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कैराना के बाद अब कांधला से हिन्दुओं का पलायन, क्या है सच?

शामली। उत्तर प्रदेश के कैराना में 346 हिंदू परिवारों के पलायन करने की सूची जारी कर सूबे की राजनीति में भूचाल लाने वाले भारतीय जनता पार्टी के सांसद हुकुम सिंह ने अब कांधला कस्बे के 63 परिवारों के पलायन की सूची जारी की है। हुकुम सिंह ने यहां पत्रकारों से कहा कि कैराना की तरह कांधला में भी रंगदारी और हत्या की घटनाओं से दहशत के चलते 63 परिवारों को घर बार छोड़ कर दूसरी जगहों पर जाना पड़ा है। भाजपा सांसद ने इसके लिए उत्तर प्रदेश में बदहाल कानून व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग की। इससे पहले उन्होंने कैराना कस्बे में बदमाशों द्वारा व्यापारियों से मांगी जा रही रंगदारी व न देने पर हत्या करने, वर्ग विशेष के लोगों द्वारा हिंदू परिवारों को धमकी देने के चलते 346 परिवारों के पलायन की सूची जारी की थी। हुकुम सिंह का कहना है कि यहां से पलायन करने वाले अब दूसरे शहरों में अपना रोजगार चला रहे हैं।

सांसद ने कहा कि इस बारे में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को भी बताया गया है। उन्होंने कहा कि राजनाथ सिंह जून के अंतिम सप्ताह में कैराना आएंगे। उन्होंने कहा कि वर्ष 2013 में हुए सांप्रदायिक दंगों में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के नेता का नाम सामने आया था। इस नेता को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने बराबर में बैठाकर उनसे सलाह लेते हैं, आज तक उस नेता पर सरकार ने कार्रवाई क्यों नहीं की। इस संबंध में मुख्यमंत्री से कई बार मांग की गई लेकिन आज तक भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। आबादी के अनुपात में लगातार घट रही हिंदुओं की संख्या इस तथ्य को साबित कर रही है। यहां के लोगं का कहना है कि कांधला और कैराना को बचाना है तो यहां पैरामिलेट्री फोर्स का बेस कैंप स्थापित करना होगा। सूत्रों की माने तो उनका कहना है कि सरावज्ञान, कानूनगोयान, शेखजादगान व शांतिनगर जैसे मुहल्लों से हिंदुओं का अपनी संपत्ति बेचने का सिलसिला जारी है। सुभाष जैन, राजू कंसल, दीपक चौहान, तरस चंद जैन, विकास सैनी, राजबीर मलिक और योगेंद्र सेठी जैसे लोग अपनी जन्म और कर्म भूमि को अलविदा कह चुके हैं। सतेंद्र जैन, रविंद्र कुमार और विजेंद्र मलिक जैसे अनेक लोग महफूज ठिकानों की तलाश में है। घरों व दुकानों पर लटकी बिकाऊ है जैसी सूचनाएं प्रशासन को मुंह चिढ़ा रही हैं। असंतुलित होती आबादी के आकड़े भी पलायन की टीस उजागर करते हैं।

कैराना से महज 12 किलोमीटर दूर बसे कांधला में कैराना की ही तरह असुरक्षा सबसे बड़ी समस्या है जो दिनों दिन बड़ा आकार लेती जा रही है। मेन बाजार में बीज विक्रेता तरुण सैनी यहां व्याप्त आतंक का शिकार हो चुके हैं। वर्ग विशेष की बढ़ती दबंगई के आगे पुलिस-प्रशासन के नतमस्तक होने का आरोप लगाते हुए तरुण के भाई आदेश का कहना है कि करीब दो साल पहले उनकी दुकान पर आए आधा दर्जन हथियारबंद बदमाशों ने उनसे पांच लाख रुपये रंगदारी मांगी और शहर छोड़कर चले जाने की धमकी दी। पुलिस को सीसी टीवी कैमरे की फुटेज उपलब्ध करा दी गयी परंतु कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। तब से हम सैनी समाज की सुरक्षा की चिंता में जी रहे हैं। प्रशासन से पिस्टल का लाइसेंस मांगा परंतु फाइल अटकी है, कोई सुनवाई नहीं होती। कभी देश भर को गुड़ की जरूरतें पूरा करने वाली मंडी में आज सन्नाटा है। कभी यहां गुड के लदान के लिए रेलवे ने विशेष ट्रैक तक की व्यवस्था की थी। व्यापारी विष्णु गोयल का कहना है कि अनाज मंडी भी उजड़ चुकी है। सब्जी मंडी को छोड़ दें तो बाकी बड़ा कारोबार अब ठप है। इस गन्ना बेल्ट की चार खांडसारी इकाइयां बंद हो चुकी हैं। अब तो हालात उलट हैं, आतंक और रंगदारी की वजह से यहां कोई कारोबार नहीं करना चाहता। पांच साल में सराफा कारोबार साठ प्रतिशत कम होने का दावा करते हुए सराफा एसोसिएशन के महामंत्री सतवीर वर्मा का कहना है कि हालात ऐसे ही बने रहें तो हम भी परिवार पालने के लिए मजबूरन कस्बा छोड़ जाएंगे।

स्कूली बच्चों के लिए अच्छे स्कूलों का संकट भी कम नहीं है। करीब दो दर्जन बसें स्कूली बच्चों को लेकर सुरक्षाकर्मी के साथ 14 किलोमीटर दूर शामली आना-जाना करती हैं। लोगों का कहना है कि बच्चों को पढ़ाने की मजबूरी के चलते हम ये बड़ा जोखिम उठाने को मजबूर हैं। सैनी समाज के संयोजक नरेश सैनी का कहना है कि छेड़छाड़ की घटनाओं ने कई वर्षों में ऐसा माहौल बना दिया है कि बहन-बेटियों का देर शाम घरों से निकलना बंद है। दिव्यप्रकाश का कहना है कि कांधला के बिगड़े वातावरण से रोजगार के बचे-खुचे अवसर ही खत्म नहीं हो रहे वरन शादी में भी दिक्कतें आ रही हैं। कोई भी परिवार अपनी बेटी कांधला में ब्याहने के लिए आसानी से राजी नहीं होता। आतंक के चलते औने-पौने दाम में अपनी संपत्ति बेचने की मजबूरी जता रहे सुभाष बंसल का कहना है कि कभी कस्बे की शान रही रहतू मल की हवेली मात्र 15 लाख रुपये में बिक गयी, जबकि उसकी कीमत लोग एक करोड़ रुपये आंकी गई थी। जाट कालोनी में मकान व दुकान तेजी से बिकने का दावा करते सतीश पंवार का कहना है कि भू-माफिया सक्रिय हो चुके हैं और आतंक फैलाने में उनका योगदान भी कम नहीं। पुलिस भी इनकी मदद में खड़ी दिखती है। पलायन करने वालों की सूची में अभी इजाफा होगा, क्योंकि बहुत से लोगों को अपनी संपत्ति बेचने के लिए सही दाम नहीं मिल पा रहे हैं। एडवोकेट बीरसेन का कहना है कि कुछ व्यापारी अपना कारोबार समेटने से पहले उधार में गए धन को बटोरने में जुटे हैं। कई पीढ़ी से लोहे के व्यापारी 71 वर्षीय सतेंद्र जैन बुझे मन से कहते हैं कि अपने पौत्रों का एडमिशन इस बार देहरादून करा दिया है, उधारी सिमटते ही कांधला छोड़कर चले जाएंगे।

यह मामला उठने के बाद सियासी दल अपना गुणा भाग लगाने में जुट गए हैं। मुद्दा भाजपा ने उठाया, तो सियासी हलकों में हलचल मच गई। हर राजनीतिक दल अपने हिसाब से पलायन की परिभाषा तय कर रहा है। भाजपा इसे भुनाने में जुट गई है, तो सपा, बसपा और रालोद इसे चुनावी स्टंट बता रहे हैं। पलायन प्रकरण से आखिर किसका फायदा होगा और किसका होगा नुकसान। राजनीतिक दल भी इसकी गुणा भाग करने में लगे हुए हैं। खास बात यह है कि मुद्दा भले ही कैराना से शुरू हुआ, मगर अब कांधला भी पहुंच गया। भाजपा सांसद ने कांधला की सूची जारी कर नई बहस छेड़ दी, जिसके बाद सपा नेता इसकी खिलाफत में उतर आए और कहने लगे कि भाजपा सांसद वोटों की राजनीति में क्षेत्र का माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। क्या वास्तव में पलायन प्रकरण आगामी विधानसभा चुनाव में वोटों का ध्रुवीकरण करने में कामयाब होगा। क्योंकि शामली जिले की व्यवस्था पर गौर करें, तो यहां चुनावी समीकरण एकदम अलग रहा है। जिले की कैराना, शामली और थानाभवन विधानसभा सीटों पर अलग ही समीकरण बनता है।

ऐसे में हर राजनीतिक दल अपने जनाधार को बनाए रखने के प्रयास में है, तो भाजपा हिंदुओं को लामबंद कर सकती है। सीटवार अलग समीकरण हैं, जिसमें सपा गुर्जर और मुसलिम गठजोड़ को बनाकर रखना चाहती है। लब्बो लुआब यही है कि पलायन प्रकरण पर हर राजनीतिक दल की नजर लगी हुई है। उधर, विधायक सुरेश राण नें प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को साम्प्रदायिकता का आरोपी बताया। उन्होंने कहा कि वो गोल टोपी लगाकर आते हैं वो इस बात से आखिर क्या जताना चाहते हैं। विधायक सुरेश राणा ने कहा कि सपा सरकार ने पिछले साढ़े चार साल में 450 दंगे कराये हैं और दंगे कराने में गोल्ड मेडलिस्ट हो गई है सपा सरकार।

अब सवाल यह आखिर शामली प्रशासन ने अपने स्तर पर कोई जांच करने की जहमत क्यों नहीं उठाई? क्या बंद घरों-दुकानों के ताले भी सवालों का जवाब देने में सक्षम हैं? क्या ताले ही यह बता रहे हैं कि हमारे मालिक इस-इस कारण अन्य कहीं जा बसे हैं? सवाल और भी हैं। क्या शामली प्रशासन ने कैराना से अन्यत्र जा बसे लोगों से बात की? क्या किसी ने यह जानने की कोशिश की कि जो लोग कैराना में रहकर ही ठीक-ठाक कमाई कर रहे थे उन्हें दूसरे शहर जाकर कारोबार करने की जरूरत क्यों पड़ी? बेहतर आय और जीवन की लालसा में गांव से कस्बे और फिर वहां से पड़ोस के बड़े शहर जाने की प्रवृत्ति नई नहीं है। ऐसा हर कहीं होता है, लेकिन इस क्रम में मोहल्ले वीरान नहीं होते। लगता है कि कैराना में कुछ अस्वाभाविक हुआ है। चूंकि यह अस्वाभाविक घटनाक्रम कथित सेक्युलर दलों और उनके जैसी प्रवृत्ति वालों के एजेंडे के अनुरूप नहीं इसलिए उनके पास सबसे मजबूत तर्क यही है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव करीब आ रहे हैं इसलिए भाजपा यही सब तो करेगी ही। इसमें दोराय नहीं कि भाजपा कैराना सरीखे मसलों पर विशेष ध्यान देती है, लेकिन क्या ऐसे मसलों पर अन्य किसी राजनीतिक दल को ध्यान नहीं देना चाहिए? नि:संदेह कैराना कश्मीर नहीं है, लेकिन इन दिनों कश्मीरी पंडितों की वापसी के सवाल को लेकर भाजपा पर खूब कटाक्ष हो रहे हैं?



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आज तय हो सकता है पौने दो लाख शिक्षामित्रों के भविष्य


लखनऊ: उत्तर प्रदेश में पौने दो लाख शिक्षामित्रों के भविष्य पर निर्णय 26 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट से आ सकता है। शिक्षामित्रों के मामले पर सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा व जस्टिस यूयू ललित की बेंच सुनवाई दोपहर बाद दो बजे करेगी। इस बार सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षामित्रों के मामले को फाइनल डिस्पोजल के लिए लगाया है। ऐसे में सहायक अध्यापक के पदों पर समायोजित हो चुके करीब 1.34 लाख शिक्षामित्रों व समायोजन का इंतजार कर रहे सभी शिक्षामित्रों की धड़कने बढ़ गयी हैं। 

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट में पहले इस मामले की सुनवाई 11 जुलाई को होनी थी, लेकिन अब इसको निर्धारित समय से पहले सुना जाएगा। प्रदेश सरकार ने बेसिक शिक्षा परिषद के सचिव संजय सिन्हा से लेकर विभाग के आला अफसरों व सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के लिए अपने अधिवक्ताओं की टीम को लगा दिया है।

मालूम हो कि प्रदेश में शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक पदों पर समायोजित करने के राज्य सरकार के निर्णय को हाईकोर्ट इलाहाबाद ने निरस्त कर दिया था। इसके चलते प्रदेश भर के पौने दो लाख शिक्षामित्र सड़क पर आ गये थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने बाद में हाईकोर्ट के समायोजन निरस्त करने के फैसले पर स्थगन आदेश पारित कर रोक लगायी थी। 

सुप्रीम कोर्ट ने बाद में अपनी रोक को 11 जुलाई तक के लिए बढ़ा दिया था और अब 26 अप्रैल को अंतिम सुनवाई के लिए इसको लिस्टेड किया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर यूपी के शिक्षामित्रों की नजरें टिकी हैं। सूत्रों का कहना है कि 26 अप्रैल को होने वाली सुनवाई में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) के रुख पर भी काफी दारोमदार है।    

चपरासी की पत्नी से बोला अय्यास अफसर, इतनी खूबसूरत हो उसके साथ क्यों रहती हो, मेरे साथ आकर रहो


मुजफ्फरनगर: उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक सेल्स टैक्स के अफसर की अय्यासी सामने आई है। सिविल लाइन क्षेत्र के केशवपुरी में रहने वाले सैल्स टैक्स अफसर सुभाष चंद्रा का दिल चपरासी की पत्नी पर आ गया। इस अफसर ने न सिर्फ महिला से छेड़छाड़ की, बल्कि उससे कहा- 'तुम इतनी खूबसूरत हो, चपरासी के साथ क्यों रहती हो, मेरे साथ आकर रहो।' महिला की तहरीर पर स्थानीय पुलिस ने आरोपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर दी है।

महिला ने आरोप लगाया है कि सुभाष चंद्रा रोजाना शराब पीकर आता और उससे छेड़छाड़ करता था और कहता है कि तुम अपने पति को छोड़कर मेरे पास आ जाओ इतना ही नहीं, आरोपी अपने साथ कंडोम के पैकेट भी रखता था, जो वह बार-बार दिखाता था। सीओ सिटी तेजवीर सिंह ने बताया, सुभाषचंद्रा का मेडिकल परीक्षण कराया गया है, जिसमें एलकोहल की पुष्टि हुई है। आरोपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। उसे जेल भेजने के लिए कार्रवाई की जा रही है।  

आम तोड़ने को लेकर मासूम की दरिदों ने कर दी गला दबाकर हत्या


गोसाईंगंज। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोसाईंगंज थानाक्षेत्र में एक मासूम की दरिदों ने गला दबाकर हत्या कर दी। हत्या के बाद शव को उसके ही मकान के पास एक किसान के चरी के खेत में फेंक कर फरार हो गए। सुबह चरी काटने पहुंचे किसान ने शव देखा, जिसके बाद गांव में हड़कंप मच गया। सूचना मिलने पर पहुंची पुलिस ने छानबीन के बाद शव को कब्जे में लेकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया। इस संबंध में मृतक के पिता ने अपने ही परिवार के कुछ सदस्यों पर आम तोड़ने को लेकर हत्या करने का आरोप लगाया है। तहरीर मिलने पर पुलिस ने हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर दो लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है।

जानकारी के मुताबिक गोसाईगंज के सठवारा गांव निवासी राम उजागर द्विवेदी खेती करके अपने परिवार का पालन-पोषण करते आ रहे है। उनके दस वर्षीय बेटे सत्यम द्विवेदी का शव गांव के ही किसान मल्हू के चरी के खेत में पड़ा मिला। मल्हू सुबह अपने जानवरों को चारा देने के लिए चरी काटने खेत गया था। उसी दौरान उसने खेत में शव देखा, इसकी सूचना तत्काल गांव के लोगों को दी। जिसके बाद गांव में हड़कंप मच गया। देखते ही देखते ग्रामीणों का हुजूम लग गया। ग्राम प्रधान शत्रोहन द्वारा घटना की सूचना गोसाईंगंज पुलिस को दी गई। मौके पर पहुंची पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम को भेज दिया। मृतक छात्र शिवलर गांव स्थित निजी स्कूल में कक्षा चौथी में पढ़ता था। मृतक के छात्र के पिता राम उजागर द्विवेदी ने अपने परिवार के ही तीन लोगों के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई है।

पीड़ित का कहना है कि आम तोड़ने को लेकर परिवार के ही रिंकू, सुधीर व लवकेश ने गला दबाकर उसकी हत्या की है। पीड़ित के अनुसार उसके बेटे सत्यम को आरोपियों ने शनिवार को आम तोड़ने को लेकर पीटा था। जिसके बाद उन्होंने ही उसकी हत्या की है। वह गांव में सम्पन्न होने वाले एक शादी समारोह कार्यक्रम में गया था। जिसके बाद वापस नहीं लौटा। सुबह उसका शव घर के पास में चरी के खेत में पाया गया। वहीं गोसाईगंज के शिवलर गांव स्थित एक निजी विद्यालय में सत्यम कक्षा चौथी का छात्र था। वह जितना शैतानी करता था, उतना ही वह पढ़ाई में भी अव्वल था। मृतक के पिता बताते हैं कि उसकी शैतानी से लोग यहां खुश होते थे। वही आरोपियों को चुभती थी। जिसके कारण उसकी हत्या कर दी गई।

मृतक के पिता राम उजागर अपनी पत्नी अर्चना के साथ अपनी बहन के यहां बाराबंकी में आयोजित शादी समारोह कार्यक्रम शरीक होने गए थे। घर पर मृतक की बड़ी बहन मंदाकिनी तथा छोटा भाई शिवम थे। सठवारा गांव में आयोजित लक्ष्मण के घर शादी समारोह में सत्यम गया था। जिसके बाद वह घर नहीं लौटा। बहन ने काफी खोजबीन के बाद इसकी सूचना अपने पिता को दी। जिसके बाद रात में ही वह बाराबंकी से घर लौट आए। रात में काफी खोजने का प्रयास किया लेकिन कुछ पता नहीं चल सका। सुबह उसका शव घर से कुछ दूरी पर चरी के खेत में मिला।

इच्छाधारी नाग बना बाबा, भक्तों को बांट रहा संजीवनी बूटी!

आगरा: भारतीय जनमानस में इच्छाधारी नाग अथवा नागिन की अनगिनत कथाएं मौजूद हैं। किवदंतियों के अनुसार ये इच्छाधारी नाग अथवा नागिन कोई भी रूप धर सकते हैं। कहीं भी जा सकते हैं। हिन्दी फिल्मकारों ने समाज में व्याप्त सर्प सम्बंधी अंधविश्वास की धारणाओं का जमकर दोहन किया है। उन्होंने न सिर्फ इस विषय फिल्में बनाकर मोटा मुनाफा कमाया है, वरन समाज में अंधविश्वास की धारणा को और ज्यादा गहरा करने का काम भी किया है। जानकारों की माने तो ये सारी बातें कोरी बकवास हैं। इनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है| फिलहाल इच्छाधारी नाग नागिन का एक मामला ताज नगरी आगरा में देखने को मिला है| यहां एक बाबा इच्छाधारी नाग होने का दावा कर लोगों का इलाज कर रहा है। लोगों का मानना है कि उनके हाथ से दवा पीने पर 21 दिन में ही बीमारी खत्म हो जाती है। 

प्राप्त जानकारी के अनुसार, शिव शक्ति बाबा भुड़कनाथ (29) का असली नाम मनोज सिंह यादव है। वह गाजीपुर का रहने वाला है। उन्होंने 12वीं की पढ़ाई के बाद आईटीआई की और फिर बाबा बन गए। करीब एक हफ्ते पहले बाबा ने ककरैठा में अपना डेरा जमा लिया। इसके बाद उनके शिष्यों ने गांव-गांव में पर्चे बांटना शुरू कर दिया। इन पर्चों में बाबा के इच्‍छाधारी नाग होने का जिक्र है। इसमें लिखा है कि बाबा इच्‍छाधारी नाग हैं। उनकी गाय में दैवीय शक्ति है। बाबा के हाथ से दवा पीने पर कोई भी बीमारी 21 दिन में खत्म हो जाती है। साथ ही इस पर्चे को छपवाकर बांटने वाले को भी फायदा होगा। 

फिर क्या था लोग बाबा के नाम के पर्चे छपवाकर बांटे लगे| बाबा का कहना है कि उनके पास कुछ दवाएं है, जिससे मरीज पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं। यह 21 दिनों की दवा है। इसमें लौकी का जूस, जामुन और कई जड़ी-बूटियां शामिल हैं। इसे यहां आने वाले मरीजों को खीर में मिलाकर दिया जाता है। बाबा की दवा लेने के लिए लोगों को घंटों अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। इसकी जानकारी होने पर स्वास्थ्य विभाग की एक टीम वहां पहुंची| हालांकि बाबा के भक्तों ने दवा की जांच नहीं करने दी। 

आपको बता दें कि यह इच्छाधारी नाग का यह पहला मामला नहीं है इससे पहले भी कई मामले देखे गए| अभी हाल ही में एक ऐसा मामला औरंगाबाद में देखने को मिला था| बिहार के औरंगाबाद में देखने को मिला है| यहां एक किशोरी की शादी इच्छाधारी नाग से होने की अफवाह फैली। अफवाह पर ही यह शादी देखने के लिए 50 हजार से अधिक लोगों की भीड़ जुट गई। हद तो यह हो गई कि किशोरी को सजाकर खड़ा कर दिया गया, लेकिन नाग को न आना था, ना आया। 

यहां यह अफवाह फैलाई गई थी कि गांव के अखिलेश भुइयां की बेटी रेणु कुमारी की शादी इच्छाधारी नाग से होगी। वर नाग रूप में आएगा और इंसान से शादी करेगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। चर्चा ये उड़ाई गई कि गांव की एक किशोरी जब एक दिन अपने घर आ रही थी तो उसे एक नाग ने रोक लिया। बाद में आदमी का रूप धर कर उसने लड़की से शादी करने का प्रस्ताव रखा और शादी के लिए दिन तय किया। फिर क्या था यह अनोखी शादी देखने के लिए हर तरफ से लोगों का रेला आना शुरू हो गया| सुबह आठ बजे तक सारा इलाका लोगों से पट गया। सभी सड़कें जाम हो गईं। खेतों से लेकर सड़कों तक, पेड़ों से लेकर मकानों तक लोग भरे पड़े थे। कुछ महिलाएं तो बाकायदा शादी के गीत गाते हुए टोलियों में पहुंचीं। लेकिन जब कोई इच्छाधारी नाग लड़की को ब्याहने नहीं पहुंचा तो हर कोई किशोरी के मां-बाप को कोसता हुआ अपने घर चला गया| 

एक ऐसा ही मामला वाराणसी जिले में भी देखने को मिला था| वाराणसी के पिंडरा विकास खंड के राजपुर ग्रामसभा के राजस्व गांव बड़वापुर के रहने वाले संदीप नाम के व्यक्ति ने इच्छाधारी नागिन से शादी करने का दवा किया था| अपने आप को पूर्वजन्म में नाग और इस जन्म में नागिन से शादी का दावा करने वाले संदीप ने बताया कि गांव के ही शिव मंदिर के बगल में इच्छाधारी नागिन से उसकी मुलाकात हुई थी। नागिन ने उसे बताया था कि 20 साल पूरा होने पर वह उससे शादी करने के लिए आएगी। बड़वापुर के रहने वाले दयाशंकर वर्मा के दो लड़कों में छोटा लड़का संदीप कुमार दावा कर रहा था कि उसके ऊपर नाग देवता की सवारी है। उसकी शादी इच्छाधारी नागिन से चार अप्रैल को शिव मंदिर में होगी। हालाँकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ| 

इससे पहले इच्छाधारी नाग' की शादी का मामला उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में अगस्त 2014 को देखने को मिला था| बांदा जिले के बबेरू थाने के पवैया गांव निवासी दलित युवक अरुण कुमार ने भी दावा किया था कि वह इच्छाधारी नाग है, नाग पंचमी को नागिन से शादी करेगा| अरुण ने ग्रामीणों को बताया था कि एक इच्छाधारी नागिन सपने में उसे बताती है कि वह उसका पूर्व पति है और उसके चाचा ने उसकी हत्या कर दी थी, अब वह हत्यारे के घर में जन्म लिया है| बकौल अरुण, 'मैं इच्छाधारी नाग हूं और नाग पंचमी को नागिन से शादी करूंगा' उसके इस ऐलान से आस-पास के गांवों के हजारों लोगों का हुजूम इकट्ठा हो गया| इसी दौरान बबेरू पुलिस को सूचना मिली और वह मौके पर पहुंच कर कथित इच्छाधारी नाग को हिरासत में ले लॉकअप में बंद कर दिया| उधर, गांव में मौजूद प्रत्यक्षदर्शी सहदेव रैदास ने बताया कि पुलिस जैसे ही अरुण को हिरासत में लेकर चली गई तो एक नागिन 'बांबी' से निकलकर आई और गुस्से में उसने कई लोगों को खदेड़ा| उसका कहना था कि नागिन के इस तरह खदेड़ने से साबित होता है कि इन दोनों में जरूर कोई पुराना रिश्ता है|

ऐसे गांव जहां घरों में नहीं होते दरवाजे, देवी-देवता करते हैं रक्षा

आज जहां चोरी और लूट की वारदातों से सबक लेकर गांव-शहर सभी जगह लोग अपने घरों को सुरक्षित रखने के लिए तमाम प्रबंध करते हैं, वहीं उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद और महाराष्ट्र के शनि शिगनापुर में जहां के लोग अपने घरों में दरवाजे तक नहीं लगाते। उनका मानना है कि गांव के बाहर बने मंदिर में विराजमान देवी- देवता उनके घरों की रक्षा करती हैं।

इलाहाबाद जिले के सिंगीपुर गांव के सभी घरों ये समानता देखने को मिलती है कि उनमें दरवाजे नहीं हैं। कच्चे, पक्के और झोपड़े हर तरह के इस गांव तकरीबन 150 घर हैं। ग्रामीण सहजू लाल ने कहा, "ये बाकी लोगों को चौंकाने वाली हो सकती है, लेकिन हमारे लिए ये एक परंपरा बन चुकी है। हम दशकों से बिना दरवाजों के घरों में रह रहे हैं।" इलाहाबाद शहर के करीब 40 किलोमीटर दूर सिंगीपुर गांव की आबादी करीब 500 है। गांव में निचले मध्यम वर्गीय परिवार और गरीब तबके के लोग रहते हैं, जो फेरी लगाने, छोटी मोटी दुकानें चलाने और मजदूरी कर परिवार चलाते हैं। गांव में दलितों, जनजातियों और पिछड़ा वर्ग के लोगों की संख्या ज्यादा है।

ग्रामीणों का विश्वास है कि मां काली उनके घरों की रक्षा करती हैं और जो भी उनके घरों में चोरी का प्रयास करेगा, मां उसे दंड देंगी। ग्रामीण बड़े लाल निषाद बसंत लाल कहते हैं कि गांव के बाहर बने मंदिर में विराजमान मां काली पर हमें पूरा भरोसा है, इसीलिए हम अपने घरों की चिंता नहीं करते। निषाद के मुताबिक उनके बुजुर्ग कहा कहते थे कि जिन लोगों ने इस गांव में चोरी की, उनकी या तो मौत हो गई या वे गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हो गए। 

वहीँ, महाराष्ट्र के शनि शिगनापुर में लोगों के घरों में दरवाजों की चौखटें तो लगी हुई हैं, लेकिन दरवाजा नहीं हैं। यहां के लोग सुरक्षा के लिए लॉकरों में भी ताले नहीं लगाते हैं। दरअसल उनका विश्वास है कि मंदिर शनि देवता का निवास स्थान है और इस वजह से वहां कोई भी चोरी करने की हिम्मत नहीं कर सकता, क्योंकि इससे उसे और उसके परिवारवालों को शनि के क्रोध का सामना करना पड़ेगा।

इतना ही नहीं ये तो लोगों की आस्था है लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि यहां बैंक भी इस परंपरा का पालन करते हैं। कुछ दिनों पहले यहां यूको बैंक की एक शाखा शुरू हुई है, जिसके दरवाजे पर कोई ताला नहीं लगता है। करीब 3000 लोगों की आबादी वाला यह अनूठा शहर जहां के लोग अपने घरों की रक्षा के लिए भगवान पर यकीन करते हैं।

गन्ने को लेकर कहीं खुदकुशी तो कहीं बेटियों की रुक रही हैं शादी

बाराबंकी| उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों की मुश्किलें कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं| जहाँ अभी हाल ही में गन्ना भुगतान को लेकर कर्ज में डूबे लखीमपुर के दो किसानों ने आत्महत्या कर ली थी वहीँ अब उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले से खबर आ रही है जहाँ कई गांवों में गन्ने की खरीद नहीं होने से 45 से ज़्यादा लड़कियों की शादी रुक गई है|

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बाराबंकी जिले के मोहम्मदाबाद समेत कई गांवों में गन्ने की खरीद नहीं होने से 45 से ज़्यादा लड़कियों की शादी रुक गई है| मोहम्मदाबाद गाँव की दमयंती की बेटी की शादी इसी दिसंबर में होने वाली थी लेकिन पिछले साल का बकाया नहीं मिलने और इस साल चीनी मिलों के गन्ना नहीं ख़रीदने के कारण उनकी बेटी की शादी रुक गई| दमयंती बताती है कि उसके पास गन्ने के सिवाय कोई अन्य साधन नहीं है| वहीँ इसी गांव के राम मनोहर बताते हैं कि उन्होंने पिछले साल चीनी मिलों को अपना गन्ना बेचा था लेकिन उन्हें अभी तक उसका पैसा नहीं मिला है और इस साल उनके गन्ने को चीनी मिल ने अब तक नहीं ख़रीदा है जिससे उन्हें मजबूर होकर अपनी पोती की शादी रोकनी पड़ी है|

उत्तर प्रदेश में 45 चीनी मिलों ने पेराई शुरू करने का ऐलान किया है| लेकिन अभी तक पेराई शुरू नहीं हुई है और इस वजह से किसानों से गन्ना नहीं खरीदा जा रहा है| भाकियू के प्रांतीय महासचिव मुकेश कुमार सिंह कहते हैं कि चीनी मिलों ने गन्ना किसानों के पिछले साल के बकाए 3200 करोड़ रुपए का भुगतान नहीं किया है और इस साल पेराई भी अभी तक शुरू नहीं होने के कारण किसानों का गन्ना खेतों में ही पड़ा हुआ है| मुकेश बताते है कि आठ करोड़ रुपए तो बाराबंकी ज़िले के गन्ना किसानों का ही बकाया है|

बकाये को लेकर मोहम्मदाबाद गाँव के किसान राम सेवक बताते हैं कि गत वर्ष के बकाए का भुगतान हम लोगों को नहीं मिला तो ऐसे में हम लोग चीनी मिलों के 20 रुपए प्रति क्विंटल का भुगतान बाद में करने पर कैसे भरोसा करें|

आपको बता दें कि बाराबंकी ही पहला जिला नहीं है जहाँ गन्ना किसानों की बेटियों की शादी रुक गई है अन्य जिले भी हैं| पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान मुख्यत गन्ने की खेती करते हैं और यही गन्ना उनके लिए साल भर का बजट बनाता है| किसान आजकल के समय में हीं अपने बेटे बेटियों के विवाह करते हैं| लेकिन अभी तक यूपी की चीनी मिलों में पिराई आरम्भ नहीं हुई जिसके चलते उनकी फसल ऐसे ही खड़ी है| इन किसानों के सामने इस समय सबसे बड़ा संकट उनके सम्मान का है| बेटियों के विवाह के कार्ड तक बंट गए हैं लेकिन खर्च करने को पैसा ही नहीं है ऐसे में कुछ ने ब्याज पर पैसा लिया तो कइयों ने शादी की तारीखें आगे बढ़ा दी हैं| वहीँ कुछ ने तो इस सहालग में शादी न करने का फैसला कर लिया है| हालात ये हैं कि सूबे में करीब 200 शादियां टाल दी गई हैं और लगभग एक हजार कि तारीखों में परिवर्तन किये गये।

गन्ना किसान बेबसी के आंसूं रो रहे हैं| आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि जिस घर में शादी हो और वहाँ तैयारियों के लिए पैसा ही न हो तो माँ बाप पर क्या गुजरती होगी| इस बार सूबे का 29 लाख किसान अपनी फसल को बढ़ते देख जहाँ खुश था वहीँ अब उसके चेहरे पर चिंता साफ़ झलक रही है। उसे समझ नहीं आ रहा कि कहां लेकर जाएं इस गन्ने को। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत का कहना है कि एक हजार से ज्यादा बेटियों की शादी फंस गई है। रिश्ते होकर टूट रहे हैं। सबसे बुरी स्थिति मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत, बुलंदशहर, बिजनौर, मुरादाबाद, अमरोहा और लखीमपुर खीरी में है। इन जनपदों का किसान गन्ने के पैसे से ही पूरा बजट तैयार करता है।

वहीँ अभी तक यूपी सरकार ने कुछ निजी चीनी मिलों पर दबाव बनाने के लिए कुर्की आरम्भ की है| लेकिन हमारे सूत्रों के मुताबिक इस से कुछ होने वाला नहीं है| जब तक सरकार कोई ठोस योजना नहीं बनती इन किसानों के लिए तब तक ये ऐसे ही बेबसी के आंसू बहते रहेंगे| परेशानी सिर्फ ये नहीं है कि पिराई आरम्भ नहीं हो रही बल्कि ट्रांसफर, पोस्टिंग, वसूली, चुनाव, जातीय समीकरण जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को निपटा रही सपा सरकार के पास इतना समय ही नहीं है कि वो इन किसानों के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर उनकी समस्या को सुन सके|

सूबे के किसान चाहते हैं कि सरकार उनके गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाये| क्योंकि खाद बिजली पानी मेहनत आदि मिलाकर जो गन्ना वह तैयार कर रहे हैं उससे वर्तमान समर्थन मूल्य पर तो लागत भी निकाल पाना मुश्किल है| किसान नेता चाहते हैं कि एक सरकारी प्रतिनिधि मंडल उनकी मांगों को सुने और उसपर अमल करे लेकिन जहाँ मुलायम दिन-रात प्रधानमंत्री बनने का सपना बुन रहे हैं वहीँ सरकार उनके सपने को पूरा करने के लिए दौड़ भाग कर रही है| वहीँ हमारा ये कहना है कि यदि सरकार इन किसानों के लिए कुछ करे तो मुलायम अपना ये सपना सच भी कर सकते हैं वर्ना प्रदेश में जो माहौल बन रहा है उसके मुताबिक तो किसानों युवाओं और अन्य समुदाय भी सपा को वोट देने में सौ बार सोचेंगे|

इससे पहले शुक्रवार को प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने नई दिल्ली में केन्द्रीय कृषि मंत्री शरद पवार के साथ बैठक के दौरान प्रदेश के गन्ना किसानों की समस्याओं को उठाते हुए उनके लिए पैकेज की मांग की। मुख्यमंत्री ने कहा कि केन्द्रीय सरकार तत्काल 'इन्टरेस्ट सबवेन्शन स्कीम' लागू करे। इस योजना के तहत प्राप्त होने वाली धनराशि का शत-प्रतिशत उपयोग किसानों के बकाए गन्ना मूल्य भुगतान के लिए किया जाए।

उन्होंने यह अनुरोध भी किया कि चीनी उद्योग के संबन्ध में कोई भी नीति बनाते समय केन्द्र सरकार गन्ना किसानों के हितों की सुरक्षा को प्राथमिकता दे। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार के लिए गन्ना किसानों का हित सवरेपरि है। इसके मद्देनजर यह बैठक केवल चीनी उद्योग की समस्याओं पर ही विचार किए जाने तक सीमित न रहे। बल्कि गन्ना किसानों की समस्याओं पर भी पूरा ध्यान दिया जाए, ताकि उनका प्रभावी समाधान सुनिश्चित किया जा सके।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार 280 रुपये प्रति क्विंटल की दर से गन्ना मूल्य का भुगतान किसानों को दिलाए जाने के लिए वचनबद्घ है। यादव ने पवार को बताया कि राज्य सरकार ने गन्ना किसानों के हित में कई कदम उठाए हैं। राज्य सरकार की मंशा है कि प्रदेश की सभी चीनी मिलें पेराई कार्य प्रारंभ कर दें और किसानों के खेत खाली हो जाएं, जिससे वे अगली फसल की बुआई कर सकें।

राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी देते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि इस पेराई सत्र के लिए गन्ने का मूल्य 280 रुपए प्रति क्विटंल रखा गया है। यह मूल्य गन्ना किसानों तथा चीनी मिलों, दोनों पक्षों के हितों को ध्यान में रखते हुए तय किया गया है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रूप से कहा कि जो पैकेज चीनी उद्योग के लिए बनाया जाए, उसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि चीनी मिलों को मिलने वाली वित्तीय सुविधा का उपयोग सर्वप्रथम गन्ना किसानों को पिछले वर्ष के बकाए के भुगतान में किया जाए। गन्ना किसानों के बकाए का भुगतान राज्य सरकार की प्राथमिकता है।

कानपुर के लिए आकर्षण बना मोदी का मंच

उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की रैली को लेकर लोगों के भीतर गजब का उत्साह देखा जा रहा है। मोदी के साथ खड़े होकर तस्वीर खिंचवाने की तमन्ना भले ही पूरी न हो लेकिन मोदी के आने से पहले ही उनके लिए बने भव्य मंच के सामने ही फोटो खिंचवाकर लोग खुश दिखाई दे रहे हैं।

भाजपा की विजय शंखनाद रैली के लिए तैयार किया गया मंच काफी भव्य है। काफी दिनों से इसे सजाने संवारने का काम चल रहा था, लेकिन शुक्रवार को कानपुरवासियों ने इसका दीदार किया। लोगों के बीच उत्सव सरीखा माहौल दिखाई दिया। शुक्रवार देर रात तक लोग परिवार सहित मोदी के रैली स्थल को देखने पहुंचे।

रैली स्थल की सैर करने पहुंचे लोगों ने भी जमकर अपनी इच्छा पूरी की। मोदी के लिए बनाए गए भव्य मंच के सामने खड़े होकर फोटो खिंचवाने का सिलसिला घंटों तक चलता रहा। मोदी के मंच की निगरानी और आसपास की सुरक्षा का जिम्मा गुजरात से आए हुए अधिकारियों ने अपने हाथों में ले लिया है। मोदी के खास और करीबी माने जाने वाले इन अधिकारियों के सुझावों के आधार पर ही भाजपा के पदाधिकारियों ने मंच को अंतिम रूप दिया है।

देशभर में अब तक हुई मोदी की हर रैली में अपेक्षा से अधिक भीड़ जुट चुकी है। प्रदेश में पहली रैली कानपुर में होने से भाजपाइयों को भीड़ का अनुमान भी कुछ बढ़ गया है। रैली में आने वाला कोई भी व्यक्ति बगैर मोदी को सुने व देखे न जाए इसके लिए भी व्यवस्थाएं की जा रही हैं। इंदिरा नगर में बुद्धापार्क के सामने खाली पड़े मैदान के 1.08 लाख वर्ग मीटर स्थान का प्रयोग रैली के लिए किया जा रहा है। रैली में तीन से साढ़े तीन लाख लोगों के जुटने का अनुमान लगाया जा रहा है।

भीड़ की वजह से कोई भी व्यक्ति रैली में मोदी को देखे बिना न लौटे, इसके लिए भाजपाइयों ने रैली स्थल से दो किलोमीटर की परिधि में मोदी को देखने और उनके भाषण को सुनने का प्रबंध किया है। मैदान के अंदर 10 और दो किलोमीटर परिधि में 17 एलसीडी स्क्रीन लगाई गई है। जाम या अन्य कारण से रैली स्थल तक न पहुंचने वाले लोगों को भी मोदी स्पष्ट आवाज के साथ एलसीडी स्क्रीन पर दिखाई देंगे। भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी मनीष शुक्ला ने बताया कि बेहतर प्रसारण के लिए 17 एलसीडी स्क्रीन वाले टेलीविजन लगाए गए हैं। मोदी की रैली को ऐतिहासिक माना जा रहा है। 

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अवकाश चाहिए तो रात 9 बजे आवास पर आइए!

उत्तर प्रदेश में लगातार यौन अपराध की घटनाएं सामने आ रही हैं| ताजा मामला अलीगढ़ का है जहां एक बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) ने तो सारी हदें ही पार कर दी| अलीगढ़ के बीसए पर एक महिला ने गंभीर आरोप लगत्ते हुए कहा है कि मातृत्व अवकाश को मंजूर कराने के लिए 'साहब' ने उन्हें आवास पर बुला लिया। नहीं गई तो फाइल महीनेभर उनके यहां पड़ी रही और छुट्टी मंजूर नहीं की गई। फिलहाल इस मामले को लेकर सपा के विधायक जफर आलम के नाराज होने पर सीडीओ ने आरोपों की जांच कराने का निर्देश दिया है।

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, जवां ब्लाक स्थित छेरत प्राइमरी विद्यालय की सहायक अध्यापक शाहिद परवीन ने बताया है कि उनके तीन महीने के बेटे की तबियत खराब होने के कारण एक सितंबर को खंड शिक्षा अधिकारी के यहां मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया था। उनकी संस्तुति के बाद पत्रावली नौ सितंबर को बीएसए कार्यालय आ गई। तब से अक्सर बीएसए कार्यालय पर जाती रहीं, लेकिन अवकाश स्वीकृत नहीं हुआ। तो एक दिन बीएसए साहब ने कहा कि यदि छुट्टी मंजूर करनी है रत को नौ बजे उनके आवास पर आना होगा| यह सूचना उसने यूपी उर्दू टीचर्स एसोसिएशन के जिलाध्यक्ष गुलजार अहमद को दी।

पीड़ित टीचर को अवकाश देने के लिए शहर विधायक जफर आलम ने भी बीएसए से बात की, लेकिन हुआ कुछ नहीं। एबीएसए उसे बच्चे को स्कूल लाने से भी रोकते हैं। ऐसे में टीचर क्या करे? सो, उन्हें धरना-प्रदर्शन को मजबूर होना पड़ा। शाम को शहर विधायक जफर आलम ने सीडीओ से फोन पर बात की। सीडीओ शमीम अहमद ने घटना को गंभीरता से लेते हुए जाँच के आदेश दे दिए हैं| वहीँ, इस घटना को बीएसए निराधार बता रहे हैं| उनका कहना है कि मैंने महिला को कभी भी घर आने के लिए नहीं कहा है हाँ रही बात छुट्टी की तो मैंने वह मंजूर कर दी है| 

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गांधी से जुड़ा है पुलिसिया कार्रवाई से त्रस्त ठाकुर चौबीसी का इतिहास

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी देश की आजादी की अलख जगाने ठाकुर चौबीसी में आए थे। अब यही ठाकुर बिरादरी रविवार की खेड़ा महापंचायत के बाद हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर अपने आपको उपेक्षित महसूस कर रही है। ठाकुर विरादरी की मानें तो युवाओं को फर्जी मुकदमों में फंसाया जा रहा है, जिससे उनके भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। 

उत्तर प्रदेश में मेरठ जिले में स्थित सरधना विधानसभा क्षेत्र के 24 गांवों को संयुक्त रूप से ठाकुर चौबीसी कहा जाता है। इन गावों में 95 प्रतिशत आबादी ठाकुरों की है। सरधना विधानसभा की सीमा बागपत, मुजफ्फरनगर से भी लगती है। बीते रविवार आयोजित की गई महापंचात में मौजूद लोगों पर पुलिस ने जमकर लाठियां भांजी थी, जिसमें कई लोग घायल हुए थे। 

ठाकुर चौबीसी के लोगों का कहना है कि गांधी जी तो यहां आजादी की अलख जगाने आए थे, लेकिन पुलिस की इतनी बड़ी कार्रवाई के बाद कोई हाल चाल पूछने तक नहीं आया। ठाकुर चौबीसी के गांव खेड़ा के हरपाल चौधरी ने बताया, "विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा चुनाव, ठाकुरों ने एक राय होकर जिसे चाहा, उसी राजनीतिक दल को वोट दिया। अब रविवार को खेड़ा महापंचायत के दौरान पुलिसिया कहर उन पर बरसा। सैकड़ों लोग घायल हुए। पुलिस ने फर्जी मुकदमे दर्ज कर उनकी गिरफ्तारी भी शुरू कर दी। चार हजार से अधिक लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए।"

रविवार की महापंचायत भाजपा विधायक संगीत सोम व सुरेश राणा पर रासुका व हिन्दुओं पर पुलिस प्रशासन द्वारा की जा रही एकपक्षीय कार्रवाई के विरोध में आयोजित की गई थी। मेरठ में भाजपा के जिलाध्यक्ष अजित चौधरी ने कहा, "महापंचायत के बाद अभी भी स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। लोग गांवों में पुलिस को घुसने नहीं दे रहे हैं।"

चौधरी ने बताया कि लोगों का आरोप है कि पुलिस ने पाली गांव में 100 बीघा गन्ने की खड़ी फसल महज इसलिए जला दी कि उसे अंदेशा था कि इसमें काफी लोग छुपे हुए हैं। चौधरी कहते हैं, "अब गांधी जी का जमाना गया। यहां लोग लाठियों से ही बात करते हैं। जिस तरह से महापंचायत में एकत्र हुए निरीह लोगों पर लाठियां बरसाई गईं, उससे काफी सबक मिला है और इसका जवाब भी उचित समय पर दिया जाएगा।"

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प्रेम और सद्भाव लाने में मदद करेगी कवाल की रामलीला

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुई हिंसा के बाद चारों तरफ बने अविश्वास के माहौल के बीच कवाल गांव में दोनों समुदाय के लोगों ने परंपरागत रामलीला का आयोजन करने का फैसला किया है। इसका मकसद समाज को यह संदेश देना है कि नफरत की आग में झुलसने के बाद भी उनका आपसी विश्वास पहले की तरह अटूट है।

कवाल गांव की रामलीला पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मशहूर है। करीब 66 साल से यहां दोनों समुदाय के लोग मिलकर रामलीला का आयोजन करते आ रहे हैं। हिंसा भड़कने के बाद इलाके में बने माहौल के बीच सवाल उठ रहे थे कि इस वर्ष रामलीला का आयोजन हो सकेगा या नहीं और यदि होगा भी तो इसमें पहले की तरह मुस्लिम समुदाय के लोग शिरकत करेंगे या नहीं।

लगभग 12 हजार की मिश्रित आबादी वाले कवाल गांव के प्रधान एवं रामलीला आयोजन समिति के सदस्य महेंद्र सिंह सैनी कहते हैं, "माहौल थोड़ा सामान्य होने के बाद जब मैंने मुस्लिम भाइयों से रामलीला के आयोजन और उनकी सहभागिता को लेकर बातचीत की तो उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि आपके मन में सहभागिता को लेकर संशय कैसे पैदा हुआ। यह बात सुनकर मेरी आंखों में आंसू भर आए।"

कवाल वही गांव है, जो हिंसा का वजह बना। इसी गांव में छेड़खानी की घटना को लेकर हुए विवाद में तीन हत्याएं होने के मामले के तूल पकड़ने के बाद जिले भर में हिंसा भड़की और लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। हिंसा में 47 लोगों की जानें चली गईं, हजारों लोग बेघर हो गए।

सैनी ने कहा, "हम लोग आज भी उस काले दिन को सोच कर सहम उठते हैं, जब हमारे गांव से उठी चिंगारी ने पूरे जिले और प्रदेश को झुलसा दिया। लेकिन हम सभी मानते हैं कि सियासतदानों ने अपने मुनाफे के लिए विवाद को तूल देकर नफरत की आग फैलाई और दो भाइयों को आपस में लड़ाया। इस तरह की साजिशें हमारे आपसी प्रेम और सद्भाव को कम नहीं कर पाएंगी।"

सैनी ने कहा, "हमारी रामलीला दोनों वर्गो के सहयोग से होती है। यह हमारे आपसी भाईचारे का जीता-जागता प्रतीक है। गुजरे वर्षो की तरह इस वर्ष भी दोनों समुदाय के लोग मिलकर रामलीला का आयोजन करेंगे। यह हिंसा हमारे बीच के विश्वास की दीवार नहीं तोड़ पाएगी।" कवाल की रामलीला में विभिन्न पात्रों की अदायगी हिंदू समुदाय के लोग करते हैं, और साजो-सामान, प्रकाश एवं ध्वनि व्यवस्था और वाद्य यंत्रों को बजाने का जिम्मा मुस्लिम समुदाय के लोग निभाते आए हैं।

रामलीला के दौरान ढोलक बजाने वाले निजामुद्दीन ने कहा, "हम मिलजुल कर रामलीला का आयोजन करके लोगों का मनोरंजन करने के साथ कौमी एकता और सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश भी देते हैं।" छह अक्टूबर से शुरू होने वाली रामलीला के लिए सभी पात्रों ने रिहर्सल शुरू कर दी है। लक्ष्मण का करदार निभाने वाले जगपाल ने कहा, "हम मानते हैं कि हिंसा के बाद जिले में लोगों के मन में जो तनाव और अविश्वास पैदा हुआ है, हमारी रामलीला उसे समाप्त करके प्रेम और सद्भाव लाने में मदद करेगी।" 

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साहस के प्रतिमूर्ति थे गोविंद बल्लभ पंत

उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री एवं देश के पूर्व गृह मंत्री गोविंद बल्लभ पंत अपने दृढ़ संकल्प और साहस के लिए आज भी श्रद्धापूर्वक याद किए जाते हैं। जाने-माने वकील गोविंद की धाक इतनी कि अंग्रेज सरकार उनके काशीपुर को 'गोविंदगढ़' कहने लगी। भारत रत्न पंत ने ही जमींदारी उन्मूलन कानून को प्रभावी बनाया था। पंत का जन्म 10 सितंबर 1887 को वर्तमान उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले के खूंट (धामस) नामक गांव के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इस परिवार का संबंध कुमाऊं की एक अत्यंत प्राचीन और सम्मानित परंपरा से है। पंतों की इस परंपरा का मूल स्थान महाराष्ट्र का कोंकण प्रदेश माना जाता है।

पंत ने 10 वर्ष की आयु तक घर पर ही शिक्षा ग्रहण की। गोविंद ने लोअर मिडिल की परीक्षा संस्कृत, गणित, अंग्रेजी विषयों में विशेष योग्यता के साथ प्रथम श्रेणी में पास की। इसके बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया तथा बीए में गणित, राजनीति और अंग्रेजी साहित्य विषय लिए।

इलाहाबाद में नवयुवक गोविंद को कई महापुरुषों का सान्निध्य एवं संपर्क मिला साथ ही जागरूक, व्यापक और राजनीतिक चेतना से भरपूर वातावरण मिला। 1909 में गोविंद वल्लभ पंत को कानून की परीक्षा में विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम आने पर 'लेम्सडैन' स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। 1910 में पंत ने अल्मोड़ा में वकालत की। बाद में वह काशीपुर आ गए। काकोरी कांड के आरोपियों के मुकदमे की पैरवी के लिए अन्य वकीलों के साथ पंत ने जी-जान से सहयोग किया। उस समय वे नैनीताल से स्वराज पार्टी के टिकट पर लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य भी थे। 1928 के साइमन कमीशन के बहिष्कार और 1930 के नमक सत्याग्रह में भी उन्होंने भाग लिया और मई 1930 में देहरादून जेल में बंद रहे।

मुकदमा लड़ने का उनका ढंग निराला था, जो मुवक्किल अपने मुकदमों के बारे में सही जानकारी नहीं देते थे, पंत उनका मुकदमा नहीं लेते थे। पंत की वकालत की काशीपुर में धाक थी। उन्हीं के कारण काशीपुर राजनीतिक तथा सामाजिक दृष्टियों से कुमाऊं के अन्य नगरों की अपेक्षा अधिक जागरूक था। अंग्रेज शासकों ने काशीपुर नगर को काली सूची में शामिल कर लिया। पंत के नेतृत्व के कारण अंग्रेज सरकार काशीपुर को 'गोविंदगढ़' कहती थी।

17 जुलाई 1937 से लेकर 2 नवंबर 1939 तक पंत ब्रिटिश शासित भारत में संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) के पहले मुख्यमंत्री बने। पंत 1946 से दिसंबर 1954 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। पंत को भूमि सुधारों में पर्याप्त रुचि थी। 21 मई, 1952 को जमींदारी उन्मूलन कानून को प्रभावी बनाया। मुख्यमंत्री के रूप में उनकी योजना नैनीताल तराई को आबाद करने की थी।

सरदार बल्लभ भाई पटेल के निधन के बाद पंत को केंद्रीय गृह मंत्री का दायित्व दिया गया। देश के गृह मंत्री के रूप में पंत का कार्यकाल 1955 से लेकर 1961 में उनके निधन तक रहा। भारत रत्न सम्मान उनके ही कार्यकाल में आरंभ किया गया। सन् 1957 में गणतंत्र दिवस के मौके पर महान देशभक्त, कुशल प्रशासक, सफल वक्ता, तर्क के धनी एवं उदारमना पंत जी को देश के सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' से विभूषित किया गया।

गोविंद बल्लभ पंत अच्छे नाटककार भी थे। उनका नाटक 'वरमाला' मरक डेय पुराण की एक कथा पर आधारित है। मेवाड़ की पन्ना नामक धाय के अलौकिक त्याग का ऐतिहासिक वृत्तांत लेकर उन्होंने नाटक 'राजमुकुट' की रचना की और 'अंगूर की बेटी' में उन्होंने मद्यपान के दुष्परिणाम दिखाकर सामाज को सचेत किया था।

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सपा दूसरे राज्यों में भी तलाश रही सियासी जमीन

लोकसभा चुनाव में दिल्ली की राजनीति में बड़ी भूमिका निभाने को आतुर समाजवादी पार्टी (सपा) ने उत्तर प्रदेश की राजनीतिक सीमाओं से परे अन्य सूबों में अपना जनाधार बढ़ाने की कयावद तेज कर दी है। सपा ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतकर लोकसभा चुनाव में 'किंगमेकर' बनने के साथ अपने ऊपर लगे 'क्षेत्रीय दल' के ठप्पे को भी हटाना चाहती है। 

सपा की बड़ी योजना दिल्ली, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों के विधानसभा चुनावों के अखाड़े में उतरकर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने और झारखंड, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक में जनाधार बढ़ाने की है, ताकि इसका फायदा वह लोकसभा चुनाव में उठा सके। राष्ट्रीय राजनीति में काफी दखल रखने और लोकसभा सदस्यों की संख्या के हिसाब से देश की सबसे बड़ी चार पार्टियों में शामिल होने के बावजूद सपा को अभी तक राष्ट्रीय दल का दर्जा प्राप्त नहीं है और वह एक राज्यस्तरीय दल ही है। 

सपा सूत्रों के मुताबिक, पार्टी के रणनीतिकारों की योजना अन्य राज्यों में सपा का दखल बढ़ाकर लोकसभा में किंगमेकर की भूमिका अदा करने के साथ पार्टी को राष्ट्रीय दल का दर्जा दिलाने की है। उत्तर प्रदेश की भौगोलिक परिधि से परे दूसरे राज्यों में दखल बढ़ाने की योजना के तहत ही सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव लगातार दौरे कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के बाद इसी मंशा से अखिलेश यादव ने झारखंड का दो दिन का दौरा किया और गुरुवार को रांची में एक कार्यकर्ता सम्मेलन में कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर हमला बोलकर झारखंड के लोगों को रिझाने की कोशिश की।

अखिलेश ने साफ किया कि आगामी लोकसभा चुनाव में सपा झारखंड सहित अन्य प्रदेशों में संगठन खड़ा करेगी। इसके लिए लगातार स्थानीय नेताओं द्वारा सम्मेलन आयोजित कर सपा की नीतियों का प्रसार किया जाएगा। उन्होंने कहा कि जिन संसदीय क्षेत्रों में पार्टी का संगठन मजबूत दिखेगा वहां सपा अपने उम्मीदवार खड़े करेगी।

सूत्रों के मुताबिक, तीसरे मोर्चे की संभावनाओं के मद्देनजर सपा लोकसभा चुनाव में एक बड़ी ताकत बनना चाहती है। तीसरा मोर्चा बनने की स्थिति में सपा के पास अगर 40 से 50 सीटें रहीं तो वह गठबंधन सरकार की अगुवा तो रहेगी ही, साथ ही उसके नेता मुलायम सिंह यादव के प्रधानमंत्री बनने के सपने को भी पंख लग जाएंगे।

सपा के प्रवक्ता एवं उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री राजेंद्र चौधरी ने कहा कि सपा की नीतियों के प्रति अब देशव्यापी उत्सुकता है। कई राज्यों में इसके संगठन का विस्तार हुआ है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, राजस्थान झारखंड एवं मध्य प्रदेश का दौरा कर सपा के वरिष्ठ नेता वहां पार्टी संगठन को नई गति दे आए हैं। वहां हुई विशाल सभाओं से संकेत मिलता है कि सपा की लोकप्रियता कितनी तेजी से बढ़ रही है। 

चौधरी ने कहा कि जनता मंहगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से त्रस्त है। भाजपा और कांग्रेस के पास इन समस्याओं का कोई समाधान नहीं है। जनता अब अपने सवालों के जवाब चाहती है और विकल्प के रूप में तीसरी ताकतों की ओर आशा भरी निगाहों से देख रही है।

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अरे ! यहां तो हाथी भी हो गये कच्ची के शौकीन

‘‘सबको मालूम है, मैं शराबी नहीं, फिर भी कोई पिलाये तो मैं क्या करुं....‘‘ पंकज उधास की यह गजल वैसे तो शराब के शौकीनों द्वारा काफी पसंद की जाती है लेकिन आज कल यह गजल जनपद लखीमपुर खीरी के सिंगाही क्षेत्र के जंगली हाथियों पर बिल्कुल सटीक बैठ रही हैं। कहा जाता है कि जब आदमी शराब पीना शुरू करता है और उसका आदी हो जाता है तो उसकी लत जल्दी नही छूटती और उसी लत के चलते वह कभी कभी बेचैन होने लगता है। यहां कुछ ऐसा ही हाल जंगली हाथियों का है। प्राप्त जानकारी के अनुसार जनपद के सिंगाही क्षेत्र में नेपाल बार्डर की एसएसबी कृष्णा नगर की चैकी के पास आधा दर्जन हाथियों का झुण्ड लहन पीकर बेहोश होकर जमीन पर लुढ़क गया। जंगल से निकल कर हाथी किसानों की धान, गन्ना ,और मक्के की फसल को तो बर्बाद कर ही रहे थे इसके साथ ही जंगल किनारे अवैध कच्ची शराब बनाने वाले कारेाबारी भी अब हाथियों के निशाने पर आ गये है। जंगल से निकल कर फसल नष्ट करने के इरादे से बाहर आये जंगली हाथियों के एक झुण्ड ने शराब बनाने के लिये रखी गयी लहन का क्या सेवन कर लिया कि अब शायद यह उनकी पहली पसन्द बन गया है। 

कहने सुनने में शायद यह बात अजीब जरुर लगती होगी लेकिन हकीकत यही है कि जंगली हाथी अब कच्ची शराब के शौकीन हो गये हैं। क्षेत्र में सैकड़ो एकड़ गन्ना, धान, मक्का की फसल हाथियो की भेंट चढ़ चुकी है, हालत यह है कि जहां एक ओर लोग बाग अब अपनी फसलों को बचाने के लिये खेतों पर जाने से भी डरने लगे है। वहीं दूसरी ओर अब जंगल के किनारे अवैध कच्ची शराब बनाने वाले भी हाथियों के निशाने पर आ गयें है। आबकारी व पुलिस विभाग की मिलीभगत के चलते कच्ची शराब बनाने वाले कारोबारी जंगल के किनारे का ही इलाका चुनते है वहीं वह लोग कच्ची बनाने के लिये ड्रम में पानी भरकर उसमें गुड, खाण्डसारी, या शीरा मिला देते है, और कुछ दिनो के लिये छोड़ देते है। दो तीन दिन के बाद यह लहन कच्ची शराब बनाने के लिये तैयार हो जाता हैं। इस लहन से वह लोग दारू निकाले इससे पहले ही जंगली हाथियों का झुण्ड जंगल से बाहर आया और उनकी नजर लहन वाले ड्रम पर पड गयी और हाथियों ने जी भरकर उसे पी लिया। जब उनके उपर कच्ची का असर हुआ तो हाथियों ने क्षेत्र में जमकर उत्पात मचाया हाथियो के उत्पात से कच्ची बनाने वालो ने किसी प्रकार भाग कर अपनी जान बचाई। कच्ची का चस्का हाथियो को इस कदर लगा है कि अब हाथी कच्ची शराब के बगैर नहीं रह पा रहे है और हाथियों को कच्ची दारु की तलाश रहने लगी है। जंगल से निकल कर हाथियो के झुण्ड अब सबसे पहले कच्ची के लहन को ढूंढते नजर आते है। इसके चलते अब किसानो के साथ कच्ची बनाकर आजिविका चलाने वालो के सामने रोजी रोटी का संकट खडा हो गया है। कुछ ऐसा ही जनपद के सिंगाही क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम महराजनगर, पचपेडा माझा, बघौडिया, रहीमपुरवा, इच्छानगर, रामनगर, में हुआ जहाँ कच्ची के सहारे रोजी रोटी कमाने वाले लोगो की लहन को हाथी पी गये और जब उन्हें नशा चढ़ा तो कच्ची बनाने वालों की शामत आ गयी। 

कच्ची शराब बनाने के लिए रखी जाने वाली लहन में चूकिं गुड और खाण्डसारी के अलावा कुछ अन्य मादक वस्तुयें भी कारोबारी मिलाते है, जिसके कारण लहन स्वादिष्ट हो जाती है। लोगों के अनुसार इसका नशा भी ठीक ठाक चढ़ता है, इस कारण हाथी उसे खूब पसन्द कर रहे है। हाथियों को कच्ची का स्वाद मिल जाने के कारण अब किसानो के साथ कच्ची बनाने वाले भी हाथियों के निशाने पर आ गये है। वैसे जब हाथियों का झुण्ड जंगल से निकलकर किसानों की फसलें तबाह करते थे तब किसान उन्हें गोले व पटाखे दगाकर भगा देते थे लेकिन अब ऐसा नही है। बताया जाता है कि शराबी हाथियों मे से एक हांथी बहरा भी है जो किसी की भी नही सुनता है। एक तो बहरा दूसरे कच्ची के नशे में धुत उस हाथी पर गोले व पटाखों का कोई असर नहीं होता हैं और वह वहां से जाने का नाम ही नही लेता है लेकिन इससे वन विभाग को कोई मतलब नही है वन विभाग के ही नक्शे कदम पर चलता हुआ पुलिस विभाग भी जान कर भी अनजान बना हुआ हैं। हाथी गरीब किसानों की चाहे जितनी फसल बर्बाद करे उससे किसी को फर्क नही पड़ता मगर यदि कोई व्यक्ति जंगल में पेड़ों से गिरी हुयी जलौनी लकड़ी अगर बीन बटोर लेता है तो उससे फारेस्ट विभाग व पुलिस विभाग दोनो अपनी जेबें भरने के लिए पूरी कानूनी कार्यवाही दिखाते हुए अपनी जेबें भरने से बाज नहीं आते हैं। एक ओर जहां फसल बचाव के लिय लोग अपने आप हाथियों को भगाने हेतु उपचार में जुट जातेे है। वहीं दूसरी ओर कच्ची शराब पीने का मजा ले चुके हाथियों का झुण्ड नशेड़ी हो चुका है और वह अब मानने वाले नही है, इसीलिए वह प्रतिदिन जंगल से बाहर आ रहे है। आज इंडो नेपाल बार्डर की कृष्णा नगर की एस एस बी चैकी के पास लगभग आधादर्जन हाथी जहरीली कच्ची शराब बनाने वाली लहन को पीकर बेहोश होकर जमीन पर लुढ़क गये और घण्टों वहीं पड़े रहे। नशा उतरने के बाद लोगों द्वारा काफी मशक्कत के बाद उन्हें वहां से भगाया जा सका। 

यदि आबकारी विभाग व पुलिस विभाग द्वारा क्षेत्र में अवैध शराब के कारोबारियों द्वारा बनायी जा रही अवैध कच्ची शराब पर यदि समय रहते अंकुश नहीं लगाया गया तो नशे के आदी हो चुके हाथियों द्वारा कभी भी मचाई जाने वाली किसी भी प्रलयंकारी घटना से इंकार नहीं किया जा सकता। 

लखीमपुर-खीरी से एसडी त्रिपाठी की रिपोर्ट

सरयू का अस्तित्व संकट में

उत्तर प्रदेश में खैरीगढ़ स्टेट की राजधानी रही सिंगाही एक समृद्ध सांस्कृतिक संस्कृति को संजोये हुए है। कस्बे से एक किलोमीटर उत्तर में भूल-भुलैया स्थित है तो दूसरी ओर वास्तुकला की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण शिव मंदिर है। सरयू नदी पहले इसी शिव मंदिर के पास से बहती थी लेकिन वर्तमान में लगभग एक किलोमीटर सिंगाही के जंगलों में सटकर बह रही है। इसका अस्तित्व सिंगाही व बेलरायां झील से अयोध्या तक रह गया है।

मयार्दा पुरुषोत्तम श्रीराम के अवतरण व लीला परधाम गमन की साक्षी रही सरयू का उद्गम स्थल यूं तो कैलाश मानसरोवर माना जाता है लेकिन अब यह नदी सिंगाही जंगल की झील से श्रीराम नगरी अयोध्या तक ही बहती है। भौगोलिक कारणों से इस नदी का अस्तित्व संकट में दिखाई देता है। मत्स्य पुराण के अध्याय 121 और वाल्मीकि रामायण के 24वें सर्ग में इस नदी का वर्णन है। कहा गया है कि हिमालय पर कैलाश पर्वत है, जिससे लोकपावन सरयू निकली है, यह अयोध्यापुरी से सटकर बहती है। वामन पुराण के 13वें अध्याय, ब्रह्म पुराण के 19वें अध्याय और वायुपुराण के 45वें अध्याय में गंगा, जमुना, गोमती, सरयू और शारदा आदि नदियों का हिमालय से प्रवाहित होना बताया गया है।

सरयू का प्रवाह कैलाश मानसरोवर से कब बंद हुआ, इसका विवरण तो नहीं मिलता लेकिन सरस्वती और गोमती की तरह इसका भी प्रवाह भौगोलिक कारणों से बंद होना माना जाता रहा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार सरयू, घाघरा और शारदा नदियों का संगम तो हुआ ही है, सरयू और गंगा का संगम श्रीराम के पूर्वज भगीरथ ने करवाया था। 

सरयू का भगवान विष्णु के नेत्रों से प्रगट होना बताया गया है। 'आनंद रामायण' के यात्रा कांड में वर्णित है कि प्राचीन काल में शंकासुर दैत्य ने वेद को चुराकर समुद्र में डाल दिया और स्वयं वहां छिप गया। भगवान विष्णु ने मत्स्य रूप धारण कर दैत्य का वध किया और ब्रह्मा को वेद सौंप कर अपना वास्तवित स्वरूप धारण किया। उस समय हर्ष के कारण भगवान विष्णु की आंखों में प्रेमाश्रु टपक पड़े। ब्रह्मा ने उस प्रेमाश्रु को मानसरोवर में डालकर उसे सुरक्षित कर लिया। इस जल को महापराक्रमी वैवस्वत महाराज ने बाण के प्रहार से मानसरोवर से बाहर निकाला। यही जलधारा सरयू नदी कहलाई। बाद में भगीरथ अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाया और उन्होंने ने ही गंगा और सरयू का संगम करवाया।

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मुस्लिमों को लुभाने के लिए सपा का ट्रंप कार्ड

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर उत्तर प्रदेश में मुसलमान मतदाताओं को अपने पाले में करने की खींचतान के बीच समाजवादी पार्टी (सपा) ने ट्रंप कार्ड चल दिया है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव की सरकार ने सरकारी योजनाओं में अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने का निर्णय किया है। सरकार की इस निर्णय को मुसलमान मतदाताओं को लुभाने के कदम के रूप में देखा जा रहा है। 

बीते सप्ताह सपा सरकार ने राज्य सरकार द्वारा संचालित 30 विभागों की 85 योजनाओं में अल्पसंख्यकों को 20 प्रतिशत आरक्षण देने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तरफ से इस निर्णय के पीछे तर्क दिया गया कि अल्पसंख्यक वर्ग को समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए शैक्षिक, आर्थिक व सामाजिक दूष्टि से विभिन्न आयोगों द्वारा विचार किया गया। यह आवश्यकता अनुभव की जा रही थी कि उन्हें भी समाज के अन्य वर्गो की भांति अवसर उपलब्ध कराते हुए सभी प्रकार की सुविधाएं इस प्रकार सुलभ कराई जाएं कि इन समुदायों को भी पिछड़ेपन से मुक्त करते हुए समाज की मुख्यधारा में लाया जा सके।

उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यक आबादी करीब 19 प्रतिशत है, जिसमें से करीब 16 प्रतिशत मुसलमान हैं। राज्य की करीब 30 लोकसभा सीटें ऐसी जहां पर मुसलमान नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में सपा उन्हें अपने पाले में रखना चाहती है। कानून व्यवस्था, भ्रष्टाचार, बिजली संकट, बाढ़ जैसे तमाम मुद्दों पर घिरी अखिलेश सरकार का ये कदम आगामी लोकसभा चुनाव में अल्संख्यकों, खासकर मुसलमानों को खुश करने के रूप में देखा जा रहा है।

दरअसल, सपा को अंदेशा है कि विधानसभा चुनाव में सपा को वोट देने वाले मुस्लिम मतदाता का मूड लोकसभा चुनाव के समय बदल सकता है। वे सपा को अनदेखा कर कांग्रेस की तरफ जा सकते हैं, इसलिए सपा नेतृत्व ने आरक्षण का निर्णय लेकर बड़ा ट्रंप कार्ड खेला है।

सपा के प्रदेश प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि यह किसी का तुष्टीकरण नहीं, बल्कि समाज के पिछड़ों और वंचितों को विशेष अवसर देने के राम मनोहर लोहिया के सिद्धांत को अमली जामा पहनाने का प्रयास है। इसे वोट बैंक की राजनीति के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

वह कहते हैं कि कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने अपने शासनकाल में मुस्लिमों का इस्तेमाल सिर्फ वोट बैंक की तरह किया और भाजपा का तो मुस्लिम विरोध जगजाहिर है। ताजा राजनीतिक हालात में पार्टी नेतृत्व को लगता है कि अगर मुसलमान और पिछड़ा वर्ग सपा के साथ रहा तो लोकसभा सीटें जीतने में उसकी स्थिति नंबर एक पर रहेगी। अखिलेश द्वारा हाल में पिछड़े वर्ग के चार नेताओं को कैबिनेट मंत्री का पद देने से ऐसे संकेत मिलते हैं। 

उधर, कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि अल्पसंख्यक समुदाय में सरकार के विरुद्ध बढ़ती हुई नाराजगी और आने वाले लोकसभा चुनाव में अल्पसंख्यक वोटों के खिसकने के डर से सपा सरकार ने 20 प्रतिशत भागीदारी देने के नाम पर प्रदेश के अल्पसंख्यक समाज पर डोरा डाला है।

कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता मारूफ खान कहते हैं कि विधानसभा चुनाव में सपा ने अपने घोषणापत्र में मुसलमानों को 18 प्रतिशत आरक्षण देने की बात कही थी जिसे पूरा न किए जाने से मुसलमानों में बढ़ती नाराजगी और अल्पसंख्यक हितों से जुड़े तमाम मुद्दों से अल्पसंख्यक समुदाय का ध्यान हटाने के लिए यह सिर्फ एक शिगूफा है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक कहते हैं कि सपा अल्पसंख्यकों के हित के नाम पर केवल मुस्लिम वर्ग को लाभ पहुंचाकर तुष्टीकरण की नीति पर काम कर रही है। उसका मकसद मुसलमानों का भला नहीं, बल्कि उनका वोट लेना है।

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राम की अयोध्या बनी सियासत का कुरूक्षेत्र!

उत्तर प्रदेश में राम की नगरी अयोध्या एक बार सियासत का कुरूक्षेत्र बन गयी है। सियासत की इस अयोध्या रूपी बिसात पर विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) जहां अपनी 84 कोसी परिक्रमा को लेकर अडिग है वहीं राज्य सरकार ने भी इस परिक्रमा को रोकने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। 

विहिप और राज्य सरकार के टकराव के बीच अब इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) भी कूद पड़ा है तो भारतीय जनता पार्टी ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। आरएसएस के प्रवक्ता राम माधव ने इलाहाबाद में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान खुलेआम यह घोषणा कर दि कि आरएसएस भी संतों का पूरा सहयोग करेगा। संघ सूत्रों के मुताबिक 84 कोसी परिक्रमा जिन छह जिलों से गुजरनी है वहां संघ ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। राम माधव ने कहा, राज्य सरकार यदि संतों से टकराएगी तो उसका सत्तामद चूर-चूर हो जाएगा।

माधव के बयान से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि विहिप के साथ ही संघ भी 84 कोसी परिक्रमा के बहाने अपनी खोई हुई जमीन हासिल करना चाहता है। संघ सूत्रों ने बताया कि संघ की शाखाएं पहले गांवों में खूब लगा करती थीं लेकिन बीते एक दशक में इतनी भारी कमी आयी है। संघ की पकड़ जैसे जैसे गावों से ढीली हुई वैसे-वैसे भाजपा का जनाधार भी घटता चला गया। 

विहिप के सूत्र बताते हैं कि 84 कोसी परिक्रमा पर प्रतिबंध लगने के बावजूद विहिप ने संतों की भीड़ जुटाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा दिया है। अयोध्या में लगने वाले सावन मेले में करीब 5 हजार से अधिक संत अन्य राज्यों से यहां आए हुए हैं। विहिप की रणनीति बाहर से आए उन संतांे को मठों में रोकना और परिक्रमा में शामिल होने का निवेदन करना है।

विहिप के प्रांतीय प्रवक्ता शरद शर्मा भी यह स्वीकार करते हैं कि मठ-मंदिरों में जाकर अयोध्या में होने वाली 84 कोसी परिक्रमा में शामिल होने का निवेदन किया जाएगा। उनके रहने का इंतजाम अलग अलग जगहों पर गांवों में किया जाएगा। लोग भी संतो के ठहरने की सूचना से काफी खुश हैं। इस बीच विहिप की रणनीति को भांपते हुए प्रशासन ने भी अयोध्या में लगे सावन मेले के समाप्त होने के साथ ही बाहर से आए साधु संतों को वापस भेजने की रणनीति तैयार कर रहा है। 

अधिकारिक सूत्रों के मुताबिक स्थानीय प्रशासन इस दिशा में पहल कर रहा है और उसने कई टीमें गठित करने का फैसला किया है जो अलग अलग मठों में जाकर बाहर से आए संतों को वापस जाने का निवेदन करेगी। प्रशासन को भी इस बात का अंदाजा है कि बाहर से आए हजारों संत विहिप की ताकत बन सकते हैं।

सूत्रों ने यह भी बताया कि प्रशासन की ओर से खुफिया विभाग को भी भीड़ पर नजर रखने की जिम्मेदारी सौंपी है और अधिकारियों द्वारा उन जगहों को चिन्हित किया जा रहा है जहां आवश्यकता पड़ने पर अस्थायी जेलें बनायी जा सकें। इधर, 84 कोसी परिक्रमा को लेकर भाजपा ने भी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। भाजपा की तरफ से यही कहा जा रहा है कि परिक्रमा पर सरकार लोग नहीं सकती। विहिप का साथ देने के सवाल पर भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक कहते हैं, सरकार कुतर्कों के सहारे संतों की यात्रा रोक रही है। सरकार को संतों को परिक्रमा करने की इजाजत देनी चाहिए और सरकार को यात्रा की सुरक्षा का प्रबंध करना चाहिए ताकि सौहार्दपूर्ण वातावरण में यात्रा सम्पन्न हो सके।

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हिन्दू के लिए ‘देव’ और सपेरों की ‘रोजी-रोटी’ हैं नाग!

नागपंचमी में हिन्दू समाज जिस नाग को ‘देवता’ मान पूजा-अर्चना करता है, वह हिन्दू समाज के ही अनुसूचित वर्गीय सपेरा समुदाय की सिर्फ ‘रोजी-रोटी’ है। इनके मासूम बच्चे जहरीले सांपों के साथ खेल कर अपना सौख पूरा करते हैं और स्कूल जाने की जगह ‘पिटारी’ और ‘बीन’ बजाने के गुर सीखने को मजबूर हैं।

इस देश में हिन्दू समाज में एक वर्ग ऐसा भी है जो बेहद मुफलिसी का जीवन गुजार रहा है। उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड़ की सीमा से सटे इलाहाबाद जिले के शंकरगढ़ इलाके में आधा दर्जन गांवों में अनुसूचित वर्गीय सपेरा समाज के करीब साढ़े चार सौ परिवार आबाद हैं, इनका सुबह से शाम तक दैनिक कार्य जहरीले सांप पकड़ना और ‘बीन’ के इशारे पर नचा कर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना है। सपेरा समुदाय का आर्थिक ढांचा बेहद कमजोर होने वह अपने बच्चों को खिलैनों की जगह जहरीले सांप और स्कूली बस्ते के स्थान पर सांप पालने वाली ‘पिटारी’ और ‘बीन’ थमा देते हैं, ताकि आगे चल कर इस पुश्तैनी पेशे से जुड़े रहें।

शंकरगढ़ के सहने वाला सपेरा बाबा दिलनाथ बताता है कि ‘करीब आधा दर्जन गांवों में उनकी बिरादरी के साढ़े चार सौ परिवार पीढि़यों से आबाद हैं। सरकार ने सांप पकड़ने और उनके प्रदर्शन करने में रोंक तो लगा दी है, मगर रोटी का अन्य ‘सहारा’ नहीं दिया, जिससे चोरी छिपे सांप नचाना मजबूरी बना हुआ है।’ वह बताता है कि ‘सांप मांसाहारी जीव है, यह कभी दूध नहीं पीता, भगवान शिव का श्रंगार मान अधिकांश हिन्दू इसे देवता मानते हैं, लेकिन हमारे लिए यह सिर्फ ‘रोजी-रोटी’ है।

सपेरों का एक कुनबा बांदा जिले के अतर्रा कस्बे में नागपंचमी के त्योहार में बरसाती की पन्नी डाल कर डेरा जमाए है, इस कुनबे के 13 वर्षीय बालक चंद्रनाथ को ‘पिटारी’ और ‘बीन’ उसके पिता ने बिरासत में दिया है। वह कस्बे में घूम-घूम कर जहरीले सांपों का प्रदर्शन कर रहा है, उसने बताया कि ‘वह भी पढ़-लिख कर बड़ा आदमी बनना चाहता है, लेकिन परिवार की माली हालत उसे पुश्तैनी पेश में खींच लायी है। यह संवाददाता शनिवार की सुबह जब सपेरों की इस झोपड़ी में गया तो वहां नजारा देख भौंचक्का रह गया। मासूम बच्चे शनि, बली और चंदू मिट्टी के खिलौनों से नहीं, बल्कि जहरीले सांप और विषखापर से खेल रहे थे। कुनबे में मौजूद महिला सोमवती ने बताया कि ‘मिट्टी के खिलौना खरीदने के लिए पैसे नहीं है, सो बच्चे इन्हीं सांपों से खेल कर अपना सौख पूरा कर लेते हैं।’

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बुंदेलखंड में अब नहीं सुनाई देते सावन के गीत

'झूला तो पड़ गयो अमवा की डार मा.' सावन का महीना आते ही बुंदेलखंड के हर बगीचे में झूले पड़ जाया करते थे और बुंदेली महिलाएं 'ढोल-मंजीरे' की थाप में इस तरह के सावन के गीत गाया करती थीं। लेकिन, अब जहां एक ओर बगीचे नहीं बचे, वहीं दूसरी ओर सावन गीत के स्वर दूर-दूर तक नहीं सुनाई दे रहे। 

बुंदेलखंड पुरानी परम्पराओं व रिवाजों का गढ़ रहा है। यहां हर तीज-त्यौहार बड़े ही हर्षोल्लास और भाईचारे के साथ मनाने का रिवाज रहा है। सावन का महीना आते ही बाग-बगीचों में झूले पड़ जाया करते थे और बुंदेली महिलाएं दो गुटों में बंट कर 'ढोल-मंजीरे' की थाप में मोरों की आवाज के बीच सावन गीत गाया करती थीं। 

इन्हीं गीतों के साथ ससुराल से नैहर वापस आईं बेटियां झूलों में 'पींग' भरती थीं। अब यह गुजरे जमाने की बात हो गई है। बुंदेलखंड के लोग अपने हरे-भरे आम के बागों का नामोशिान मिटा रहे हैं। इससे न तो झूले डालने की गुंजाइश बची है और न ही महिलाएं गीत गाती नजर आ रहीं हैं। रही बात राष्ट्रीय पक्षी मोर की तो वह यदा-कदा ही दिखाई दे रहे हैं।

बांदा जिले के तेन्दुरा गांव की बुजुर्ग महिला सुरतिया कहती हैं, "एक दशक पूर्व तक इस गांव के चारों तरफ बस्ती से लगे हुए कई आम के बगीचे थे, जहां सावन मास में झूले लगा करते थे।" 

इसी गांव के एक अन्य बुजुर्ग देउवा माली ने बताया, "पहले हर किसी के मन में बेटियों के प्रति सम्मान हुआ करता था, अब राह चलते छेड़छाड़ की घटनाएं हो रही हैं। साथ ही आपसी सामंजस्य व भाईचारा नहीं रह गया, जिससे बेटियों को दूर-दराज बचे बगीचों में भेजने से डर लगता है।"

आंवले के पेड़ में प्रकट हुए हनुमान!

आधुनिकता के इस युग में भी अंधविश्वास सिर चढ़कर बोल रहा है। कुछ लोगों ने उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के बिठवल खुर्द गांव में एक आंवले की कटी डाल में उभरी आकृति को 'हनुमान' के अचानक प्रकट होने का सिर्फ ढिंढोरा ही नहीं पीटा, बल्कि पूजा-अर्चना शुरू कर वहां मंदिर निर्माण तक की योजना बना डाली है। 

हुआ यह कि बिठवल खुर्द गांव में बब्बन सिंह के दरवाजे पर एक काफी पुराना आंवले का पेड़ है। उसकी बढ़ी हुई डालों के कारण आम रास्ता प्रभावित हो रहा था, इसलिए बब्बन सिंह ने कुछ दिन पूर्व डालियों की छटनी करा दी। फिर क्या था, कटी डाल के हिस्से से हनुमान के चेहरे जैसी आकृति उभर आई। शनिवार को गांव के ग्रामीणों की नजर पड़ी तो वह इसे एक चमत्कार मान बैठे और उस आकृति में घी-सिंदूर का लेपन कर पूजा-अर्चना शुरू कर दी। 

अब रोजाना यहां भक्तों की भीड़ जमा हो रही है। गांव के कुछ अति उत्साही युवकों ने इस स्थान पर अखंड रामचरित मानस का पाठ भी शुरू करवा दिया है। गांव के युवक अरविंद सिंह ने बताया कि इस स्थान पर हनुमान मंदिर निर्माण के लिए एक पांच सदस्यीय टीम गठित की गई है, जो आस-पास के गांवों में घूमकर चंदा इकट्ठा कर रही है। 

अरविंद ने बताया कि शीघ्र ही यहां एक भव्य हनुमान मंदिर का निर्माण कराया जाएगा। एक अन्य युवक मुन्ना सिंह ने बताया कि आंवले के पेड़ में उभरी आकृति हूबहू हनुमान जी जैसी है। आस-पास के गांव के भी सैकड़ों लोग यहां रोजाना दर्शन और पूजन करने आ रहे हैं।

दातापंथी साधु दाता सत्बोध साईं का कहना है कि यह कोई चमत्कार नहीं है। पेड़ की कटी डाल में कोई भी आकृति उभर सकती है। वह कहते हैं कि यह इत्तेफाक ही है कि आकृति हनुमान के चेहरे जैसी है। मगर इसे हनुमान का दर्जा देना किसी अंधविश्वास से कम नहीं है।