माँ गंगा को हमने किया मैला और शर्मिंदा भी नहीं हैं हम..... पार्ट 2

गंगा भारत वर्षे भातृरूपेण संस्थिता/नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः जो स्वयं में एक इतिहास हो, जो देश की परम्परा, समाज, धर्म, कला, संस्कृति की जीवन रेखा हो, जिसे पतित पावन नदी का गौरव प्राप्त हो, जिससे देश-विदेश के लोग प्यार करते हों, जो हमेशा से समृद्धि से जुड़ी हो, आशा-निराशा, हार-जीत से जुड़ी हो, जिसने भारत की अनेक में भी एक संस्कृति का भरण पोषण किया हो, जो वर्षों से देश की सभी नदियों का नेतृत्व करती हो, जिसे हम और हमारे पुरखे माँ का दर्जा देते रहे हों, जिसने हिमालय से निकल कर मैदानों को सजाया-संवारा, खलिहानों में ही नहीं जिसने घरों में भी हरियाली भर दी हो, हम उसी मुक्तिदायिनी गंगा मईया की बात कर रहे हैं। गंगा से जुड़ा पौराणिक प्रसंग और एतिहासिक प्रसंग के बारे में हमने आप को कल जानकारी दी थी अब पढ़िए आगे ........| 


सिंचाई

गंगा भारत और पडोसी बांग्लादेश की कृषि आधारित अर्थ व्यवस्था में बड़ा सहयोग तो करती ही है, साथ ही अपनी सहायक नदियों सहित बहुत बड़े क्षेत्र के लिए सिंचाई के साल भर स्रोत भी उपलब्ध कराती है। इन इलाकों में उगाया जाने वाला धान, गन्ना, दाल, तिलहन, आलू एवं गेहूँ गंगा के पानी से पोषित होता है। गंगा के तटीय इलाकों में दलदल और झीलों की वजह से लेग्यूम, मिर्च, सरसों, तिल, गन्ना और जूट की अच्छी फसल होती है। गंगा नदी में मत्स्य उद्योग भी लाखों लोगो को रोजगार प्रदान करता है। गंगा नदी में लगभग 375 मत्स्य प्रजातियाँ पाई जाती हैं। वैज्ञानिकों द्वारा उत्तर प्रदेश व बिहार में 111 मत्स्य प्रजातियों की उपलब्धता दर्शायी गयी है।

फरक्का बांध बन जाने से गंगा नदी में हिल्सा मछली के बीजोत्पादन में सहायता मिली है। इसके तट पर ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथा प्राकृतिक सौंदर्य से भरे पर्यटन स्थल है जो राष्ट्रीय आय का महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। गंगा तट के तीन बड़े शहर हरिद्वार, इलाहाबाद एवं वाराणसी जो तीर्थ स्थलों में विशेष स्थान रखते हैं। इस कारण यहाँ श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या निरंतर बनी रहती है और धार्मिक पर्यटन में महत्त्वपूर्ण योगदान करती है। हिन्दुओं का सबसे बड़ा पर्व कुम्भ है जो गंगा तट पर ही आयोजित होता है| 

यूपी और बिहार में गंगा से निकली नहरों से बड़ा लाभ हुआ है। दोनों ही सूबों में इस सिंचाई प्रणाली के चलते गन्ना, कपास और तिलहन जैसी नक़दी फ़सलों की पैदावार में वृद्धि हुई। पुरानी नहरें मुख्यत: गंगा-यमुना के दौआब इलाक़े में हैं। ऊपरी गंगा नहर हरिद्वार से शुरू होती है, और अपनी सहायक नहरों सहित 9,524 किलोमीटर लम्बी है। निचली गंगा नहर की लम्बाई अपनी सहायक नहरों सहित 8,238 किलोमीटर है और यह नरोरा से प्रारम्भ होती है। शारदा नहर से उत्तर प्रदेश में अयोध्या की भूमि सींची जाती है। 

जीव-जन्तु

16वीं -17वीं शताब्दी तक गंगा प्रदेश घने वनों से घिरा हुआ था। इसमें में जंगली हाथी, भैंस, गेंडा, शेर, बाघ विचरण करते थे। आज भी गंगा का तटवर्ती इलाका शांत और अनुकूल पर्यावरण के कारण पक्षियों का संसार अपने में संजोए हुए है। नदी व इसके आसपास मछलियों की 140 प्रजातियाँ, 35 सरीसृप, 42 स्तनधारी प्रजातियाँ, नीलगाय, सांभर, खरगोश, नेवला, चिंकारा बड़ी तादात में पाए जाते हैं।

गंगा के पर्वतीय किनारों पर लंगूर, लाल बंदर, भूरे भालू, लोमड़ी, चीते, बर्फीले चीते, हिरण, भौंकने वाले हिरण, सांभर, कस्तूरी मृग, सेरो, बरड़ मृग, साही आदि बहुतायत में देखने को मिलते हैं। इसके अलावा गंगा में पाई जाने वाली शार्क के कारण भी गंगा की प्रसिद्धि है जिसमें बहते हुये पानी में पाई जानेवाली शार्क के कारण विश्व के वैज्ञानिकों की काफ़ी रुचि है। सुंदरवन के नाम से जाना जाता है जो बंगाल टाईगर का इलाका है।

प्रदुषण 

तो आप ने देखा जिस नदी के साथ हमारा इतना पुराना रिश्ता है जिसके साथ हमारी आस्था हमारा समाज जुड़ा है आज वही गंगा माँ अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं| वैज्ञानिको के मुताबिक गंगा प्रदूषित होना अपने उदगम स्थान से ही आरंभ हो जाती हैं. पर्यटक ,तीर्थ यात्रा पर आने वाले गंदगी गंगा में प्रवाहित कर देते हैं जिससे वो दूषित हो रही हैं| नए और पुराने बनाए गए अस्पतालों से निकलने वाले मेडिकल कचरे को इसी नदी में डाल दिया जाता है| अतिथिगृहो और होटलों के मल- मूत्र को गंगा में ही डाला जा रहा है जिसके कारण इसका जल आरंभ से ही दूषित होता जा रहा हैं|

एक अनुमान के अनुसार हरदिन लगभग 260 मिलियन लीटर औद्योगिक अपशिष्ट गंगा में जहर घोल रहा है। गंगा में फेंके जाने वाले कुल कचरे में तक़रीबन अस्सी फीसद नगरों का कचरा होता है जबकि पंद्रह फीसद औद्योगिक कचरा। जहां एक ओर शहरी कचरा विभिन्न तरीकों से गंगा के प्राकृतिक स्वरूप को नष्ट कर रहा है वहीं औद्योगिक कचरा हानिकारक रसायनों द्वारा गंगा को जहरीला बना रहा है।

पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या विस्फोट के कारण गंगा किनारे की आबादी तेजी से बढ़ी है। इसके चलते सारा सीवेज गंगा में ही डाल दिया जाता है| ऋषिकेश से इलाहाबाद तक गंगा तट पर तक़रीबन 146 औद्योगिक इकाइयां हैं। इनमें चीनी मिल, पेपर फैक्ट्री, फर्टिलाइजर फैक्ट्री, तेलशोधक कारखाने तथा चमड़ा उद्योग प्रमुख हैं। इनसे निकलने वाला कचरा और रसायन युक्त गंदा पानी गंगा में गिरकर इसके पारिस्थितिक तंत्र को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। गंगा को माँ का दर्जा देने वाले हम और आप भी कम दोषी नहीं हैं हमारे द्वारा दाह-संस्कार, विसर्जित फूल और पॉलीथिन भी गंगा को बीमार कर रहे हैं।

हरिद्वार स्थित भारत हेवी इलेक्ट्रिक लिमिटेड के वैज्ञानिको के मुताबिक आज गंगा जल न पीने लायक और न नहाने लायक बचा हैं| गंगा निकलती तो हैं साफ और स्वच्छ लेकिन हरिद्वार से ही वह पूरी तरह से दूषित हो जाती हैं| एक रिपोर्ट में सामने आया है की यहाँ की दवा कंपनिया एसीटोन, हाईड्रोक्लोराइड अम्ल आदि गंगा में बहा देते हैं जिससे इस पवित्र नदी का जल दूषित हो गया हैं| इससे बचने के लिए उत्तराखंड सरकार को किसी भी प्रकार के कारखानों को प्रदुषण फ़ैलाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए| इसके बावजूद भी यदि नदी को प्रदूषित किया जाय तो प्रदुषण फ़ैलाने वाले के खिलाफ कठोर से कठोर सजा का प्रावधान किया जाय|

केन्द्रीय प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक गंगा में ऑक्सीजन की मात्रा लगातार कम होती जा रही हैं| एक रिपोर्ट में सामने आया है की वर्ष 1986 में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा 8 .4 मिलीग्राम प्रति लीटर थी ,जो 2010 में घटकर 6 .13 मिलीग्राम प्रति लीटर पर पहुँच गई| नदी से मीठे पानी में पाई जाने वाली डॉल्फिन की संख्या भी लगातार घटती जा रही हैं| ये डॉल्फिन एक तरह से स्वच्छता का मीटर हैं| डॉल्फिन का शरीर कई ऐसे खतरनाक रसायनों का जानकारी सहज उपलब्ध करता हैं जो पानी के नमूने में नहीं मिलता|

गंगा नदी में कौलिफोर्म बैक्टीरिया की संख्या खतरनाक ढंग से बढ़ रही हैं| गंगा की दुर्दशा उत्तर प्रदेश में आने के बाद बढ़ती जाती है। सूबे में गंगा एक्शन प्लान के नाम पर करोड़ रुपये बहा दिए गए और गंगा आज भी वैसी ही है| यह सारा पैसा भ्रष्टाचार की बलि चढ़ गया। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश मंद बिजनौर से लेकर बलिया तक गंगा में प्रदूषण निर्बाध गति से चलता रहता है।

रिपोर्ट का शेष भाग .....

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