13 नवंबर, 2013

हर घर से रिश्ता चाहते हैं 'पेड़ वाले बाबा'

विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जाकर छात्रों का मानवीय विषयों एवं प्रकृति की ओर ध्यान खींचना और वृक्ष को अपनी बेटी मानते हुए हर घर के सामने एक पेड़ लगाकर उस घर से दिली रिश्ता जोड़ना 'पेड़ वाले बाबा' के जीवन का उद्देश्य है। बाबा अपनी मुहिम में कुछ हद तक सफल भी हुए हैं। उनकी इस लगन के लिए राज्यपाल बी.एल. जोशी ने उन्हें सम्मानित भी किया है। 

पेड़ वाले बाबा के नाम से प्रसिद्ध आचार्य चंद्रभूषण तिवारी की जीवन यात्रा की कहानी बड़ी ही मर्मस्पर्शी है। उत्तर प्रदेश में देवरिया जिले के एक छोटे से गांव भंटवा तिवारी में पैदा हुए इस शख्स ने एक ऐसी मुहिम शुरू करने का फैसला किया, जिससे उनकी जिंदगी बदल गई। अब तिवारी राजधानी और सूबे के अन्य हिस्सों में पेड़ वाले बाबा के नाम से मशहूर हैं। आचार्य चंद्रभूषण तिवारी उर्फ पेड़ वाले बाबा ने बातचीत में अपने जीवन के उन पहलुओं को भी सामने रखा, जिससे आम आदमी कुछ सीख सकता है।

तिवारी ने कहा कि गांव के जिस स्कूल में पढ़ता था वहां हर शनिवार बालसभा होती थी। मैं भी उसमें हिस्सा लेता था। बाद में मैं अपने गांव में भी बालसभा कराने लगा। इस दौरान मैं लोगों को आम, जामुन और कटहल के पौधे भी देता था। इस काम से गांव में प्रशंसा मिली। भटवां तिवारी गांव में प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के बाद तिवारी लखनऊ आ गए। लखनऊ विश्वविद्यालय से उन्होंने स्नातक की उपाधि हासिल की। फिर बीएड किया और उन्हें केंद्रीय विद्यालय में शिक्षक की नौकरी मिल गई। 

बकौल तिवारी, "लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान मैं राजधानी की झुग्गी-झोपड़ियों में बच्चों के बीच चला जाता था। राजधानी में घर-घर जाकर बच्चों के लिए पुराने कपड़े दान के तौर पर ले आता था। गरीब-बेसराहा बच्चे काफी खुश होते थे।" तिवारी बताते हैं कि वर्ष 1995 उनके जीवन में निर्णायक साबित हुआ। वह ओडिशा में केंद्रीय विद्यालय में तैनात थे। लखनऊ के गरीब बच्चों ने उन्हें चिट्ठी लिखी। बच्चों ने लिखा था, "अंकल आप कब आओगे, खिलौने और मिठाई कब लाओगे। किताबें कब मिलेंगी।" पत्र पढ़ने के बाद तिवारी ने नौकरी छोड़ लखनऊ आने का फैसला किया।

नौकरी छोड़ने के बाद शुरू हुई पेड़ वाले बाबा की असली कहानी। लखनऊ आने पर उन्होंने बच्चों से मुलाकात की। फिर उनका जीवन बच्चों और वृक्षों को समर्पित हो गया। राजधानी में सालेहनगर, सेक्टर एम 1 आशियाना, औरंगाबाद रेलवे क्रॉसिंग के पास और हनीमैन चौराहे के पास तिवारी ने चार स्कूल खोल रखे हैं। इन स्कूलों में गरीब बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देते हैं।

तिवारी बताते हैं कि हर घर से दान लेने के बदले वहां एक वृक्ष लगाकर रिश्ता जोड़ने की मुहिम की वजह से ही वह कब तिवारी से पेड़ वाले बाबा बन गए, पता नहीं चला। आज लोग उन्हें पेड़ वाले बाबा के नाम से पुकारते हैं। तिवारी ने बताया कि अखबारों के माध्यम से ही उनके कार्यो की गूंज सूबे के राज्यपाल बी.एल. जोशी तक पहुंची। जोशी ने खुद उन्हें बुलवाया और सम्मानित किया। तिवारी ने कहा, "जब राजभवन से फोन आया तो मुझे विश्वास नहीं हुआ, लेकिन वहां जाने के बाद उन्होंने मेरे काम की बहुत प्रशंसा की और पांच हजार रुपये भी दिए।"
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