्फ पहुंचाया, बलिक प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) को पत्राचार तक किया था। मंत्री पर भरोसा करना लाजमी भी है, इसी से पीएमओ ने आनन-फानन में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआर्इ) को निर्देश दिया और उसने भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआर्इ) से सर्वे कराया तो जीएसआर्इ ने भी अपनी रिपोर्ट में किले के नीचे 'धातु दबी होने की पुषिट कर दी, जिससे महाखजाना की संभावना प्रबल हो गर्इ। फिर क्या था, इस वीरान किले में भारी पुलिस बल की मौजूदगी में एएसआर्इ व जीएसआर्इ के अधिकारियों की टीम द्वारा ग्यारह दिन चली खुदार्इ में न तो सोना हाथ लगा और न कोर्इ धातु या पुरातत्व महत्व की वस्तु ही मिल पार्इ, लाखों रुपये खर्च होने के बाद जग हंसार्इ अलग हुर्इ। अब तो सभी यह कहने लगे हैं कि 'शोभन-सपना-सोना-संप्रग-सोनिया यानि 'एस-5 के अजीब मिलन ने इस देश को ही नहीं, बलिक विज्ञान को भी सपने पर यकीन करने के लिए मजबूर कर दिया।

सनद रहे, संत शोभन सरकार के सहयोगी बाबा ओमजी महराज ने कर्इ बार यह दावा कर चुके थे कि '15 फुट की गहरार्इ में सोना है। उन्होंने यह भी कहा था कि 'सोना न मिले तो सरकार मेरा सिर कलम करवा दे। अब तब 11 दिन में 4.90 मीटर (लगभग 15 फुट) गहरार्इ तक खुदार्इ हुर्इ और कुछ न मिला तो वह अपने दावे से पलटते हुए कह दिये कि 'सोना न निकला तो सरकार को नुकसान नहीं होगा। मंगलवार की खुदार्इ तक जब सोना या अन्य कोर्इ धातु नहीं मिली तो एएसआर्इ के अधिकारी एस.बी. शुक्ल कहते हैं कि 'जीएसआर्इ की रिपोर्ट के आधार पर एएसआर्इ ने खुदार्इ शुरू की थी। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या एएसआर्इ व जीएएसआर्इ जैसी एजेंसिया भी विज्ञान पर नहीं, सपने (अंधविश्वास) पर ज्यादा भरोसा करती हैं? चूंकि सोना न मिलने की दशा में जीएसआर्इ की रिपोर्ट के अनुसार कोर्इ 'धातु का मिलना जरूरी था।

किले की खुदार्इ में सोना नहीं मिला, फिर भी डौंडि़याखेड़ा गांव के कुछ बुजुर्ग संत शोभन सरकार के सपने को अब भी सच मान रहे हैं, बुजुर्ग सरवन का कहना है कि 'खुदार्इ की गति बहुत धीमी थी, 'शोभन सरकार ने पहले ही कह दिया था कि समय से खुदार्इ न की गर्इ तो सोना 'राख हो जाएगा। स्नातक की शिक्षा ग्रहण कर रहे इस गांव के युवक राजेन्द्र सिंह का कहना है कि 'यह पहले से ही तय था कि सोना नहीं मिलेगा, सिर्फ अंधविश्वास फैलाया गया है। सामाजिक कार्यकर्ता सुरेश रैकवार का कहना है कि 'संत शोभन के सपने के आधार पर केन्द्र सरकार ने अंधविश्वास को बढ़ावा दिया है, इसके जिम्मेदारों के खिलाफ वैधानिक कार्रवार्इ होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश की विधानसभा में बसपा विधायक दल के उपनेता और बांदा की नरैनी सीट से विधायक गयाचरण दिनकर कहते हैं कि 'शोभन-सपना-सोना-संप्रग-सोनिया (एस-5) के अजीब मिलन ने देश में अंधविश्वास फैलाने का निकृष्टतम कार्य किया है। वह कहते हैं कि 'संत के सपने को केन्द्र सरकार तक पहुंचाने वाले मंत्री चरणदास महंत के खिलाफ विधि संगत कार्रवार्इ अमल में लार्इ जानी चाहिए।

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कानपुर की गलियों में मोदी के स्विस कॉटेज के चर्चे

उत्तर प्रदेश में चुनावी रैली के लिए कानपुर आ रहे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के लिए बनाए गए स्विस कॉटेज के चर्चे कानपुर के आम लोग के बीच भी हो रहे हैं। आधुनिकतम सुख सुविधाओं से लैस इस कॉटेज में भाजपाईयों ने मोदी के लिए गुजराती व्यंजनों का भी इंतजाम किया है, ताकि फुरसत के क्षणों में मोदी इसका लुत्फ उठा सकें।

कानपुर में मोदी का स्वागत गुजराती खानपान के साथ होगा। मोदी के आने के पहले ही उनके लिए तैयार हो रहे स्विस कॉटेज में सभी व्यवस्थाएं कर दी जाएंगी। यह स्विस कॉटेज मंच के ठीक पीछे तैयार किया जा रहा है, जो पूरी तरह से वातानुकूलित होगा। इसमें श्नानागार, सोफा, बिस्तर, सेंट्रल टेबल की व्यवस्था होगी। स्वागत सत्कार के लिए मशहूर राज्य उत्तर प्रदेश के नेता उनके खान पान में किसी भी तरह की कमी नहीं होने देना चाहते।

भाजपा के जिलाध्यक्ष सुरेन्द्र मैथानी ने मोदी के लिए गुजरात से विशेष नमकीन, ढोकला और फाफड़ा मंगवाया है जो कि मोदी के आने के पहले ही रैली स्थल पर आ जाएगा। भाजपा के एक पदाधिकारी ने बताया कि यह व्यवस्था उनकी तरफ से की जा रही है। यदि प्रोटोकॉल के तहत कोई मांग या किसी सामग्री को हटाने के लिए कहा जाएगा तो उसे तुरंत बदलवा दिया जाएगा। साथ ही मोदी के लिए ठंडा व गरम दोनों तरह के पानी का प्रबंध किया जा रहा है।

एक सुरक्षा अधिकारी के मुताबिक, स्विस कॉटेज से लेकर मंच तक अत्यंत खास लोगों को ही पूरी तरह से प्रवेश करने दिया जाएगा, वह भी जिन्हें मोदी बुलाएंगे। खाने पीने का सारा सामान पहले तीन लोग जांचेंगे। इसके बाद ही खाने का सामान मोदी के सामने रखा जाएगा।

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक कहते हैं कि किसी भी वीआईपी गतिविधि के दौरान एक सुरक्षित स्थान बनाया जाता है, ताकि आने वाले व्यक्ति को जरूरत पड़ने पर वहां ठहराया जा सके। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए इसे भी तैयार किया गया है। 

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खागा क्षेत्र में भी मिल सकता है खजाना!

उत्तर प्रदेश में आदमपुर के पुरातात्विक स्थल पर अकूत संपदा की बात सामने आने के बाद तहसील क्षेत्र के पुरातात्विक स्थल भी चर्चा का विषय बन गया है। पुरातत्व विभाग की उपेक्षा के शिकार ऐसे स्थानों के प्रति जहां धन के लालची तांत्रिक सक्रिय हो गए हैं, वहीं स्थानीय ग्रामीणों का कौतूहल भी जाग्रत हो गया है।

खागा कस्बे के करीब स्थित कुकरा कुकरी ऐलई ग्राम का टीला तथा टिकरी गांव का टीला इन दिनों जिज्ञासु लोगों के आकर्षण का केंद्र बन गया है। इन स्थानों पर लोगों की चहल कदमी बढ़ गई है, जबकि कुछ ऐसे विवादास्पद स्थानों के प्रति भी लोग आकर्षित हुए हैं जिन्हें लोगों ने अपना कब्जा जमा रखा है।

जनपद मुख्यालय के भिटौरा ब्लॉक अंर्तगत गंगा तट पर स्थित आदमपुर गांव में सोने का खजाना दबे होने की चर्चा ने क्षेत्र के पुरातात्विक महत्व के स्थानों का जनाकर्षण बढ़ा दिया है। लोगों के बीच ऐसे स्थान चर्चा के विषय बने हुए हैं।

लोगों का कहना है कि ऐतिहासिक घटनाओं या प्राकृतिक आपदाओं से भूगर्भ में समा चुके पुराने वैभव का समाज व राष्ट्रहित में उपयोग के प्रति संत शोभन सरकार की पहल पर सरकार की सक्रियता को प्रशासन विस्तार दे दे तो खागा की सरजमीं भी देश का भाग्य बदलने में सहायक साबित हो सकती है।

जनचर्चा के अनुसार, नगर के संस्थापक राजा खड़क सिंह के इतिहास से जुड़ा कुकरा कुकरी स्थल में भी अकूत भू-संपदा होने की संभावना है। इस स्थान को लेकर लंबे समय तक सक्रिय रहे पत्रकार सुमेर सिंह का कहना है कि इस टीले के आसपास के ग्रामीणों को कई मर्तबा बहुमूल्य नगीने पत्थर व सिक्के हाथ लगे हैं। इनका कहना है कि टीले की थोड़ी बहुत खुदाई उन्हांेने करा दी थी, जिसमंे कतिपय भग्नावशेष उनके हाथ लगे थे। बताया कि इस बारे मे उन्होंने पुरातत्व विभाग को पत्र भी लिखा था लेकिन कोई जवाब न मिलने के कारण निराश हो कर बैठ गए।

अब जबकि आदमपुर के खजाने की बात सामने आ गई है, इन दिनों उस स्थान पर लोगों की चहल कदमी बढ़ गई है। प्राचीन धरोहरों और सामानों के शौकीन कुंवर लाल रामेंद्र सिंह के अनुसार, इस स्थान के चक्कर लगाते हुए उन्हें कई बार ऐसे तांत्रिक भी मिले हैं, जिन्होंने टीले के अंदर बहुमूल्य संपदा होने के का दावा किया है।

फिलहाल इन दिनों इस स्थान पर धनाकांक्षी लोगांे की चहल पहल बढ़ गई है। नहर किनारे रहने वाले ग्रामीणों ने बताया कि आजकल शाम को कुछ लोग टीले के आसपास मंडराते देखे जाते हैं। नगर के दक्षिण-पूर्व सीमा के बाहर ऐलई गांव के पहले प्रवेश मार्ग के पास जिस टीले पर माइक्रो टावर लगा है, वह भी इस समय चर्चा में शुमार है।

बताते हैं कि सन् 1984 में जब टावर लगाने के लिए टीले की सतही की खुदाई हुई थी, उस समय भारी मात्रा में चांदी व ताबे के सिक्के निकले थे। अरबी भाषा की लिखाई वाले ये सिक्के कुछ ग्रामीणों के हाथ भी लगे थे, लेकिन डर और लोभ की वजह से लोगों ने सिक्कों के बाबत चुप्पी साध ली। लगभग 200 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैले इस टीले के आसपास अब आबादी बढ़ जाने के बावजूद रात मे टीले का वातावरण रहस्यमय रहता है, ग्रामीण भी टीले में जाने से भय खाते हैं। 

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