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बहुत ही गुणकारी है अलसी

अलसी, तीसी, अतसी, कॉमन फ्लेक्स और वानस्पतिक लिनभयूसिटेटिसिमनम नाम से विख्यात तिलहन अलसी के पौधे बागों और खेतों में खरपतवार के रूप में तो उगते ही हैं, इसकी खेती भी की जाती है। इसका पौधा दो से चार फुट तक ऊंचा, जड़ चार से आठ इंच तक लंबी, पत्ते एक से तीन इंच लंबे, फूल नीले रंग के गोल, आधा से एक इंच व्यास के होते हैं। इसके बीज और बीजों का तेल औषधि के रूप में उपयोगी है। अलसी की पुल्टिस का प्रयोग गले एवं छाती के दर्द, सूजन तथा निमोनिया और पसलियों के दर्द में लगाकर किया जाता है। इसके साथ यह चोट, मोच, जोड़ों की सूजन, शरीर में कहीं गांठ या फोड़ा उठने पर लगाने से शीघ्र लाभ पहुंचाती है। 

अलसी आधुनिक युग में स्त्रियों की यौन-इच्छा, कामोत्तेजना, चरम-आनंद विकार, बांझपन, गर्भपात, दुग्धअल्पता की महान औषधि है। स्त्रियों की सभी लैंगिक समस्याओं के सारे उपचारों से सर्वश्रेष्ठ और सुरक्षित है अलसी। ( व्हाई वी लव और ऐनाटॉमी ऑफ लव)  की महान लेखिका, शोधकर्ता और चिंतक हेलन फिशर भी अलसी को प्रेम, काम-पिपासा और लैंगिक संसर्ग के लिए आवश्यक सभी रसायनों जैसे डोपामीन, नाइट्रिक ऑक्साइड, नोरइपिनेफ्रीन, ऑक्सिटोसिन, सीरोटोनिन, टेस्टोस्टिरोन और फेरोमोन्स का प्रमुख घटक मानती है|

सबसे पहले तो अलसी आप और आपके जीवनसाथी की त्वचा को आकर्षक, कोमल, नम, बेदाग व गोरा बनायेगी। आपके केश काले, घने, मजबूत, चमकदार और रेशमी हो जायेंगे। अलसी आपकी देह को ऊर्जावान और मांसल बना देगी।शरीर में चुस्ती-फुर्ती बनी गहेगी, न क्रोध आयेगा और न कभी थकावट होगी। मन शांत, सकारात्मक और दिव्य हो जायेगा। अलसी में ओमेगा-3 फैट, आर्जिनीन, लिगनेन, सेलेनियम, जिंक और मेगनीशियम होते हैं जो स्त्री हार्मोन्स, टेस्टोस्टिरोन और फेरोमोन्स ( आकर्षण के हार्मोन) के निर्माण के मूलभूत घटक हैं। टेस्टोस्टिरोन आपकी कामेच्छा को चरम स्तर पर रखता है। अलसी में विद्यमान ओमेगा-3 फैट और लिगनेन जननेन्द्रियों में रक्त के प्रवाह को बढ़ाती हैं, जिससे कामोत्तेजना बढ़ती है।

इसके अलावा ये शिथिल पड़ी क्षतिग्रस्त नाड़ियों का कायाकल्प करती हैं जिससे मस्तिष्क और जननेन्द्रियों के बीच सूचनाओं एवं संवेदनाओं का प्रवाह दुरुस्त हो जाता है। नाड़ियों को स्वस्थ रखने में अलसी में विद्यमान लेसीथिन, विटामिन बी ग्रुप, बीटा केरोटीन, फोलेट, कॉपर आदि की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अलसी को धीमी आँच पर हल्का भून लें। फिर मिक्सर में पीस कर किसी एयर टाइट डिब्बे में भरकर रख लें। रोज सुबह-शाम एक-एक चम्मच पावडर पानी के साथ लें। इसे अधिक मात्रा में पीस कर नहीं रखना चाहिए, क्योंकि यह खराब होने लगती है। इसलिए थोड़ा-थोड़ा ही पीस कर रखें। अलसी सेवन के दौरान पानी खूब पीना चाहिए। इसमें फायबर अधिक होता है, जो पानी ज्यादा माँगता है।

अलसी हमारी पाचन शक्ति बढ़ाती है और हमारे शरीर को ऊर्जा देने में सहायता करती है। अलसी के बीजों में फाइबर, विटामिन्स तथा प्रोटीन्स प्रचुर मात्रा में मौजूद होते हैं। प्रोटीन्स शरीर के सही विकास  में सहायक होते हैं। अलसी में फाइबर की मात्रा उच्च होने के कारण कोलोन का स्वास्थ्य बरकरार रहता है और आंतडिय़ों की गतिविधि में सुधार होता है। अलसी के बीजों में मौजूद फाइटो-एस्ट्रोजैन्स महिलाओं में रजोनिवृत्ति के बाद के लक्षणों से लडऩे में सहायक होते हैं। माहवारी के दौरान जिन महिलाओं को अत्यधिक पेट दर्द होता है, वे अलसी के बीजों से इस दर्द से राहत पा सकती हैं। एक छोटा चम्मच अलसी के बीजों को चबाने से आपको पेट संबंधी समस्याओं तथा पैप्टिक अल्सर से छुटकारा मिल सकता है। 

अलसी के नियमित सेवन से स्त्रियों के स्तनों में वृद्धि होती है। गर्भवती स्त्री के स्तनों में दूध बढ़ाने के लिए भी इसे खाने की सलाह दी जाती है। साथ ही अलसी के बीज महिलाओं में सेक्स के प्रति दिलचस्पी जाग्रत करते हैं। यौनांगों में जलन और योनि संकुचन जैसी बीमारियों के लिए तो इसे अचूक औषधि माना गया है। इसके अलावा मासिक धर्म से संबंधित परेशानियों में भी इसके द्वारा इलाज किया जाता है। अलसी के लगातार सेवन से चेहरे पर भी कांति आती है।

दूसरा एक तरीका है कि आप अलसी को सूखी कढ़ाई में डालिये, रोस्ट कीजिये (अलसी रोस्ट करते समय चट चट की आवाज करती है) और मिक्सी से पीस लीजिये| इन्हें थोड़े दरदरे पीसिये, एकदम बारीक मत कीजिये| भोजन के बाद सौंफ की तरह इसे खाया जा सकता है| लेकिन आप इसे जादा मात्रा में बना के न रक्खे क्युकि ये खराब हो जाती है| एक हफ्ते के लिए बनाना ही चाहिए| अलसी आपको अनाज बेचने वाले तथा पंसारी या आयुर्वेदिक जड़ी बूटी बेचने वालो के यहाँ से मिल जायेगी|

यह पथरी, मूत्र शर्करा और कष्ट से मूत्र आने पर गुणकारी है। अलसी के तेल का धुआं सूंघने से नाक में जमा कफ निकल आता है और पुराने जुकाम में लाभ होता है। यह धुआं हिस्टीरिया रोग में भी गुण दर्शाता है। अलसी के काढ़े से एनिमा देकर मलाशय की शुद्धि की जाती है। उदर रोगों में इसका तेल पिलाया जाता हैं। अलसी के तेल और चूने के पानी का इमल्सन आग से जलने के घाव पर लगाने से घाव बिगड़ता नहीं और जल्दी भरता है। पथरी, सुजाक एवं पेशाब की जलन में अलसी का फांट पीने से रोग में लाभ मिलता है। अलसी के कोल्हू से दबाकर निकाले गए (कोल्ड प्रोसेस्ड) तेल को फ्रिज में एयर टाइट बोतल में रखें। स्नायु रोगों, कमर एवं घुटनों के दर्द में यह तेल पंद्रह मि.ली. मात्रा में सुबह-शाम पीने से काफी लाभ मिलेगा।

बवासीर, भगदर, फिशर आदि रोगों में अलसी का तेल (एरंडी के तेल की तरह) लेने से पेट साफ हो मल चिकना और ढीला निकलता है। इससे इन रोगों की वेदना शांत होती है। अलसी के बीजों का मिक्सी में बनाया गया दरदरा चूर्ण पंद्रह ग्राम, मुलेठी पांच ग्राम, मिश्री बीस ग्राम, आधे नींबू के रस को उबलते हुए तीन सौ ग्राम पानी में डालकर बर्तन को ढक दें। तीन घंटे बाद छानकर पीएं। इससे गले व श्वास नली का कफ पिघल कर जल्दी बाहर निकल जाएगा। मूत्र भी खुलकर आने लगेगा। इसकी पुल्टिस हल्की गर्म कर फोड़ा, गांठ, गठिया, संधिवात, सूजन आदि में लाभ मिलता है। कई असाध्य रोग जैसे अस्थमा, एल्ज़ीमर्स, मल्टीपल स्कीरोसिस, डिप्रेशन, पार्किनसन्स, ल्यूपस नेफ्राइटिस, एड्स, स्वाइन फ्लू आदि का भी उपचार करती है अलसी। कभी-कभी चश्में से भी मुक्ति दिला देती है अलसी। दृष्टि को स्पष्ट और सतरंगी बना देती है अलसी।

अलसी शर्करा ही नियंत्रित नहीं रखती, बल्कि मधुमेह के दुष्प्रभावों से सुरक्षा और उपचार भी करती है। अलसी में रेशे भरपूर 27% पर शर्करा 1.8% यानी नगण्य होती है। इसलिए यह शून्य-शर्करा आहार कहलाती है और मधुमेह के लिए आदर्श आहार है। अलसी बी.एम.आर. बढ़ाती है, खाने की ललक कम करती है, चर्बी कम करती है, शक्ति व स्टेमिना बढ़ाती है, आलस्य दूर करती है और वजन कम करने में सहायता करती है। चूँकि ओमेगा-3 और प्रोटीन मांस-पेशियों का विकास करते हैं अतः बॉडी बिल्डिंग के लिये भी नम्बर वन सप्लीमेन्ट है अलसी।


ध्यान रहे -आयुर्वेदिक  चिकित्सक से विचार - विमर्श  ज़रूर कर ले।


जानलेवा डेंगू से बचना है तो बरतें यह सावधानी

बारिश भले ही नहीं हो रही है मौसम का साइड इफेक्ट दिखने लगा है। बदलते हुए मौसम में सावधान रहना बहुत जरूरी होता है, आपके खान-पान और रहन-सहन में थोड़ी सी लापरवाही आपको बीमार कर सकती है। बदलते मौसम के प्रभाव में आने लोगों का मौसमी बीमारियों के साथ ही मच्छर जनित बीमारियों ने पैर पसारना शुरु कर दिया है। डेंगू भी एक ऐसी ही बीमारी है जो मच्छर जनित होने के साथ-साथ बदलते मौसम में सबसे ज्यादा पनपती है।

डेंगू बुखार का वाइरस बारिश के मौसम में यानी जून से सितंबर-अक्‍टूबर के बीच ही फैलता है। इसका सबसे बड़ा कारण है भारत में बदलता तापमान, इसिलए भी डेंगू बुखार का मौसम बारिश के साथ ही शुरू हो जाता है। आमतौर पर जून कें अंत में बारिश शुरू हो जाती है जुलाई, अगस्त , सितंबर तीन महीनों में डेंगू बुखार सबसे ज्यादा फैलता है, क्योंकि पूरे भारत में सबसे अधिक बारिश इन तीन महीनों के बीच ही होती हैं।

भारत में मौसम का उतार-चढ़ाव लगातार चलता रहता है, कभी बहुत अधिक बारिश तो कभी बहुत अधिक गर्मी या ठंडी होती है जिससे डेंगू के मच्छरों की पैदाइश अधिक बढ़ जाती हैं। इन महीनों में लगातार बारिश और मौसम के उतार-चढ़ाव से काफी उमस और चिपचिपाहट होती है और इसी उमस के कारण डेंगू बुखार के फैलने की संभावना बढ़ जाती है। डेंगू का प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से होता है क्योंकि मौसम का उतार-चढ़ाव और बारिश का कभी एक क्षेत्र में आना तो कभी दूसरे में आना इसका मुख्य कारण है।

डेंगू बुखार के कारण पिछले कुछ वर्षों से इंसान में मच्छरों का खौफ बढ़ा है, इससे प्रभावित होने वाले लोग न सिर्फ भारत से हैं बल्कि पूरी दुनिया से हैं। इसमें व्यक्ति को तेज़ बुखार, सिरदर्द, आंखों के पीछे दर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द और शरीर पर फुंसियां हो जाती हैं। इस बुखार में खून में जल्दी से संक्रमण फैलते हैं। डेंगू बुखार एडिज नामक मच्छर के काटने से फैलता है। ये मच्छर एडिज इजिप्टी तथा एडिज एल्बोपेक्टस के नाम से जाने जाते हैं। यह मच्छर साफ, इकट्ठे पानी में पनपते हैं, जैसे घर के बाहर पानी की टंकियाँ या जानवरों के पीने की हौद, कूलर में इकट्ठा पानी, पानी के ड्रम, पुराने ट्यूब या टायरों में इकट्ठा पानी, गमलों में इकट्ठा पानी, फूटे मटके में इकट्ठा पानी आदि।

डेंगू के लक्षण-

आपको बता दें कि डेंगू बुखार हर उम्र के व्यक्ति को हो सकता है, लेकिन छोटे बच्चों और बुजुर्गों को ज़्यादा देखभाल की ज़रूरत होती है। साथ ही दिल की बीमारी के मरीज़ों का भी खास ख्याल रखने की ज़रूरत होती है। यह बुखार युवाओं में भी तेज़ी से फैलता है, क्योंकि वे अलग-अलग जगह जाते हैं और कई लोगों के संपर्क में आते हैं। डेंगू बुखार के लक्षण आम बुखार से थोड़े अलग होते हैं। इसमें बुखार बहुत तेज़ होता है। साथ में कमज़ोरी हो जाती है और चक्कर आते हैं। डेंगू के दौरान मुंह का स्वाद बदल जाता है और उल्टी भी आती है। सिरदर्द के साथ ही पूरा बदन दर्द करता है।

डेंगू में गंभीर स्थिति होने पर कई लोगों को लाल-गुलाबी चकत्ते भी पड़ जाते हैं। अक्सर बुखार होने पर लोग घर में ‘क्रोसिन’ जैसी दवाओं से खुद ही अपना इलाज करते हैं। लेकिन डेंगू बुखार के लक्षण दिखने पर थोड़ी देर भी भारी पड़ सकती है। लक्षण दिखने पर तुरंत अस्पताल जाना चाहिए। नहीं तो ये लापरवाही रोगी की जान भी ले सकती है। डेंगू संक्रमित व्यक्ति अगर पानी पीने और कुछ भी खाने में परेशानी महसूस करता है और बार-बार कुछ भी खाते ही उल्टी करता है तो डीहाइड्रेशन का खतरा हो जाता है। इससे लीवर का खतरा हो सकता है।

प्लेटलेट्स के कम होने या ब्लड प्रेशर के कम होने या खून का घनापन बढ़ने को भी खतरे की घंटी मानना चाहिए। साथ ही अगर खून आना शुरू हो जाए तो तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए। डेंगू बुखार होने पर सफाई का ध्यान रखने की जरूरत होती है। इलाज में खून को बदलने की जरूरत होती है इसलिए डेंगू के दौरान कुछ स्वस्थ व्यक्तियों को तैयार रखना चाहिए जो रक्तदान कर सकें। सामान्यतः डेंगू से ग्रसित होने वाले सभी लोगों को इससे खतरा होता है। खासतौर पर जब साधारण डेंगू बुखार के बजाय रोगी में रक्तस्राव ज्वर या आघात सिंड्रोम के लक्षण पाए जाते है।

डेंगू रक्तस्राव ज्वर में नाक, मुंह व दांतों में रक्तस्राव के साथ तेज बुखार हो जाता है और मरीज के बुखार का स्तर 105 डिग्री तक भी जा सकता है, जिसका सीधा असर मस्तिष्क पर भी पड़ता है। डीएचएस पॉजीटिव जांच के बाद मरीज को प्लेटलेट्स चढ़ाने की जरूरत होती है। यदि ऐसा न किया जाए तो वह किसी घातक बीमारी का शिकार हो सकता है या फिर रोगी की मृत्यु भी हो सकती है। डेंगू की गंभीर व तीसरी अवस्था को डेंगू शॉक सिंड्रोम कहा जाता है, जिसके तेज कंपकंपाहट के साथ मरीज को पसीने आते हैं। इस अवस्था में इलाज की देरी मरीज की जान ले सकती है। शॉक सिंड्रोम की स्थिति आने तक मरीज के शरीर पर लाल चकत्ते के दाग स्थाई हो जाते हैं, जिनमें खुजली भी होने लगती है।

जरूरी नहीं हर तरह के डेंगू में प्लेटलेट्स चढ़ाए जाएं, केवल हैमरेजिक और शॉक सिंड्रोम डेंगू में प्लेटलेट्स की जरूरत होती है। जबकि साधारण डेंगू में जरूरी दवाओं के साथ मरीज को ठीक किया जा सकता है। इस दौरान ताजे फलों का जूस व तरल चीजों का अधिक सेवन तेजी से रोगी की स्थिति में सुधार ला सकता है।

डेंगू से बचाव ही उसका इलाज-

रोगग्रसित मरीज का तुरंत उपचार शुरू करें व तेज बुखार की स्थिति में पेरासिटामाल की गोली दें। एस्प्रिन या डायक्लोफेनिक जैसी अन्य दर्द निवारक दवाई न लें। खुली हवा में मरीज को रहने दें व पर्याप्त मात्रा में भोजन-पानी दें जिससे मरीज को कमजोरी न लगे। फ्लू एक तरह से हवा में फैलता है अतः मरीज से 10 फुट की दूरी बनाए रखें तो फैलने का खतरा कम रहता है। जहां बीमारी अधिक मात्रा में हो, वहां फेस मॉस्क पहनना चाहिए। घर के आसपास मच्छरनाशक दवाइयां छिड़काएं।

पानी के फव्वारों को हफ्ते में एक दिन सुखा दें। घर के आसपास छत पर पानी एकत्रित न होने दें। घर का कचरा सुनिश्चित जगह पर डालें, जो कि ढंका हो। कचरा आंगन के बाहर न फेंककर नष्ट करें। पानी की टंकियों को कवर करके रखें व नियमित सफाई करें। इस तरह थोड़ी-सी सावधानी से स्वस्थ रहा जा सकता है।

जानिए खाना खाने के तुरंत बाद क्यों नहीं पीना चाहिए पानी ?

आपने कई महिलाओं व पुरुषों को देखा होगा कि वे खाना खाते समय व तुरंत बाद पानी नहीं पीते| कभी सोचा है कि आखिर यह लोग ऐसा क्यों करते हैं| यदि नहीं तो आज हम आपको बता देते हैं कि लोग खाना खाने के तुरंत बाद पानी क्यों नहीं पीते हैं|

आयुर्वेद के अनुसार, खाना खाने के तुरंत बाद पानी पीना जहर के समान है। पानी तुरंत पीने से उसका असर पाचन क्रिया पर पड़ता है। हम जो भोजन करते है वह नाभि के बाये हिस्से में स्थित जठराग्नि में जाकर पचता है। जठरआग्नि एक घंटे तक खाना खाने के बाद प्रबल रहती है। आयुर्वेद के मुताबिक जठर की अग्नि से ही खाना पचता है। अगर हम तुरंत पानी पी लेते है तो खाना पचने में काफी दिक्कत होती है। इसलिए आयुर्वेद ने खाने और पानी पीने में यह अंतर रखा है।

पानी पीने से जठराग्नि समाप्त हो जाती है ‘जो कि भोजन के पचने के बाद शरीर को मुख्य ऊर्जा और प्राण प्रदान करती है’। इसलिए ऐसा करने से भोजन पचने के बजाय गल जाता है। ऐसा करने से ज्यादा मात्रा में गैस और एसिड बनता है और एक दुष्चक्र शुरू हो जाता है। महर्षि वाघभट्ट ने 103 रोगों का जिक्र किया है जो भोजन के तुरंत बाद पानी पीने से होते हैं।

खाना खाने के लगभग पौन घंटे या एक घंटे के बाद पानी पीना उचित होता है। इस दौरान जठरआग्नि अपना काम कर चुकी होती है। अगर हम पानी खाने के तुरंत बाद पी लेते है तो वह मंद पड़ जाती है जिससे खाना ठीक से नहीं पचता है।

जानिए मधुमेह के कारण और निवारण

डायबटीज एक ऐसी बीमारी है जिसके मरीज दुनिया में सबसे ज्यादा है, एक बार इस बीमारी की चपेट में आये इंसान को तो उम्र भर सावधानी बरतनी पड़ती है| ऐसे में आप दवाओं पर मत निर्भर रहें|मधुमेह रोगियों की संख्या दिन-प्रतिदिन तेजी से बढ़ रही है। इस बीमारी को नियंत्रित करने के लिए आप कुछ घरेलू उपाय भी आजमा सकते हैं।

मधुमेह का कारण-

शरीर को स्वस्थ रखने एवं समुचित विकास हेतु भोजन में अन्य तत्वों के साथ संतुलित प्रोटीन, वसा तथा कार्बोहाइड्रेट आदि तत्त्वों की विशेष आवश्यकता होती है। जब इनमें से कोई भी या सारे तत्व भोजन में शरीर को संतुलित मात्रा में नहीं मिलते अथवा शरीर उन्हें पाचन के पश्चात् पूर्ण रूप से ग्रहण नहीं कर पाता तो शरीर में विविध रोग होने लगते हैं। शरीर में पेन्क्रियाज एक दोहरी ग्रन्थि होती है जो पाचन हेतु पाचक रस और इंसुलिन नामक हारमोन्स को पैदा करती है। इंसुलिन भोजन में से कार्बोहाइड्रटेंस् का पाचन कर उसको ग्लूकोज में बदलती है। कोशिकाएँ ग्लूकोज के रूप में ही पोष्टिक तत्त्वों को ग्रहण कर सकती है, अन्य रूप में उनको शोषित नहीं कर सकती। 

इंसुलिन रक्त में ग्लूकोज की मात्रा का भी नियंत्रण करती है। ग्लूकोज रक्त द्वारा सारे शरीर में जाता है तथा कोशिकाएँ उसको ग्रहण कर लेती है, जिससे उनको ताकत मिलती है। ग्लूकोज का कुछ भाग लीवर, ग्लाइकोजिन में बदलकर अपने पास संचय कर लेता है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर पुनः ग्लुकोज में बदलकर कोशिकाओं के लिये उपयोगी बना सके। इंसुलिन की कमी के कारण पाचन क्रिया के पश्चात् आवश्यक मात्रा में ग्लूकोज नहीं बनता और कार्बोहाइड्रेट्स तत्त्व शर्करा के रूप में रह जाते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप जिन-जिन कोशिकाओं को ग्लूकोज नहीं मिलता वे निष्क्रिय होने लगती हैं। उनकी कार्य क्षमता कम होने लगती है एवं मधुमेह का रोग हो जाता है।

मधुमेह के दुष्परिणाम-

शरीर में लगातार अधिक शर्करा रहने से अनेक जैविक क्रियाएँ हो सकती है। अधिक मीठे रक्त से रक्त वाहिनियों की दीवारें मोटी हो जाती है औ र उसका लचीलापन कम होने लगता है। रक्त का प्रवाह बाधित हो सकता है। जब यह स्थिति हृदय में होती है तो हृदयघात और मस्तिष्क में होने पर पक्षाघात हो सकता है। पिण्डलियों में होने पर वहाँ भयंकर दर्द तथा प्रजनन अंगों पर होने से प्रजनन क्षमता प्रभावित हो सकती हैं। रक्त वाहिनियों के बाधित प्रवाह से पैरों में सं वेदनाओं में कमी आ सकती है तथा जाने अनजाने मामूली चोटे भी घाव जल्दी न भरने के कारण गम्भीर रूप धारण कर सकती है। शरीर के सभी अंगों को क्षमता सेअधिक कार्य करना पड़ सकता है, जिससे पैरों में कंपन, स्वभाव में चिड़चिड़ापन, तनाव आदि के लक्षण प्रकट हो सकते हैं। संक्षेप में प्रभावित कोशिकाओं से संबंधित रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

घरेलू उपचार- 

तुलसी जो आपको आसानी से उपलब्ध हो जाएगी| तुलसी के पत्तों में ऐन्टीआक्सिडन्ट और ज़रूरी तेल होते हैं जो इजिनॉल, मेथिल इजिनॉल और कैरियोफ़ैलिन बनता है। ये सारे तत्व मिलकर इन्सुलिन जमा करने वाली और छोड़ने वाली कोशिकाओं को ठीक से काम करने में मदद करते हैं। इससे इन्सुलिन की संवेदनशीलता बढ़ती है। एक और फ़ायदा ये है कि पत्तियों में मौजूद ऐन्टीआक्सिडन्ट आक्सिडेटिव स्ट्रेस संबंधी कुप्रभावों को दूर करते हैं। शुगर लेवल को कम करने के लिए दो से तीन तुलसी के पत्ते खाली पेट लें, या एक टेबलस्पून तुलसी के पत्ते का जूस लें।

मधुमेह रोगी सहजन के पत्ते, इसबगोल और करेले का इस्तेमाल करें| इससे भी डायबिटीज नियंत्रित रहता है| सहजन के पत्तों में इसमें दूध की तुलना में चार गुना कैलशियम और दुगना प्रोटीन पाया जाता है। मधुमेह के मामलों में इन पत्तों के सेवन से भोजन के पाचन और रक्तचाप को कम करने में मदद मिलती है। पानी में मिलने के बाद इसबगोल की भूसी ‘जेल’ जैसा तत्व बनाती है जिसका सेवन ब्लड ग्लूकोज़ के अवशोषण और भोजन के पाचन को सुगम बनाता है। ये अल्सर और एसिडिटी से भी बचाता है। 

करेले में इन्सुलिन-पोलिपेपटाइड होता है, ये एक ऐसा बायो-कैमिकल तत्व है जो ब्लड-शुगर को कम करने में उपयोगी है। हर हफ्ते कम से कम एक बार करेले की सब्जी या कढी ज़रूर लें. अगर आप जल्द असर चाहते हैं तो तीन दिनमें एक बार खाली पेट करेले का जूस लें। 10 मिग्रा आंवले के जूस को 2 ग्राम हल्दी के पाउडर में मिला लीजिए। इस घोल को दिन में दो बार लीजिए। इसको लेने से खून में शुगर की मात्रा नियंत्रित होती है।

औसत आकार का एक टमाटर, एक खीरा और एक करेला को लीजिए। इन तीनों को मिलाकर जूस निकाल लीजिए। इस जूस को हर रोज सुबह-सुबह खाली पेट लीजिए। इससे डायबिटीज में फायदा होता है। मधुमेह मरीजो को नियमित रूप से दो चम्मच नीम का रस और चार चम्मच केले के पत्ते के रस को मिलाकर पीना चाहिए। चार चम्‍मच आंवले का रस, गुड़मार की पत्ती मिलाकर काढ़ बनाकर पीने मधुमेह नियंत्रण में रहता है।

गेहूं के पौधों में रोगनाशक गुण होते हैं। गेहूं के छोटे-छोटे पौधों से रस निकालकर सेवन करने से मुधमेह नियंत्रण में रहता है। मधुमेह के रोगियों को खाने को अच्छे से चबाकर खाना चाहिए। अच्छे से चबाकर खाने से भी मधुमेह को नियंत्रण में किया जा सकता है। डायबिटीज के मरीजों के लिए सौंफ बहुत फायदेमंद होता है। सौंफ खाने से डायबिटीज नियंत्रण में रहता है। हर रोज खाने के बाद सौंफ खाना चाहिए। मधुमेह के रोगियों को जामुन खाना चाहिए। काले जामुन डायबिटीज के मरीजों के लिए अचूक औषधि मानी जाती है। जामुन को काले नमक के साथ खाने से खून में शुगर की मात्रा नियंत्रित होती है।

स्टीविया का पौधा मधुमेह रोगियों के लिए बहुत फायदेमंद होता है। स्टीविया बहुत मीठा होता है लेकिन शुगर फ्री होता है। स्टीविया खाने से पैंक्रियाज से इंसुलिन आसानी से मुक्त होता है। डायबिटीज के मरीजों को शतावर का रस और दूध का सेवन करना चाहिए। शतावर का रस और दूध को एक समान मात्रा में लेकर रात में सोने से पहले मधुमेह के रोगियों को सेवन करना चाहिए। इससे मधुमेह नियंत्रण में रहता है।

इसके अलावा आप पटसन के बीज भी इस्तेमाल कर सकते हैं| इनमें फाइबर सामग्री बहुल मात्रा में पाई जाती है जो पाचन में तो मदद करते ही हैं साथ ही फैट और शुगर के अवशोषण में भी सहायक होते हैं। पटसन के बीज खाने से मधुमेह से ग्रसित मरीजों में शुगर की मात्रा 28 प्रतिशततक कम होती है। दालचीनी इन्सुलिन की संवेदनशीलता को सुधारने के साथ-साथ ब्लड ग्लूकोज़ लेवल को भी कम करता है। अगर सिर्फ आधी चम्मच दालचीनी रोज़ ली जाए तो इन्सुलिन की संवेदनशीलता को सुधारा और अपने वज़न को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे ह्रदय संबंधी रोगों का खतरा कम हो जाता है।

ग्रीन टी में पॉलीफिनोल्स होते हैं जो एक मज़बूत एंटी-ऑक्सीडेंट और हाइपो-ग्लाइसेमिक तत्व हैं, इससे ब्लड शुगर को रिलीज़ करने में मदद मिलाती है और शरीर इन्सुलिन का सही तरह से इस्तेमाल कर पाता है। देश में प्रचुर मात्रा में पाए जाने वाले नीम के पत्ते स्वाद में कडवे होते हैं पर इनमें बहुत सी खासियतें हैं। नीम इन्सुलिन रिसेप्टर सेंसिटिविटी बढाने के साथ साथ शिराओं व धमनियों में रक्त प्रवाह को ठीक करता है और हाइपो ग्लाय्केमिक ड्रग्स पर निर्भर होने से बचाता है। बेहतर नतीजों के लिए नीम के पत्तों का जूस रोज़ सुबह खाली पेट लें। इसके अलावा काला जामुन| ये ब्लड-शुगर को कम करने में मदद करता है और ह्रदय संबंधी बीमारियों से शरीर को दूर रखता है।

इस समय खूब खाइये अमरुद क्योंकि...

बरसात और सर्दियों के दिनों में बाजार में हर जगह अमरुद ही अमरुद दिखाई देने लगते हैं| देखने में हरे और लाल रंग के अमरूद लोगों को काफी पसंद आते है। खाने में तो ये स्वादिष्ट होते ही है साथ ही सेहत के लिए भी काफी फायदेमंद होते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि अमरूद का सेवन, आपके चेहरे को कांतिमय बनाता है| अमरूद में मौजूद पौटेशियम के कारण इसके नियमित सेवन से स्‍कीन ग्‍लो करती है और कील मुंहासों से भी छुटकारा मिलता है। 

दरअसल, अमरुद में विटामिन सी की मात्रा बहुत अधिक होती है, जिससे त्वचा संबधित रोग नहीं होते हैं। इसमें विटामिन,फाइबर और मिनरल प्रचुर मात्रा में होता है जो कब्ज की समस्याओं से निजात दिलाता है| जिन व्यक्तिओं के नाक-कान से खून आता हो, उन्हें भी अमरूद का सेवन करना चाहिए। सिर्फ यही नहीं अमरुद एसिडिटी, अस्थमा, ब्लडप्रेशर, मोटापा आदि समस्याओं में भी फायदा पहुंचाता है। यह कोलेस्ट्रॉल के लेवल को कम करता है साथ ही साथ यह पित्त रोगों में भी मददगार होता है।

इसमें फोलेट की अच्छी मात्रा है जिससे यह महिलाओं में फर्टिलिटी बढ़ाता है। मां बनने की चाहत रखने वाली महिलाएं रोज से अमरूद का सेवन करें। अमरूद के सेवन से खून में सुगर का स्तर कम होता है। इसमें फाइबर अधिक मात्रा में होते हैं जो शुगर पचाने और इन्सुलिन बढ़ाने में मदद करते हैं। अमरूद में आयोडीन अच्छी मात्रा में होता है जिससे थायरॉइड की समस्या में आराम होता है। इससे शरीर का हार्मोनल संतुलन बना रहता है।

आपको जानकर अचरज होगा कि अमरूद में संतरे के मुकाबले चार गुना अधिक विटामिन सी होता है। विटामिन सी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाते हैं और कैंसर से लड़ने में शरीर की मदद करते हैं। अमरूद में मौजूद पोटैशियम शरीर में सोडियम के प्रभाव को कम करता है जिससे ब्लड प्रेशर का संतुलन बना रहता है। इसके अलावा, यह शरीर में कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है।दांत दर्द में इसके पत्ते चबाने से भी काफी आराम मिलता है। इससे कब्ज भी दूर होती है। इसे बालू में भून कर खाने से खांसी दूर होती है। 

अगर आपके मुंह में काफी छाले हो गए हैं या फिर अक्‍सर आपको माउथ अल्‍सर की प्रॉब्‍लम बनी रहती है तो आप अमरूद की नई - नई कोमल पत्तियों को सेवन करें। इससे आराम मिलता है। अमरूद बॉडी के मेटाबॉल्जिम को बैलेंस रखता है इस वजह से इसके सेवन से कब्‍ज से छुटकारा मिल जाता है। अमरूद में विटामिन ए की मात्रा काफी होती है जो कि आंखों को स्‍वस्‍थ बनाएं रखती है। 

सर्दी-जुकाम होने पर भुना हुआ अमरुद नमक व काली मिर्च के साथ खाने से जुकाम की स्थिति से छुटकारा मिलता है। इसमें मौजूद विटामिन सी जुकाम में काफी फायदेमंद साबित होता है। अमरुद में पाया जाने बाला रेशा या फाइवर मेटाबॉलिज्म को ठीक रखने की सबसे अच्छी दवा है तो जिन लोगों का पेट खराब रहता है वो लोग अमरुद का सेवन अवश्य करें 

अमरूद के ताजे पत्तों का रस 10 ग्राम तथा पिसी मिश्री 10 ग्राम मिलाकर 21 दिन प्रात: खाली पेट सेवन करने से भूख खुलकर लगती है और शरीर सौंदर्य में भी वृद्धि होती है। कच्चे अमरूद को पत्थर पर घिसकर उसका एक सप्ताह तक लेप करने से आधा सिर दर्द समाप्त हो जाता है। यह प्रयोग प्रात: काल करना चाहिए। 

गठिया के दर्द को सही करने के लिए अमरूद की 4-5 नई कोमल पत्तियों को पीसकर उसमें थोड़ा सा काला नमक मिलाकर रोजाना खाने से से जोड़ो के दर्द में काफी राहत मिलती है। फोड़े और फुंसियों से परेशान हो तो अमरूद की 7-8 पत्तियों को लेकर थोड़े से पानी में उबालकर पीसकर पेस्ट बना लें और इस पेस्ट को फोड़े-फुंसियों पर लगाने से आराम मिलता ।

केले के औषधीय गुण जानकर दंग रह जाएंगे आप

केला हर मौसम में सरलता से उपलब्ध होने वाला अतयंत पौष्टिक और स्वादिष्ट फल है| केले की गिनती हमारे देश के उत्तम फलों में होती है और मांगलिक कार्यों में भी विशेष स्थान दिया गया है। इसमें शर्करा, प्रोटीन, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, आयरन, फॉस्फोरस, जिंक, कॉपर, आदि अनेक रासायनिक पदार्थ पाये जाते है। केले में थाइमिन, रिबोफ्लेविन, नियासिन, फॉलिक एसिड, विटामिन ए और विटामिन बी भी पर्याप्त मात्रा में मौजूद होता है। 

जानिए केले के औषधीय गुणों के बारे-

केले में प्राकृतिक तौर पर शुगर है। शारीरिक श्रम या कसरत करने के बाद केले के सेवन से शरीर में इसका स्तर सामान्य होता है और तुरंत ऊर्जा मिलती है। जिन लोगों को उच्च रक्तचाप की समस्या होती है, उन्हें केले का नियमित रूप से सेवन करना चाहिए। गर्भावस्था में महिलाओं को सबसे ज्यादा विटामिन व मिनरल्स की आवश्यकता होती है। इन्हे अपनी डाइट में केला अवश्य शामिल करना चाहिए। यह शरीर को धीरे-धीरे ऊर्जा देता है और आसानी से पच जाता है। जी-मिचलाने पर पका केला फेंट कर एक चम्मच मिश्री और एक छोटी इलायची पीस कर मिला कर खाने से राहत मिलती है। केला पाचन क्रिया में मदद करता है क्योंकि इसमें काफी मात्रा में फाइबर पाया जाता है।

अल्सर के मरीजों के लिए यह फल एक अच्छे औषधि के रूप में काम करता है व एसिड को नीयुट्रलाइज करता है। अल्सर में कच्चे केले का सेवन रामबाण औषधि है। एनीमिया के लिए भी केले को अच्छी औषधि माना गया है। केले के फलों में उच्च मात्रा में पाया जानेवाला आयरन (लौह तत्व) रक्त में हीमोग्लोबिन की मात्रा को बढ़ा देता है। इसलिए एनिमिया से पीडित रोगियों को केला जरूर खाना चाहिए। प्रातः तीन केले खाकर दूध में शक्कर व इलायची मिलाकर नित्य पीते रहने से भी रक्त की कमी दूर होती है। केले में ट्राइप्टोफान नामक एमिनो एसिड होता है जो तनाव को कम करने में भी मदद करता है। यह शरीर में सेरोटोनिन की मात्रा बढ़ाता है जिससे मूड अच्छा होता है। विभिन्न शोधों के अनुसार अत्यंत तनाव की स्थिति में भी केले का फल आपके शरीर में रक्तगत शर्करा को नियंत्रित रखता है।

आँत सम्बन्धी रोगों में केले का दही के साथ सेवन करना लाभकारी है। कई लोगों की आंतों में गड़बड़ी होने के कारण उन्हें दस्त की शिकायतें बनी रहती हैं। यदि रोज कच्चे केले की सब्जी खाई जाए तो पेट के कीड़े मल के साथ बाहर निकल जाते हैं तथा दस्त व पेचिश की शिकायत हो तो उसमें भी आराम होता है। पेट में जलन होने पर दही में चीनी और पका केला मिलाकर खाएं। इससे पेट संबंधी अन्य रोग भी दूर होते हैं। कच्चे केले को उबालकर खाने से कब्ज की शिकायत दूर होती है।

पेट के कीड़े मारने तथा खून शुद्ध करने के लिये केलों की जड़ के अर्क सेवन लाभदायक है। इसके लिये लगभग एक किलो जल में 50 ग्राम केले की जड़ डालकर इतना गर्म करें कि जल की मात्रा आधी हो जाये। इसके बाद मिश्रण को छान लें। यही छानन अर्क है। केले का नियमित सेवन कर धुम्रपान छोडा जा सकता है। इसमें पाए जानेवाले विटामिन-सी, ए, बी-6, बी-12 तथा पोटेशीयम एवं मेगनीशीयम निकोटीन विथड्रावल के लक्षणों से मुकाबला करने में शरीर की मदद करते हैं। एक पाव दूध के साथ रोजाना दो केलों का एक माह तक सेवन करने से दुबलापन दूर होकर शरीर स्वस्थ बनता है।

केले में कैरिटोनॉयड नामक एंटीऑक्सीडेंट्स अच्छी मात्रा में होता हैं जो शरीर की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने और संक्रमण से दूर रखने में मदद करता हैं। मुंह में छाले हो जाने पर सात दिन तक गाय के दूध से निर्मित दही के साथ केला खाना फायदेमंद है। दमा के लिए एक पका केला छिलके सहित सेंकें। इसके बाद इसका छिलका हटा दें व केले के टुकड़े करके इस पर काली मिर्च पाउडर बुरक दें। इसे गरम ही दमा रोगी को खिलाएँ तो लाभ होगा। केला नर्वस सिस्टम को ठीक रखता है और याददाश्त तेज करता है। ऐसे में तेज दिमाग के लिए नियमित रूप से केले का सेवन कर सकते हैं। विद्यार्थियों ले लिए यह एक अच्छा ब्रेन-टोनिक है।

पके केले को घी के साथ खाने से पित्त रोग शीघ्र शान्त होता है। केला हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए फायदेमंद है। इसमें मौजूद प्रोबायोटिक बैक्टीरिया शरीर में कैल्शियम को सोखने में मदद करता है। इसके अलावा इसमें पोटेशियम अच्छी मात्रा में होता है। केले के तने के सफेद भाग के रस का नियमित सेवन डायबिटीज को धीरे-धीरे खत्म कर देता है। एक पका केला मीठे दूध के साथ आठ दिन तक तक लगातार खाने से नकसीर में लाभ होता है। केले पाया जानेवाला पोटेशियम ह्रदय गति को सामान्य रखता है और शरीर में पानी की मात्रा को नियंत्रित करता है। केले में मैग्नीशियम की काफी मात्रा होती है जिससे शरीर की धमनियों में खून पतला रहने के कारण खून का बहाव सही रहता है। इसके अलावा पूर्ण मात्रा में मैग्नीशियम लेने से कोलेस्ट्रॉल की मात्रा कम होती है।

दाद होने पर केले के गूदे को नींबू के रस में पेस्ट बनाकर लगाने से राहत मिलती है। पके केले का प्रयोग चेहरे पर मोईसचराइजर के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता है। कच्चे केले को दूध में मिलाकर लगाने से त्वचा निखरती है और चेहरे पर भी चमक आती है। केले के गूदे में नींबू का रस मिलाकर सिर में लगाने से बालो का झड़ना रूक जाता है। यदि शरीर का कोई हिस्सा जल जाए तो केले के गूदे को मसल कर जले हुए स्थान पर बांधे। इससे जलन दूर होकर आराम पहुंचता है।

यदि चोट लग जाने पर खून का बहना न रुके तो उस जगह पर केले के डंठल का रस लगाने से लाभ होता है। केले का शर्बत बनाकर पीने से दमे के कारण चलने वाली खांसी में 2 चम्मच सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है। केले का शर्बत बनाकर पीने से दमे के कारण चलने वाली खांसी में 2-2 चम्मच सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है। केला छोटे बच्चों के लिये उत्तम व पौष्टिक आहार है। इसे मसल कर या दूध में फेंटकर खिलाने से लाभ मिलता है। कोई भी चीज मात्रा से अधिक खाना पीना हानिकारक है। इसी तरह केला भी ज्यादा खाने से शरीर शिथिल होगा व आलस्य आएगा। कभी ज्यादा खा लिया जाए तो एक छोटी इलायची चबाना लाभकारी है। 

यह आपके सिर के दिर्द को छूमंतर कर सकता है क्योंकि आपको सिर दर्द तब होता है जब आपकी धमनियो में तनाव आता है और तनाव जब आता है जब आप बिना मतलब की बातों पर अपना वक़्त जाया करते है इसलिए experts कहते है कि केले के छिलके को पीस कर उसका पेस्ट दर्द के स्थान पर अगर आप लगाते है तो कुछ ही मिनटों में आपका सिर दिर्द ऐसे गायब हो जाता है जैसे वो कभी था ही नहीं |यह आपके दांतों को भी किसी टूथपेस्ट से अधिक चमकीला और आकर्षक बना सकता है क्योंकि हमे ऊपर आपको बताया कि इसमें मैग्नीशियम और पोटेशियम होता है जो आपके दांतों में जमा केविटी और पीलेपन को हटाने में मदद करता है और उनमे कुदरती चमक लेके आता है जैसी आप टीवी ads में colgate वाली लड़की के दांत देखते है ठीक उसी तरह से | इसके लिए आपको केले के छिलके को दांतों से रगड़ना होता है और वो भी हर दिन |

मस्से और मुहांसों के लिए भी यह बहुत कारगर होता है अगर आप केले के छिलके को मस्सो पर नियमित रगड़ते है और रात भर पेस्ट बनाकर उसे छोड़ते है तो उस जगह पर एक बार ठीक हो जाने पर मुहांसे नहीं होते है और अगर आपके चेहरे पर मुहांसे होते है तो इसका पेस्ट रोज पांच से दस मिनट तक लगाने से अच्छा वाला फायदा होता है | केले का छिलका आपको दर्द से भी रहत दे सकता है अगर आप इसका इस्तेमाल चोट लगने वाली जगह पर लगाते है या मधुमखी के काटने वाली जगह पर भी इसे लगाने से बड़ा आराम मिलता है आप चाहे तो एक मधुमक्खी के छते को छेड़कर ये प्रयोग कर सकते है | झुर्रियो के लिए भी ये लाभदायक है और साथ ही कई तरह के अन्य औषधीय गुण केले (Banana) के छिलके के अंदर छिपे है बस आपको एक बार इसके बारे में थोड़ी जानकारी होना आवश्यक है |

झड़ते बालों से न हो परेशान करें ये सरल उपाय

आजकल बाल झड़ने की समस्या आम हो गई है जिसको देखो वही इस समस्या से पीड़ित है| पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं इसकी ज्यादा शिकार हो रही हैं| बाल झड़ने के कई कारण हो सकते हैं कई बार किसी गंभीर रोग के कारण या महिलाओं में प्रसव होने के कारण बाल झड़ने लगते हैं| यदि आपके बाल झड़ते या टूटते हो और आप काले, घने व चमकीले बाल चाहते हैं तो आपको अपने बालों की अतिरिक्त देखभाल करने की आवश्यकता है। 

बाल झड़ने के कारण-

बाल झड़ने का एक मुख्य कारण स्ट्रेसफुल लाइफ भी है। आजकल लोगों पर काम का इतना ज्यादा बोझ है जिससे वे तनाव में आ जाते हैं। ऐसे में हमें बालों को झड़ने से बचाने के लिए तनाव से दूर रहना चाहिए और कोशिश करनी चाहिए कि अधिक से अधिक खुशनुमा माहौल में रहें।

कई बार मौसम बदलने या फिर जगह बदलने के कारण भी बाल झड़ने लगते हैं, ऐसे में आपको अपने बालों की केयर करते रहनी चाहिए और बालों को सप्ताह में दो-तीन बार जरूर धोना चाहिए।कोई मेजर सर्जरी, इंफेक्शन और लंबे समय तक बीमार होने पर भी बाल गिरने लगते हैं। 

अगर अचानक हार्मोन लेवल चेंज हो गया है और आप किसी बीमारी से पीडि़त हैं तो उसका प्रभाव भी आपके बालों पर पड़ने की आशंका रहती हैं जिससे बाल कमजोर भी हो सकते हैं।

प्रेगनेंसी या फिर बच्चे के जन्म के बाद भी कुछ महिलाओं में कमजोरी आ जाती है और कमजोरी के कारण भी बाल गिरने लगते हैं। ऐसी स्थिति में चाहे बाल कम समय के लिए ही झड़ते हैं लेकिन फिर भी आप अपने बालों को पोषण देने के लिए हर्बल शैंपू का इस्ते़माल भी कर सकती हैं।

जो शैंपू झाग देता है, उसमें डिटर्जेंट जरूर होता है। हर्बल शैंपू भी इसका अपवाद नहीं है। महज शिकाकाई या रीठा की कुछ बूंदें डालने से चीजें नहीं बदलतीं। डिटर्जेंट्स से बचना है तो रीठा, शिकाकाई और मेहंदी का मिक्सचर घर में बनाकर लगाएं। 

कुछ इस तरह से टूटते बालों से बचा जा सकता है -

आपको बता दें कि बाल झड़ने के कई कारण होते हैं जैसे कि - सिर को गंदा रखने पर ज्यादा बाल झड़ते हैं, जबकि नियमित शैंपू करने पर कम। जो लोग खुले में ज्यादा नहीं जाते और ज्यादातर एसी में रहते हैं, वे हफ्ते में दो-तीन बार शैंपू करें। जो बाहर का काम करते हैं या जिन्हें पसीना ज्यादा आता है, उन्हें रोजाना बाल धोने चाहिए। 

तेल बालों को भारी और गंदा बनाता है। नहाने के बाद तेल लगाने का कोई फायदा नहीं है। तेल लगाने से बाल लंबे होने की बात भी गलत है। कई लोगों को लगता है कि तेल लगाकर बाल धोने से बाल मजबूत होते हैं, लेकिन यह सही नहीं है। हां, उनमें लुब्रिकेशन और चमक जरूर आ जाती है। 

बालों को मजबूत बनाने और टूटने से बचाने के लिए आपको सप्ताह में कम से कम दो बार बालों की जड़ों में आंवला, बादाम, ऑलिव ऑयल, नारियल का तेल, सरसो का तेल इत्यादि में से कोई एक लगाना चाहिए। इससे बालों का झड़ना, बाल पतले होना, डैंड्रफ, दोमुंहे बाल व उम्र से पहले बालों का सफेद होने जैसी प्रॉब्लम्स से निपटा जा सकता है।

बालों को झड़ने से बचाने के लिए आपको अपने बालों को धूप से बचाना चाहिए। जब भी आप बाहर धूप में जाएं तो अपने साथ छाता लेकर जाएं या फिर अपने बालों को कपड़े से पूरी तरह ढक लें।

कई शैंपू एक्स्ट्रा प्रोटीन होने का दावा करते हैं। इसी तरह प्रोटीन युक्त सीरम भी मार्केट में मिलते हैं। बाल धोने के दौरान शैंपू का प्रोटीन बालों के अंदर नहीं जाता। इसका काम बालों की बाहरी सतह यानी क्यूटिकल को साफ करना है। बालों को प्रोटीन की जरूरत है, लेकिन वह खुराक से मिलता है। 

कुछ लोग बालों में बार-बार कंधी करते हैं,ये सोचकर कि इससे बाल लंबे होंगे या फिर बाल सुलझें रहेंगे लेकिन आपको बता दें इससे भी कई बार बाल झड़ते है। आपको बालों को दिन में कम से कम 2-3 बार कंधी करें, इससे आपके बाल कम से कम उलझेंगे और बाल कम टूटेंगे। यानी बाल सुलझे भी रहेंगे और बालों के टूटने का डर भी खत्म।

शैंपू करने के बाद बहुत-से लोग कंडिशनर नहीं लगाते। उन्हें लगता है कि इससे बाल कमजोर हो जाते हैं। यह गलत है। कंडिशनर से बालों की चमक बनी रहती है और वे उलझते नहीं हैं। ध्यान रखें कि कंडिशनर सिर की सतह यानी त्वचा में न जाए। इससे बालों को नुकसान पहुंचता है। 

नजला-जुकाम से बाल टूटने की भ्रांति बहुत लोगों में होती है। असल में देखा गया है कि नजले-जुकाम आदि से पीड़ित लोग ज्यादातर दवाएं खाते रहते हैं और उनकी सेहत ठीक नहीं होती। इस वजह से कई बार बाल गिरने लगते हैं। नजला/जुकाम से बाल नहीं गिरते। 

अक्सर लोग सफेद बाल उखाड़ने से मना करते हैं क्योंकि उनका मानना होता है कि अगर एक बाल उखाड़ेंगे तो उसकी जड़ से दव निकलेगा, जो आसपास के बालों को भी सफेद कर देगा। यह गलत है। 

बालों को टूटने से बचाने के लिए आपको डाइट में प्रोटीन, आयरन, जिंक, सल्फर, विटामिन सी, के अलावा विटामिन बी से युक्त खाघ पदार्थ भरपूर मात्रा में लेने चाहिए।बालों को टाइट बांधना, हॉट रोलर्स व ब्लो ड्रायर व आयरन के ज्यादा इस्तेमाल करने से भी बाल डैमेज हो जाते हैं। इसीलिए कोशिश करें कि बालों को प्राकृतिक ही रहने दें और बालों पर बहुत ज्यादा एक्सेपेरिमेंट करने से बचें।

बालों को सही पोषण न मिलने से भी बाल झड़ने लगते हैं, ऐसे में बालों को झड़ने से बचाने के लिए समय-समय पर बालों में मेंहदी लगानी चाहिए या फिर बालों को पोषण देने के लिए दही भी लगा सकते हैं।

झड़ते बालों से बचने के लिए घरेलू नुस्खे-

झड़ते बालों से बचने के लिए रात में मेथी के बीजों को पानी में भिगो देना चाहिए। सुबह उठने पर इन्हे पीसकर लेप जैसा बना लेना चाहिए और फिर इस लेप को बालों पर लगाना चाहिए। ऐसा कुछ दिनों तक करने से रोगी के बाल झड़ना रुक जाते हैं। इसके अलावा बाल झड़ने बेर के पत्तों को पीसकर इसमें नींबू का रस मिलाकर सिर पर लगाने से बाल दोबारा उगने लगते हैं।

ताजा धनिये का रस या गाजर का रस बालों की जड़ों में लगाने से रोगी व्यक्ति के बाल झड़ने बंद हो जाते हैं। सिर में जिस जगह से बाल झड़ गये हैं उस जगह पर प्याज का रस लगाने से बाल दोबारा उग आते हैं।

खोपरे के तेल को मुलेठी, ब्राह्मी, मेहंदी के पत्ते डाल कर उबालें और ठंडा होने के बाद बोतल में भरकर रखें और नियमित रूप से बालों की मालिश करें। इससे बाल घने, काले, चमकीले तो होंगे ही साथ ही दिमाग को भी पोषण मिलेगा।

बाल झड़ते हैं तो गरम जैतून के तेल में एक चम्मच शहद और एक चम्मच दालचीनी पाउडर का पेस्ट बनाएं। नहाने से पहले इस पेस्ट को सिर पर लगा लें। 15 मिनट बाद बाल गरम पानी से सिर को धोएं। ऐसा करने पर कुछ ही दिनों बालों के झडऩे की समस्या दूर हो जाएगी।

दालचीनी और शहद के मिश्रण काफी कारगर रहता है। आयुर्वेद के अनुसार इनके मिश्रण से कई बीमारियों का इलाज किया जा सकता है। त्वचा और शरीर को चमकदार और स्वस्थ बनाए रखने के लिए इनका उपयोग करना चाहिए।

गाजर को पीसकर लेप बना लें। फिर इस लेप को सिर पर लगाये और दो घंटे के बाद धो दें। ऐसा प्रतिदिन करने से बाल झड़ने बंद हो जाते हैं। गंजेपन को दूर करने के लिए रात को सोते समय नारियल के तेल में नींबू का रस मिलाकर सिर की मालिश करनी चाहिए।

आंवला, ब्राह्मी तथा भृंगराज को एकसाथ मिलाकर पीस लें। फिर इस मिश्रण को लोहे की कड़ाही में फूलने के लिए रखना चाहिए और सुबह के समय में इसको मसल कर लेप बना लेना चाहिए। इसके बाद इस लेप को 15 मिनट तक बालों में लगाएं। ऐसा सप्ताह में दो बार करने से बाल झड़ना रुक जाते हैं तथा बाल कुदरती काले हो जाते हैं।

रात को तांबे के बर्तन में पानी भरकर रखें। सुबह के समय उठते ही इस पानी को पी लें। इसके साथ ही आधा चम्मच आंवले के चूर्ण का सेवन भी करे। इससे कुछ ही समय में बालों के झड़ने का रोग ठीक हो जाता है।

गुड़हल के फूल तथा पोदीने की पत्तियों को एक साथ पीसकर थोड़े से पानी में मिलाकर लेप बना लें। इस लेप को सप्ताह में कम से कम दो बार आधे घण्टे के लिए बालों पर लगाना चाहिए। ऐसा करने से बाल झड़ना रुक जाते हैं तथा बाल सफेद भी नहीं होते हैं।

लगभग 80 ग्राम चुकन्दर के पत्तों के रस को सरसों के 150 ग्राम तेल में मिलाकर आग पर पकाएं। जब पत्तों का रस सूख जाए तो इसे आग पर से उतार लें और ठंडा करके छानकर बोतल में भर लें। इस तेल से प्रतिदिन सिर की मालिश करने से बाल झड़ने रुक जाते हैं तथा बाल समय से पहले सफेद भी नहीं होते हैं।

कलौंजी को पीसकर पानी में मिला लें। इस पानी से सिर को कुछ दिनों तक धोने से बाल झडना बंद हो जाते हैं तथा बाल घने भी होना शुरु हो जाते हैं।
नीम की पत्तियों और आंवले के चूर्ण को पानी में डालकर उबाल लें और सप्ताह में कम से कम एक बार इस पानी से सिर को धोएं। ऐसा करने से कुछ ही समय में बाल झड़ना बंद हो जाता है।

आधा कप शराब में थोड़े से प्याज के टुकड़े डालकर 1 दिन के लिए रख दें। फिर 1 दिन के बाद प्याज के टुकड़ों को शराब में से बाहर निकाल दें और सिर पर इसकी मालिश करें। इसे बाल झड़ना बन्द हो जाते हैं और सिर पर नए बाल भी उगना शुरू हो जाते हैं।

सीताफल खाइये और बीमारियों को दूर भगाइए

सीताफल (Custard apple) एक लाजवाब, स्वादिष्ट और मीठा फल होने के साथ-साथ अपने में अनगिनत औषधीय गुणों को शामिल किए हुए है। पूरे शरीर को स्वस्थ और बीमारियों से दूर रखने का यह एक बहुत ही आसान उपाय है। सीताफल में मौजूद विरोधी अपचायक(एंटी ऑक्सिडेंट) ,शरीर मुक्त कण से लड़ने में मदद करते हैं। पोटेशियम और मैग्नीशियम हृदय रोग से हृदय की रक्षा करते है| सीताफल एक संतुलित आहार हैं इसमे प्रोटीन, फाइबर, खनिज, विटामिन, ऊर्जा और थोड़ा वसा होता हैं। उपरोक्त रूप से इसमे कई रोगों का मुकाबला करने की शक्ति होती है। 

सीताफल में वजन बढ़ाने की क्षमता भरपूर होती है और अगर आप वजन बढ़ाने के सारे जतन करके थक चुके हैं तो तैयार हो जाएं एक नए और मीठे उपाय के लिए। आपको बस सीताफल को अपनी डाइट का हिस्सा बनाना है और आपका मनचाहा फिगर आप पा सकेंगे बहुत ही जल्दी। क्या आप अक्सर कमजोरी महसूस करते हैं? सीताफल आपकी यह परेशानी दूर कर सकता है। सीताफल बहुत ही अच्छा एनर्जी का स्रोत होता है और इसके सेवन से थकावट और मसल्स मतलब मांसपेशियों की कमजोरी आपको बिलकुल भी महसूस नहीं होगी। बस, सीताफल को अपनी डाइट में शामिल कर लीजिए।

विटामिन बी कॉम्प्लेक्स से भरा हुआ सीताफल दिमाग को शीतलता देने का भी काम करता है। यह आपको चिड़चिड़ेपन से बचाकर निराशा को दूर रखता है। तो फिर बस, सीताफल अपनाइए और अपनी मानसिक शांति को रखिए अपने साथ हमेशा। खून की कमी यानी एनीमिया से बचना अब बिलकुल आसान है। सीताफल का हर दिन इस्तेमाल खून की अल्पता को खत्म कर देता है और उल्टियों के प्रभाव को भी कम करता है। सीताफल आपके दांतों के स्वास्थ्य के लिए भी बहुत उत्तम है। इसको नियमित खाकर आप दांतों और मसूड़ों में होने वाले दर्द से छुटकारा पा सकते हैं।

सीताफल में मौजूद मैग्नीशियम शरीर में पानी को संतुलित करता है और इस तरह से जोड़ों में होने वाले अम्ल को हटा देता है। यह अम्ल गठिया रोग का मुख्य कारण होता है और इस तरह से सीताफल गठिया रोग से सुरक्षा करता है। सीताफल आंखों की देखने की क्षमता बढ़ाता है, क्योंकि इसमें विटामिन सी और रिबोफ्लॉविन काफी ज्यादा होता है। इससे नंबर के चश्मे को आप खुद से बड़ी आसानी से दूर रख सकते हैं। 

दिल की तंदुरुस्ती अब बिलकुल आसान है। इसमें सोडियम और पोटेशियम संतुलित मात्रा में होते हैं जिससे खून का बहाव यानी ब्लड प्रेशर में अचानक होने वाले बदलाव नियंत्रित हो जाते हैं। दोनों प्रकार की शुगर को संतुलित रखना सीताफल के उपयोग के साथ बहुत ही आसान है। इसमें शरीर में होने वाली शुगर को सोख लेने का गुण होता है और इस तरह से यह शुगर का शरीर में स्तर सामान्य बनाए रखता है। सीताफल में विटामिन बी -6 जैसे पोषक तत्व होने की वजह से ब्रोन्कियल सूजन और दमा के हमलों को रोकने मे मदद मिलती है। यह फल गर्भावस्था के समय होने वाले मूड स्विंग, मॉर्निंग सिकनेस और अकड़न से राहत दिलाने में मदद करता है।

औषधीय गुण की खान है अजवाइन

एक कहावत है-'एकाजवानी शतमन्ना पचिका' अर्थात अकेली अजवाइन ही सैकड़ों प्रकार के अन्न को पचाने वाली होती है। भारतीय खाने में अजवाइन का उपयोग मसाले के रूप में कई सदियों से किया जाता है लेकिन अजवाइन सिर्फ एक मसाला ही नहीं है ये कई तरह के औषधिय गुणों से भरपूर है। अजवाइन के कई ऐसे घरेलू प्रयोग है जो हेल्थ प्रॉब्लम्स में रामबाण की तरह कार्य करते हैं तो आइए आज हम आपको बतातेे हैं ऐसे ही कुछ औषधीय गुणों के बारे में....

अजवाइन के बारे में बता दें कि इसका वानस्पतिक नाम ट्रेकीस्पर्मम एम्माई है। अजवाइन में 7 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट,21 प्रतिशत प्रोटीन, 17 प्रतिशत खनिज ,7 प्रतिशत कैल्शियम, फॉस्फोरस, लौह, पोटेशियम, सोडियम, रिबोफ्लेविन, थायमिन, निकोटिनिक एसिड अल्प मात्रा में, आंशिक रूप से आयोडीन, शर्करा, सेपोनिन, टेनिन, केरोटिन और 14 प्रतिशत तेल पाया जाता है। इसमें मिलने वाला सुगंधित तेल 2 से 4 प्रतिशत होता है, 5 से 60 प्रतिशत मुख्य घटक थाइमोल पाया जाता है। मानक रूप से अजवाइन के तेल में थाइमोल 40 प्रतिशत होता है।

पेट खराब होने पर अजवाइन को चबाकर खाएं और एक कप गर्म पानी पीएं। पेट में कीड़े हैं तो काले नमक के साथ अजवाइन खाएं। लीवर की परेशानी है तो 3 ग्राम अजवाइन और आधा ग्राम नमक भोजन के बाद लेने से काफी लाभ होगा। पाचन तंत्र में किसी भी तरह की गड़बड़ी होने पर मट्ठे के साथ अजवाइन लें, आराम मिलेगा। अजवाइन मोटापे कम करने में भी उपयोगी होती है। रात में एक चम्मच अजवाइन को एक गिलास पानी में भिगो दें। सुबह छान कर एक चम्मच शहद के साथ मिलाकर पीने से लाभ होता है। इसके नियमित सेवन से मोटापा कम होता है।

मसूड़ों में सूजन होने पर अजवाइन के तेल की कुछ बूंदों को गुनगुने पानी में डालकर कुल्ला करने से सूजन कम होती है। सरसों के तेल में अजवाइन डाल कर गर्म करें। इससे जोड़ों की मालिश करने पर दर्द से आराम मिलेगा। अजवाइन के रस में दो चुटकी काला नमक मिलाकर उसका सेवन करें और उसके बाद गर्म पानी पी लें। इससे आपकी खांसी ठीक हो जाएगी। आप काली खांसी से परेशान हैं तो जंगली अजवाइन के रस को सिरका और शहद के साथ मिलाकर दिन में 2-3 बार एक-एक चम्मच सेवन करें, राहत मिलेगी।

अजवाइन को भून व पीसकर मंजन बना लें। इससे मंजन करने से मसूढ़ों के रोग मिट जाते हैं। अजवाइन, सेंधानमक, सेंचर नमक, यवाक्षार, हींग और सूखे आंवले का चूर्ण आदि को बराबर मात्रा में लेकर अच्छी तरह पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 1 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम शहद के साथ चाटने से खट्टी डकारें आना बंद हो जाती हैं।

अजवाइन का रस आधा कप इसमें इतना ही पानी मिलाकर दोनों समय (सुबह और शाम) भोजन के बाद लेने से दमा का रोग नष्ट हो जाता है।मासिक धर्म के समय पीड़ा होती हो तो 15 से 30 दिनों तक भोजन के बाद या बीच में गुनगुने पानी के साथ अजवायन लेने से दर्द मिट जाता है। मासिक अधिक आता हो, गर्मी अधिक हो तो यह प्रयोग न करें। सुबह खाली पेट 2-4 गिलास पानी पीने से अनियमित मासिक स्राव में लाभ होता है।

मुख से दुर्गंध आने पर थोड़ी सी अजवायन को पानी में उबालकर रख लें, फिर इस पानी से दिन में दो-तीन बार कुल्ला करने पर दो-तीन दिन में दुर्गंध खत्म हो जाती है। खीरे के रस में अजवायन पीसकर चेहरे की झाइयों पर लगाने से लाभ होता है।अजवाइन, काला नमक, सौंठ तीनों को पीसकर चूर्ण बना लें। भोजन के बाद फाँकने पर अजीर्ण, अशुद्ध वायु का बनना व ऊपर चढऩा बंद हो जाएगा। कान में दर्द होने पर अजवाइन के तेल की कुछ बूंदे कान में डालने से आराम मिलता है। शरीर में दाने हो जाएं या फिर दाद-खाज़ हो जाए तो, अजवाइन को पानी में गाढ़ा पीसकर दिन में दो बार लेप करने से फायदा होता है। घाव और जले हुए स्थानों पर भी इस लेप को लगाने से आराम मिलता है और निशान भी दूर हो जाते हैं।

बरसात के मौसम में पाचन क्रिया के शिथिल पडऩे पर अजवायन का सेवन काफी लाभदायक होता है। इससे अपच को दूर किया जा सकता है। अजवायन, काला नमक, सौंठ तीनों को पीसकर चूर्ण बना लें। भोजन के बाद फाँकने पर अजीर्ण, अशुद्ध वायु का बनना व ऊपर चढऩा बंद हो जाएगा। पैर में कांटा चुभ जाए, तो कांटा चुभने के स्थान पर पिघले हुए गुड़ में 10 ग्राम पिसी हुई अजवाइन मिलाकर थोड़ा गरम कर बांध देने से कांटा अपने आप निकल जाएगा। रात्रि में एक चम्मच अजवायन एक गिलास पानी में भिगोएं। सुबह छानकर उस पानी में शहद डालकर पीने पर लाभ होता है।

लीवर की परेशानी है तो 3 ग्राम अजवाइन और आधा ग्राम नमक भोजन के बाद लेने से काफी लाभ होगा। पाचन तंत्र में किसी भी तरह की गड़बड़ी होने पर मट्ठे के साथ अजवाइन लें, आराम मिलेगा। अगर पेट में गैस की समस्या से परेशान हैं तो 1-2 ग्राम खुरसानी अजवाइन में गुड़ मिलाकर इसकी गोलियां बना कर खाएं, आपको तुरंत राहत मिलेगी। पेट में गैस होने पर हल्दी, अजवाइन और एक चुटकी काला नमक लें, इससे भी बहुत जल्दी काफी आराम मिलता है। पेट में पथरी का अंदेशा है तो आप 5 ग्राम ग्राम जंगली अजवाइन को पानी के साथ निगल लें। ऐसा आप महीने में पांच दिन करें तो पथरी कभी नहीं बनेगी। हैजा होने पर कपूर के साथ अजवाइन को मिला कर दें, हैजा की परेशानी कम होगी।

कुंदरू के फल, अजवायन, अदरक और कपूर की समान मात्रा लेकर कूट लिया जाए और एक सूती कपड़े में लपेटकर हल्का-हल्का गर्म करके सूजन वाले भागों धीमें -धीमें सिंकाई की जाए तो सूजन मिट जाती है। किसी शराब पीने वाले की आदत छुड़ाना चाहते हैं तो दिन में हर दो घंटे बाद उसे एक चुटकी अजवाइन चबाने को दें, बहुत जल्द उनकी शराब पीने की आदत छूट जाएगी। अजवाइन को पीस लिया जाए और नारियल तेल में इसके चूर्ण को मिलाकर ललाट पर लगाया जाए तो सिर दर्द में आराम मिलता है। अस्थमा के रोगी को यदि अजवाइन के बीज और लौंग की समान मात्रा का 5 ग्राम चूर्ण प्रतिदिन दिया जाए तो काफी फायदा होता है। अजवाइन को किसी मिट्टी के बर्तन में जलाकर उसका धुंआ भी दिया जाए तो अस्थमा के रोगी को सांस लेने में राहत मिलती है।

गले में खराश हो तो बेर के पत्ते और अजवाइन दोनों को पानी में एक साथ उबाल कर उस पानी को छानकर पी लें। नाक बंद होने पर आप अजवाइन को बारीक पीस कर उसे कपड़े में बांध कर सूंघें, आराम मिलेगा। खाने के बाद अजवाइन के साथ गुड़ खाने से सर्दी और एसिडिटी में आराम मिलता है।अजवाइन की 2 से 3ग्राम मात्रा को दिन में तीन बार लें। जुकाम, नजला और सिरदर्द में यह रामबाण दवा है। पान के पत्ते के साथ अजवाइन के बीजों को चबाया जाए तो गैस, पेट मे मरोड़ और एसीडिटी से निजात मिल जाती है।

अजवाइन, इमली के बीज और गुड़ की समान मात्रा लेकर घी में अच्छी तरह भून लेते है और फिर इसकी कुछ मात्रा प्रतिदिन नपुंसकता से ग्रसित व्यक्ति को दें।ये मिश्रण पौरुषत्व बढ़ाने के साथ-साथ शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाने में भी मदद करता है। नींद न आने की समस्या हो तो 2 ग्राम अजवाइन पानी के साथ निगल लें। इससे अच्छी नींद आएगी। कान में दर्द है तो अजवाइन के तेल का इस्तेमाल करें, दर्द ठीक हो जाएगा।