25 अक्तूबर, 2012

इस तरह हुआ महिषासुर का अंत

प्राचीन काल में देव और दानवों के बीच भंयकर युद्ध हुआ था। उस युद्ध में देवताओं ने राक्षसों का सर्वनाश किया। इस पर राक्षसों की माता दिति बहुत दुखी हुई और उसने अपनी माता से कहा, "मां, मेरे सभी पुत्र मेरी सौत के पुत्र देवताओं के हाथों मारे गए हैं। मैं इस दुख को कैसे सहन कर सकती हूं।" "बेटी, तुम रोओ मत। भगवान की इच्छा से ही यह अनर्थ घटित हुआ है। हम कर ही क्या सकते हैं? तुम तपस्या करो। तुम्हारे गर्भ से एक लोक प्रसिद्ध पुत्र का उदय होगा।" इस प्रकार समझाकर राक्षसों की नानी ने अपनी पुत्री दिति को वरदान दिया।

अपनी माता की सलाह पाकर दैत्यों की माता दिति सुपाश्र्चु नामक मुनि के आश्रम में गई। वहां पर दिति ने अनेक प्रकार के जंतुओं का रूप धरकर तप करना आरंभ किया। एक दिन दिति महिस रूप धरकर पांच अग्निहोत्रों (पंचाग्नि) के मध्य बैठकर घनघोर तपस्या में लीन हो गई। मुनि सुपाश्र्चु ने उस दृश्य को देखा। उस घृणित रूप पर रुष्ट होकर मुनि ने दिति को श्राप दिया, "तुम्हारे गर्भ से महिष रूपी पुत्र का जन्म होगा।" दिति विचलित हुए बिना तप में निमग्न हो गई।

एक दिन ब्रह्मा ने दिति के समक्ष प्रत्यक्ष होकर कहा, "तपस्विनी, मुनि के शाप पर तुम चिंता न करो। तुम्हारे गर्भ से पैदा होनेवाले पुत्र का आधा शरीर महिष की आकृति में होगा और शेष आधा शरीर मानवाकृति में होगा। वह बालक महान वीर बनेगा। वह अपने पराक्रम के बल पर इंद्र आदि देवताओं को हराकर यशस्वी होगा।" ब्रह्मा दिति को यह वरदान देकर अदृश्य हो गए।

कालांतर में दिति के गर्भ से महिषासुर का जन्म हुआ। समस्त राक्षसों ने उस बालक को घेरकर अनेक प्रकार से उसकी स्तुति की, "हे दानवोत्तम! देवताओं ने विष्णु का अनुग्रह पाकर हम सबको भगा दिया और स्वर्ग पर शासन कर रहे हैं, इसलिए आपसे हमारी यही प्रार्थना है कि आप देवताओं को युद्ध में पराजित कर स्वर्ग से उनको भगाकर स्वर्ग पर शासन कीजिए। हमारे राक्षस वंश की प्रतिष्ठा बनाए रखें।"

महिषासुर ने राक्षसों को आश्वासन दिया, "अगर आप सबका मुझ पर विश्वास है तो निश्चय ही आपकी मनोकामना पूरी होगी। लेकिन मेरी एक शर्त है-आप सबको मेरा साथ देना होगा।" राक्षसों ने एक स्वर में महिषासुर को सहयोग देने का वचन दिया।

महिषासुर ने कुछ समय बाद राक्षस-सेना का संगठन किया और स्वर्ग पर धावा बोल दिया। देव और दानवों के बीच एक सौ वर्ष तक भीषण युद्ध होता रहा। आखिर महिषासुर ने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। राक्षसों के अत्याचारों से देवता तंग आ गए। जब उनके अत्याचारों को सहा न गया तब सब देवता परस्पर विचार-विमर्श कर के ब्रह्मा के पास आश्रय में गए। ब्रह्मा से निवेदन किया कि महिषासुर का संहार करके उन्हें स्वर्ग वापस दिला दें। 

ब्रह्मा ने अपनी असमर्थता जताई। देवता निराश हुए। वे सब एक पर्वत पर पहुंच कर उपाय सोचने लगे-कैसे राक्षसों का दमन किया जाए। ब्रह्मा ने सुझाव दिया कि शिवजी इस कार्य में सहायता कर सकते हैं। अत: हम सब उनके पास जाकर निवेदन करेंगे।

देवताओं ने ब्रह्मा से प्रार्थना की कि वे देवताओं का प्रतिनिधित्व करें। ब्रह्मा ने देवताओं की प्रार्थना मान ली और उन सबको साथ लेकर शिवजी से भेंट करने के लिए कैलाश पहुंचे। शिवजी दवताओं की प्रार्थना सुनकर द्रवित हुए, उन्होंने कहा, "हम सब श्री महाविष्णु के आश्रय में जाकर उनसे निवेदन करेंगे। वे निश्चय ही इस कार्य में सहायता करेंगे।" अंत में सब लोग श्री महाविष्णु के दर्शन करने निकले।

देवताओं ने ब्रह्मा, शिवजी यथा विष्णु को महिषासुर के अत्याचारों का वृत्तांत सुनाया। शिवजी ने महिषासुर के अत्याचार सुनकर रौंद्र रूप धारण किया। उनके मुंह से एक तेज का आविर्भाव हुआ। इसी प्रकार ब्रह्मा और विष्णु के अंगों से तेज प्रकट हुए। आखिर सभी तेज एक रूप में समाहित हुए। शिवजी का तेज देह के प्रधान रूप को प्राप्त हुआ, विष्णु का तेज मध्य भाग, वरुण का तेज उरू और जांघ, भौम का तेज पृष्ठ भाग, ब्रह्मा का तेज चरण और अन्य देवताओं के तेज शेष अंगों की आकृति में रूपायित हुए। अंत में समस्त तेजों का सम्मिलित स्वरूप एक नारी की आकृति में प्रत्यक्ष हुआ। उस तेज स्वरूपिनी देवी की श्री महाविष्णु तथा शिवजी ने अपने-अपनी आयुध प्रदान किए। हिमवंत ने उसे एक सिंह भेंट किया।

वह देव स्वरूपिणी महिमा असुरमर्दनी तेज में देवताओं को साथ लेकर सिंह पर आरूढ़ हो निकल पड़ी। दानवराज महिषासुर के नगर के समीप पहुंचकर देवी ने सिंहनाद किया। उस ध्वनि को सुन दस दिशाएं हिल उठीं। पृथ्वी कंपित हुई। समुद्र कल्लोलित हो उठा। महिषासुर को गुप्तचरों के जरिए समाचार मिला कि देवी उसका संहार करने के लिए स्वर्ग द्वार तक पहुंच गई हैं। वह थोड़ा भी विचलित नहीं हुआ बल्कि देवी पर क्रुद्ध हो वतुरंगी सेना समेत देवी के साथ युद्ध करने के लिए निकल पड़ा।

देवी को स्वर्गद्वार पर आक्रमण के लिए तैयार देख हुंकार करके महिषासुर ने अपनी सेना को देवी की सेना पर धावा बोलने का आदेश दिया। देवी ने प्रचंड रूप धारण कर राक्षस सेना को तहस-नहस करना प्रारंभ किया। उनके विश्वास से अपार सेना वाहिनी अद्भुत हो महिषासुर के सैन्य दलों पर टूट पड़ी और अपने भीषण अस्त्र-शस्त्रों से दानव सेना को गाजर-मूली की तरह काटने लगी। देवी ने स्वयं देवताओं की सेना का नेतृत्व किया। अपने वाहन बने सिंह को तेज गति से शत्रु सेना की ओर बढ़ाते हुए दैत्यों का संहार करने लगी। 

देवी के क्रोध ने दावानल की तरह फैलकर दैत्य वाहिनी को तितर-बितर किया। युद्ध क्षेत्र लाशों से पट गया। उस भीषण दृश्य को देख राक्षस सेनापतियों के पैर उखड़ गए। वे भयभीत हो जड़वत अपने-अपने स्थानों पर खड़े रहे। महिषासुर ने देवी पर आक्रमण करने के लिए अपने सेनानायको को उकसाया। दैत्य राजा का हुंकार और प्रेरणा सभी सेनानायक एकत्र हो सामूहिक रूप से देवी का सामना करने के लिए सन्नद्ध हुए।

महिषासुर ने देवी के समक्ष पहुंचकर उनको युद्ध के लिए ललकारा। इस बीच दैत्य सेनापति साहस बटोरकर देवी पर आक्रमण के लिए एक साथ आगे बढ़े। देवी ने समस्त सेनापतियों का वध किया। सारी सेना को समूल नष्ट करके महिषासुर के समीप पहुंची और गरजकर बोली, "अरे दुष्ट! तुम्हारे पापों का घड़ा भर गया है। मैं तुम्हारे अत्याचारों का अंत करने आई हूं। मैं तुम्हारा संहार करके देवताओं की रक्षा करूंगी।" यह कहकर देवी ने महिषासुर को अपने अस्त्र से गिराया, उसके वक्ष पर भाला रखकर उसको दबाया तब अपने त्रिशूल से उसकी छाती को चीर डाला।

त्रिशूल के वार से महिषासुर बेहोश हो गया। फिर थोड़ी देर में वह होश में आया। उसने पुन: देवी के साथ गर्जन करते हुए भीषण युद्ध किया। देवी ने रौद्र रूप धारण कर अपने खड्ग से दैत्यराज महिषासुर का सिर काट डाला। अपने राजा का अंत देख शेष राक्षस सेनाएं चतुर्दिक पलायन कर गई। युद्ध क्षेत्र में देवी का रौद्र रूप देखते ही बनता था आकाश में सूर्य का अकलंक तेज चारों तरफ भासमान था। वे स्वयं देवी के क्रोध को शांत नहीं कर पाए। उन्होंने अपनी दृष्टि दैत्यराज महिषासुर के चरणों पर केंद्रित की।

देवताओं ने देवी का जयकार किया और विनम्र भाव से हाथ जोड़कर सदा उनकी रक्षा करते रहने का निवेदन किया। देवी ने आश्वासन दिया। दैत्यराज महिषासुर का मर्दन (संहार) करने के कारण दुर्गा महिषासुर मर्दनी कहलाई।

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