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बाराबिरवा निवासी नानी के नाम से प्रसिद्ध रामकली ने बताया कि महंगाई के इस दौर में इस पेशे के साथ जीना मुश्किल हो गया है। जिंदगी का रुख बदल गया है। पेट भरने के लिए कुम्हारी का पुश्तैनी काम छोड़कर मजदूरी और छोटी-मोटी नौकरियों का रुख करना पड़ रहा है।
रामकली कहती हैं कि दीपावली से तीन माह पहले से दीये बनाना शुरू कर देते हैं, मगर त्योहार पर दाल-रोटी ही मयस्सर हो जाये तो बहुत बड़ी बात है। नये कपड़े, मिठाइयां और पटाखे तो बच्चों के लिए सपना बनकर रह गये हैं। हम दूसरों का घर रोशन करने के लिए रात-दिन एक कर देते हैं, मगर अपना ही घर रोशन नहीं कर पाते।
वहीं, नन्हकऊ कहते हैं कि पिछले साल तक एक ट्रॉली मिट्टी की कीमत 5-6 सौ थी, जो अब 15 सौ हो गई है। चूंकि आसपास के जिलों से भी दीये बिकने आते हैं, इसलिए हम लोगों को प्रतिस्पर्धा में माल सस्ता भी बेचना पड़ता है।
ये लोग कहते हैं कि एक साल पहले तक बिजनेस इतना तेज चलता था कि एक-एक कुम्हार तीन माह के अंदर 50-60 हजार दीये बना लेता था, मगर अब नौकरी करने के कारण यह भी संभव नहीं है। जो दीये बनाते हैं, वही नहीं बिक पाते हैं। अब लोग इलेक्ट्रॉनिक दीये और मोमबत्ती ज्यादा पसंद करने लगे हैं।
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