11 अक्तूबर, 2013

शिक्षा से आ सकती है बालिकाओं के चेहरे पर मुस्कान

चांद तक पहुंच चुकी दुनिया में बालिकाओं की खिलखिलाहट आज भी उपेक्षित है। खिलकर सभी को खुशी देने वाली लड़कियां आज आज भी खुद अपनी ही खुशी से महरूम हैं। आज भी लड़कियां उपेक्षा और अभावों का सामना कर रही हैं। 

दुनिया को लड़कियों की शिक्षा और अधिकारों के प्रति जागरुक करने के उद्देशय से संयुक्त राष्ट्र ने 19 दिसंबर 2011 को 11 अक्टूबर को विश्व बालिका दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की।

अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाने की प्रेरणा कनाडियाई संस्था प्लान इंटरनेशनल के 'बिकॉज आई एम गर्ल' अभियान से मिली। इस अभियान के तहत वैश्विक स्तर पर लड़कियों के पोषण के लिए जागरुकता फैलाई जाती थी।

अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस पहली बार 11 अक्टूबर 2012 को मनाया गया था।

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक दुनियाभर में बहुत सी लड़कियां गरीबी के बोझ तले जी रही हैं और 7.5 करोड़ से ज्यादा लड़कियां शिक्षा से वंचित हैं। 

हर जगह अपना योगदान करने वाली और चुनौतियों का सामना कर रही लड़कियों के अधिकारों के प्रति लिए जागरुकता फैलाने, उनके सहयोग के लिए दुनिया को जागरुक करने के लिए इस दिवस का आयोजन किया गया।

यह दिवस गरीबी, संघर्ष, शोषण और भेदभाव का शिकार होती लड़कियों की शिक्षा और उनके सपनों को पूरा करने के लिए कदम उठाने पर ध्यान केंद्रित करना ही बालिका दिवस का उद्देश्य है।

दुनिया में हर तीन में से एक लड़की शिक्षा से वंचित है। गरीबी और रुढ़ियों के चलते लड़कियों को स्कूल नहीं भेजा जाता। लाख प्रतिभाशाली होने के बावजूद वह प्राथमिक शिक्षा से आगे नहीं बढ़ पाती। कम उम्र में ही उनकी शादी कर दी जाती है या शादी करने के लिए उन्हें मजबूर किया जाता है। 

आज के समय में लड़कियां लड़कों से एक कदम आगे हैं, लेकिन आज भी वह भेदभाव की शिकार हैं। बाहर ही नहीं बल्कि घर में भी लड़कियां भेदभाव, घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न का शिकार हो रही हैं।

अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस का उद्देश्य बालिकाओं के मुद्दे पर विचार कर के इनकी भलाई की ओर सक्रिय कदम बढ़ाने का है।

अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर दुनियाभर में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। कुछ कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध होते हैं तो कुछ कार्यक्रम एनजीओ द्वारा किए जाते हैं।

साल 2013 में बालिका दिवस का विषय 'बालिका शिक्षा के लिए अभिनव (इनोवेशन फॉर गर्ल चाइल्ड)' रखा गया है क्योंकि लड़कियों को शिक्षित करना हमारा पहला दायित्व है और नैतिक अनिवार्यता भी। शिक्षा से लड़कियां न सिर्फ शिक्षित होती हैं बल्कि उनके अंदर आत्मविश्वास भी पैदा होता है। वे अपने अधिकारों के प्रति जागरुक होती हैं। शिक्षा गरीबी दूर करने में भी सहायक होती है। 

इस तरह संयुक्त राष्ट्र की इस पहल से एक ओर जहां बालिकाओं के प्रति लोग जागरुक होंगे वहीं दूसरी ओर हर जगह प्यार और खुशी लुटाने वाली लड़कियों के चेहरों पर आत्मविश्वास की सच्ची खुशी झलकेगी।
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