25 अक्तूबर, 2012

तो इस तरह ब्राह्मण को मिली प्रेतों से मुक्ति


चतुर्विध पुरुषार्थो में धर्म का स्थान सबसे ऊंचा माना गया है। धर्म किसी व्यक्ति, संप्रदाय, वर्ग, जाति, कुल, कुनबे या कबीले से जुड़ा हुआ नहीं होता। धर्म सार्वभौमिक होता है। मानव मात्र के लिए आचरण योग्य होता है। प्राचीन काल में धर्म पर बहुत अधिक चर्चा हुई। महर्षियों ने विस्तार से इसकी व्याख्या की है। स्कंद पुराण में धर्म सम्बंधी कई कथाएं कही गई हैं। पुराने समय में नैमिशारण्य में एक बार द्वादश वार्षिक 'सत्र योग' रचा गया। उस योग में देश के सारे ऋषि, मुनि और तपस्वी पहुंचे। उस संदर्भ में कई धार्मिक संगोष्ठियां भी हुईं। ऋषि-मुनि पुराण सुनकर आनंदित हुए। रोमहर्षण सूत महर्षि ने आगत तपस्वीवृंद को कृष्ण द्वैपायन से कही गई अनेक कथाएं सुनाईं। उस समय कुछ तपस्वियों ने महर्षि सूत से निवेदन किया, "महानुभव, आपने कई धार्मिक गूढ़ तत्वों का हमें उपदेश दिया, लेकिन हम उन्हें धारण नहीं कर पाए। कृपया धर्म संबंधी उपाख्यान हमें सरल भाषा में संक्षेप में समझाइए।"

इस पर सूत महर्षि ने धर्म सम्बंधी एक कथा सुनाई, पुराने समय में महाराजा चित्रकेतु ने धर्म का अर्थ जानने की उत्कंठा से महर्षि शौनक से प्रार्थना की। महर्षि ने सर्वलोक हितकारी धर्म का प्रवचन किया।

धर्म ही सदा व्यक्ति का साथ देता है। वही मानव-जीवन का एकमात्र आधार होता है। बंधु, बांधव, मित्र, हितैषी भी धर्मच्युत व्यक्ति का हित नहीं कर सकते और न साथ दे सकते हैं। धन, संपत्ति, पद और अधिकार के अभाव में भी धर्माचरण करनेवाला व्यक्ति सब जगह आदर-सम्मान और परलोक का पात्र हो जाता है। धर्माचरण विहीन व्यक्ति चाहे जितना भी बलवान, संपन्न और राजा ही क्यों न हो, वह सर्वत्र निंदा का पात्र बन जाता है और जीवन भर दुख भोगता है। वह कभी सुखी नहीं बन सकता।

इसीलिए शास्त्रों में बताया गया है :

नास्ति धर्मात्परं लाभो नास्ति धर्मात्परं धनम्।

नास्ति धर्मात्परं तीर्थ नास्ति धर्मात्परा गति:।।

अत: मानव को धर्म का मर्म समझकर उसका आचरण करना चाहिए, तभी वह सुख, शांति और सौभाग्य का पात्र बनकर सर्वत्र पूजा जाता है। इसके दृष्टांत के रूप में एक कहानी है :

कई शताब्दियों पूर्व अवंती नगर में धर्म स्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहा करता था। उसका एकमात्र पुत्र शिवस्वामी थ। धर्मस्वामी के स्वर्गवासी होते ही शिवस्वामी तीर्थ यात्रा पर चल पड़ा। समस्त तीर्थो की यात्रा करके वह अवंती की ओर लौटा। अवंती के पास पहुंचते ही उसके मन में यह विचार आया कि गृहस्थी के बंधन में फंस जाने पर फिर उससे मुक्ति होना असंभव है। मैंने आर्यावर्त के समस्त तीर्थो की यात्रा की है। अब विंध्याचल के दक्षिण में स्थित पुण्य तीर्थो का सेवन करना चाहिए। यह संकल्प करके शिवस्वामी यात्रा के दौरान कई नगर, ग्राम, वन, उपवनों का दर्शन करते हुए विंध्याचल के गहन वन में पहुंचा।

विंध्याचल में सभी ओर सिंह, शार्दूलों के भयंकर गर्जन, पक्ष्यिों का कलरव, कंटकाकीर्ण दुर्गम पथ, दावानल, भूत-प्रेत व राक्षसों के विकट अटठहास सुनाई पड़े। भूख-प्यास से उसका शरीर शिथिल होता जा रहा था। भीषण ताप से उसकी देह झुलस रही थी। उस स्थान पर कंकालों का ढेर देखकर शिवस्वामी आपाद मस्तक कांप उठा।

वह मन ही मन पछताने लगा, "ओह! मैंने यह भूल की है। तिस पर पथ भ्रष्ट हो गया हूं। अब मैं इस विपदा से कैसे मुक्त हो सकता हूं।" इस प्रकार शिवस्वामी अपनी करनी पर पछता रहा था, तभी उसके सामने पांच विकराल भूत आकर खड़े हो गए। अचानक अपने सामने एक साथ पांच भूत-प्रेतों को देख शिवस्वामी निश्चेष्ट रह गया फिर साहस बटोरकर पूछा, "तुम लोग कौन हो? इस निर्जन वन में वास क्यों करते हो?"

"हम चाहे कोई भी हों, तम्हें क्या मतलब? अभी हम तुम्हारा भक्षण करने वाले हैं। अंतिम समय में अपने आराध्य देव का ध्यान करो।" "मैं सर्वभूतेश शिवजी का ही स्मरण करूंगा। मैंन सुना है कि व्याधि से पीड़ित व्यक्ति, दरिद्र और दावानल में फंसा व्यक्ति शिवजी के स्मरण मात्र से मृत्यु पर विजय पाते हैं। इसलिए उन्हीं पृत्युंजय का स्मरण करता हूं।"

उसी समय पांचों प्रेत शिवस्वामी को निगलने के लिए आगे बढ़े, लेकिन दूसरे ही क्षण प्रेतों के मुंहों में अग्नि ज्वालाएं दहकती सी प्रतीत हुईं। वे सब घबरा गए और प्रेतों ने शांत होकर पूछा, "महात्मा, आप कौन हैं? आपको यह तेज कैसे प्राप्त हुआ?"

शिवस्वामी ने अपना वृत्तांत सुनाकर पूछा, "तुम लोग कौन हो? इस अरण्य में शाल्मली वृक्ष का आश्रय लेकर यात्रियों का संहार क्यों करते हो? तुम्हें किस पापाचरण के कारण ये विकृत रूप प्राप्त हुए हैं?"

इस पर प्रेतों ने अपना परिचय दिया, "हम पांच प्रेतों के नाम इस प्रकार हैं-स्थूल देह, पीन मेढू, पतिवकत्र, कृश गात्र और दीर्घजिह्व। इस पर प्रत्येक प्रेत ने अपने कुकृत्य का परिचय दिया, "मेरा नाम स्थूल देह है। मैंने देव, ब्राह्मण, स्त्री, बालक, वृद्ध आदि का धन चुराकर उनके मांस भक्षण किया, इस प्रकार मुझे यह स्थूल देह प्राप्त हुआ है।"

दूसरे ने कहा, "मेरा नाम पीन मेढू है। मैंने अनेक स्त्रियों का सतीत्व लूटा, अनि विषय कर्म के कारण मैं कृशगात बन गया हूं। यौन रोगों से मेरा शरीर सदा जलता रहता है। उसी पाप का फल भोग रहा हूं।" तीसरे ने अपने कर्म का फल बताया, "मेरा नाम पूतिवकत्र है। मैं मिथ्याभाषी हूं। सदा सबकी निंदा और दूषण करता हूं। इस पाप के कारण सदा मेरे मुंह से पीब और रक्त बहता रहता है। मेरी जिह्वा दरुगध के आधिक्य से कीड़ों से भरी रहती है।"

इसके बाद चौथे प्रेत ने कहा, "मेरा नाम कृशगात्र है। पूर्व जन्म में मैं धनवान था, परंतु कंजूस था। मैंने अपनी पत्नी और बच्चों सही पोषण नहीं किया, उन्हें सताया। दान धर्म नहीं किया। अपने परिवार को कृश यानी दुर्बल करने के कारण इस जन्म में कृशगात्र बना।"

अंत में दीर्घ जिह्व ने अपनी कहानी सुनाई, "मैं पिछले जन्म में नास्तिक था। धर्म, सत्य, अहिंसा, लोक-परलोक की निंदा करते हुए कहा करता था-धर्म मिथ्या है। जो कुछ भोगना है, इस जन्म में भोगना है। पाप-पुण्य फरेब है। इस जिह्वा से मैंने जो वाचालता की, परिणामस्वरूप इस जन्म में दीर्घ जिह्व बन गया हूं।"

प्रेतों की कहानियां सुनकर शिवस्वामी ने अपने मन में विचार किया, "यम कहीं अन्यत्र नहीं हैं। मनुष्य का मन ही यम है। जो व्यक्ति अपनी आत्मा पर संयम रखता है, यम उसके दास बन जाते हैं।" यों विचार करके शिवस्वामी ने प्रेतों से पूछा, "तुम लोग अगर मेरा भक्षण करना चाहो तो कर लो, अन्यथा मुझे छोड़ दो, तो मैं अपने रास्ते चला जाऊंगा।"

इस पर पांचों प्रेतों ने एक स्वर मं कहा, "सिद्ध पुरुष, आप जैसे तेजस्वी पुरुष का हम भक्षण नहीं कर सकते। आप निर्विघ्न अपने पथ पर चले जाइए, लेकिन हमने सुना है कि साधु पुरुष अपकार करने वालों का उपकार करते हैं। हमें इस घोर संकट से उद्धार करने का कोई उपाय बताइए।"

"तुम्ही लोग बताओ, किस सत्कर्म के प्रभाव से तुम लोग इस प्रेत जन्म से मुक्तिलाभ कर सकते हो?" शिवस्वामी ने पूछा।

"तो सुनिए। विंध्याचल के दक्षिण में दंडकारण्य है। उसमें सर्वपाप हरण करने वाला 'विरज' नामक एक तीर्थ है। आप हमें लक्ष्य करके उस तीर्थ में तर्पण कीजिए।" यह कहकर सभी प्रेत अदृश्य हो गए।

शिवस्वामी ने माघ कृष्ण चतुर्दशी के दिन विरज क्षेत्र में पहुंचकर प्रेतों की मुक्ति का संकल्प करके तीर्थ स्नान किया। शिवरात्रि को उपवास और जागरण किया। प्रात: काल होते ही अपने पितरों को तर्पण व पिंड दान किया, उसके बाद प्रेतों का स्मरण करके श्राद्ध कर्म संपन्न किया।

प्रेतों ने दिव्य रूप धारण कर परलोक जाते हुए कृतज्ञता प्रकट की, "महात्मन्, आपके अनुग्रह से हम पाप-मुक्त हो स्वर्गगामी हो रहे हैं। आपकी मनोकामना सफल हो।"इसके बाद शिवस्वामी शेष समस्त तीर्थो की यात्रा करके अवंती नगर पहुंचे और धर्माचरण करते हुए आदर्श जीवन बिताने लगे।

महाराजा चित्रकेतु ने शौनक मुनि के मुंह से यह पुराण कथा सुनी और धर्म मार्ग पर राज्य शासन करने लगे। उनके राज्य में प्रजा सुखी और सम्पन्न बनी।

कोई टिप्पणी नहीं: