19 जून, 2013

लखनऊ की शान और पहचान खतरे में

60 फिट ऊंचा रूमी दरवाजा जो कि लखनऊ का हस्ताक्षर भवन है आज इस दरवाजे में एक दरार पड़ जाने के कारण इसका अस्तित्व खतरे में पड़ रहा है। यह दरवाजा अपनी सुरूचिपूर्ण बनावट के लिए हिन्दुस्तान में ही नहीं बल्कि पूरे विष्व में मषहूर है। इसमें सन्देह नहीं कि लखनऊ की नाजुक मिट्टी में ढला हुआ ये सुविख्यात दरवाजा अपने प्रभावशाली स्थापत्य और मजबूती के कारण बड़ी बड़ी ऐतिहासिक इमारतों से टक्कर लेता है। नवाब आसफुद्दौला ने सन् 1784 ई. में रूमी दरवाजा और इमामबाड़ा बनवाना षुरू किया था। यह इमारतें सन् 1791 में बनकर तैयार हुईं। सच बात यह है कि जब रूमी दरवाजा बन रहा था उस वक्त अवध में अकाल पड़ा हुआ था इसलिए भूखों को रोटी देने की गरज से आसफुद्दौला ने इन इमारतों की विस्त्रत योजना बनायी थी। सवाल ये नहीं था कि नवाब अपनी प्रजा को भोजन दान नहीं कर सकते थे कारण इस बात का था कि तब का आदमी भीख मांगकर या बिना मेहनत के रोटी खाना हराम समझता था। अच्छे अच्छो ने हाथ लगाकर रूमी दरवाजे को जमीन पर खड़ा किया था उस दौर में करीब 22 हजार लोगों ने इस योजना के अन्र्तगत काम किया था। अवध वास्तु कला के प्रतीक इस दरवाजे को तुर्किष गेटवे भी कहा जाता है। कहा जाता है कि लखनऊ का यह प्रसिद्ध षाही द्वार ‘कान्सटिनपोल‘ के एक प्राचीन दुर्ग द्वार की नकल पर बनवाया गया था। यही कारण है कि 19 वीं सदी में लोग इसे कुस्तुनतुनिया कहकर पुकारा करते थे। आज इसी दरवाजे के ऊपरी हिस्से में एक दरार पड़ गयी है। जिसका कारण दरवाजे से गुजरने वाले बड़े साधन या फिर दरवाजे के नीचे बिछी पाइप लाइन हो सकती है। इस दरार के पड़ने से शाही दरवाजे का अस्तित्व खतरे की तरफ जा रहा है। देश- विदेश से आने वाले हजारों दर्षक इस दरवाजे को देखने के लिए आते हैं उन पर इस दरवाजे में पड़ी दरार का क्या प्रभाव पड़ेगा।

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