25 जून, 2013

फलने से पहले ही बर्बाद हुए किन्नौर के सेब


पिछले सप्ताह मौसम के कहर का हिमाचल प्रदेश के सेब पर भी काफी बुरा असर पड़ा। इस प्राकृतिक आपदा में लगभग आधे किन्नौरी सेब नष्ट हो गए। किन्नौर के लोकप्रिय लाल और स्वर्णिम सेब अपनी मिठास, रंग, रस और टिकाऊपन के लिए विख्यात हैं।

बागवानी मंत्री विद्या स्टोक्स ने मंगलवार को कहा, "पूरे किन्नौर में हुई बर्बादी चौंकाने वाली है। सूचना के मुताबिक कुछ क्षेत्रों में पूरा बागीचा ही समाप्त हो गया है।"स्टोक्स ने कहा कि बागवानी विशेषज्ञ जिला मुख्यालय रेकांग पियो पहुंच चुके हैं। वे जल्द ही वास्तविक नुकसान का अनुमान लगाने के लिए प्रभावित क्षेत्रों में पहुंच जाएंगे।

वे उत्पादकों को क्षतिग्रस्त बागीचे के पुनरुद्धार में भी मदद करेंगे। स्टोक्स खुद भी सेब उत्पादक हैं। उन्होंने कहा कि 50 से 60 फीसदी तक सेब की फसल को नुकसान पहुंचा है। किन्नौर में सेब का उत्पादन 10 हजार फुट से अधिक ऊंचाई पर होता है। जिले में प्रमुख सेब क्षेत्र सांग्ला और पूह प्रखंड में हैं, जो सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक किन्नौर में साधारण तौर पर 20 किलो वाली लगभग 20 लाख पेटियों का उत्पादन होता है, जो राज्य की कुल उपज का छह से सात फीसदी है। रेकांग पीयो के बागवानी विकास अधिकारी जगत नेगी ने कहा, "राज्य के अन्य हिस्सों की तरह हमें इस मौसम में किन्नौर से भी 25 से 30 लाख पेटियों के उत्पादन की उम्मीद थी। लेकिन अब यह 15 लाख पेटियों से अधिक नहीं होगा।"

उन्होंने कहा कि 16 से 18 जून तक हुई भारी बारिश से सांग्ला घाटी में अचानक बाढ़ आ गई और वहां भूस्खलन के कारण समूचा बागीचा नष्ट हो गया। नेगी ने कहा कि अधिक ऊंचाइयों पर भी बेमौसम भारी बर्फबारी के कारण सेब के पेड़ नष्ट हो गए। पूह में बेमौसम बर्फबारी और मूसलाधार बारिश के कारण फसल को नुकसान पहुंचा। इसी तरह सेब के कई अन्य क्षेत्र भी प्रभावित हुए। अधिकारियों ने कहा कि बारिश से प्रभावित हुए क्षेत्रों के दौरे पर पहुंचे मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह बर्बादी को देखकर स्तब्ध रह गए। लाहौल-स्पीति के सेब के फसल हालांकि इस प्राकृतिक विनाश से लगभग बचे रहे गए हैं।

पर्दाफाश 

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