02 अक्तूबर, 2013

71 की हुई आशा पारेख

बीते जमाने की मशहूर अदाकारा आशा पारेख का आज 71 वां जन्मदिन है। आशा पारेख तमाम सुपर हिट फिल्मे दी। साठ और सत्तर के दिनों में स्टाईल आईकॉन मानी जाने वाली आशा परेख को करियर के शुरुआत में हर निर्माता-निर्देशक ने उन्हें ना कहते रहे। आशा पारेख ने जब फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा ही था तब निर्माता-निर्देशक विजय भट्ट ने उन्हें अपनी फिल्म गूंज उठी शहनाई में काम देने से यह कहते हुए इंकार कर दिया कि उनमें स्टार अपील नहीं है। बाद में उन्होंने आशा की जगह अपनी फिल्म में नई अभिनेत्री अमीता को काम करने का अवसर दिया। 

मुंबई में एक मध्यम वर्गीय गुजराती परिवार में 02 अक्तूबर 1942 को जन्मी आशा पारेख ने अपने सिने करियर की शुरूआत बाल कलाकार के रुप में 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘आसमान’ से की। इस बीच निर्माता-निर्देशक विमल राय एक कार्यक्रम के दौरान आश पारेख के नृत्य को देखकर काफी प्रभावित हुए और उन्हें अपनी फिल्म ‘बाप बेटी’ में काम करने का प्रस्ताव दिया।हीरोइन के रूप में उनकी पहली फिल्म थी 'दिल देके देखो', जो सफल हुई थी। लगभग सत्तर फिल्मों में बतौर अभिनेत्री काम कर चुकीं आशा पारेख की सारी फिल्में बेहद पसंद की गई, जिनमें 'जब प्यार किसी से होता है', 'घराना', 'फिर वही दिल लाया हूं', 'मेरी सूरत तेरी आंखें', 'भरोसा', 'मेरे सनम', 'तीसरी मंजिल', 'लव इन टोक्यो', 'दो बदन', 'आये दिन बहार के', 'उपकार', 'शिकार', 'साजन', 'आया सावन झूम के', 'पगला कहीं का', 'कटी पतंग', 'आन मिलो सजना', 'मेरा गांव मेरा देश', 'कारवां', 'समाधि', 'जख्मी', 'मैं तुलसी तेरे आंगन की' सुपरहिट फिल्मे शामिल हैं। 

वर्ष 1972 में 'कटी पतंग' के लिए इन्हें बेस्ट ऐक्ट्रेस का फिल्मफेयर अवार्ड और फिल्मों में योगदान के लिए फिल्मफेयर का ही लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड वर्ष 2002 में मिला। इनके योगदान के लिए आइफा ने भी 2006 में स्पेशल अवार्ड से सम्मानित किया। हिंदी फिल्मो के अलवा आशा पारेख ने गुजराती, पंजाबी और कन्नड़ फिल्मों में भी काम किया। खूबसूरत 'मिस नीता' के ग्लैमरस किरदार से मशहूर पारेख ने कई गंभीर फिल्मों में गंभीर चरित्र भी निभाए हैं। 

उनकी 10 लोकप्रिय और सफल फिल्मों में शामिल हैं :

'भरोसा' (1963) : ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित सरल कहानी में आशा पारेख ने अभिनेता गुरुदत्त के साथ काम किया है। फिल्म में दोनों कलाकारों के उम्दा अभिनय के अलावा 'वो दिल कहां से लाऊं' जैसे लोकप्रिय गीत भी शामिल थे।

'दो बदन' (1966) : राज खोसला की फिल्म में पारेख ने एक ऐसी युवती के चरित्र को गंभीरता और जीवंतता के साथ निभाया, जिसका प्रेमी हादसे में अंधा हो जाता है और वर्ग विभाजित समाज दोनों प्रेमियों को एक-दूसरे से अलग कर देता है।

'तीसरी मंजिल' (1966) : रहस्य रोमांच से भरपूर फिल्म में पारेख ने शम्मी कपूर के साथ काम किया था, जिसमें वह अपनी मृत बहन के कातिल की तलाश करती हैं। फिल्म में पारेख के जिंदादिल किरदार और अभिनय ने उन्हें एकदम से लोगों की नजरों के केंद्र में ला खड़ा किया।

'बहारों के सपने' (1967) : फिल्म में सुपरस्टार राजेश खन्ना की प्रेमिका की भूमिका में सीधी सादी गंभीर स्वभाव की युवती के किरदार ने दर्शकों को खासा चौंका दिया था, क्योंकि तब तक उनकी छवि चुलबुली और ग्लैमरस नायिका की बन चुकी थी।

'चिराग' (1969) : इस फिल्म में पारेख ने एक दृष्टिहीन महिला का किरदार निभाया था, जिसका अपने पति (सुनील दत्त) से अलगाव हो चुका है। फिल्म का गीत 'तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है' बेहद मशहूर और लोकप्रिय हुआ था।

'कटी पतंग' (1970) : फिल्म में एक विधवा स्त्री का किरदार निभाने से शर्मिला टैगोर के मना कर देने पर निर्देशक शक्ति सामंता ने इस भूमिका में आशा पारेख को लिया था। आशा ने भाग्य की मारी स्त्री के भावुकता भरे किरदार से लोगों का दिल तो जीता ही था, कई अवार्ड भी अपने नाम किए थे।

'नादान' (1971) : फिल्म में पारेख ने एक टॉम ब्वॉय युवती का किरदार निभाया था, जिसे फिल्म के नायक (नवीन निश्चल) के संपर्क में आने के बाद अपने महिला होने का एहसास होता है। 

'कारवां' (1971) : यह फिल्म पारेख के करियर की सफलतम फिल्म थी, जिसमें उन्होंने आखिरी बार नासिर हुसैन के साथ काम किया था।

'मैं तुलसी तेरे आंगन की' (1979) : राज खोसला की इस फिल्म की मुख्य नायिका नूतन थीं और पारेख की भूमिका फिल्म में सिर्फ 20 मिनट लंबी थी, जिसके बावजूद उन्होंने फिल्म में अपने अभिनय से गहरा प्रभाव छोड़ा था।

'बिन फेरे हम तेरे' (1979) : इस फिल्म में पारेख को एक ठेठ भारतीय स्त्री का किरदार निभाने का मौका मिला जो जीवन के कई अच्छे-बुरे दौर से गुजरी। एक तवायफ, एक विधवा और फिर अपनी संतान के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने वाली मां तक का बहुआयामी किरदार पारेख ने इस एक फिल्म में जीवंत कर दिखाया।

आशा पारेख के अभिनय और प्रतिभा की बात करते हुए इससे ज्यादा क्या बोला जा सकता है कि 'आज की मुलाकात बस इतनी' (भरोसा)।

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