16 दिसंबर, 2013

एक थी निर्भया

दिल्ली में पिछले साल 16 दिसंबर को एक मेडिकल स्टूडेंट के साथ चलती बस में बर्बर सामूहिक दुष्कर्म की घटना का एकमात्र गवाह पीड़िता का दोस्त है। एक वर्ष पहले हुई इस जघन्य वारदात ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था और पीड़िता के दोस्त अरविंद पांडेय का कहना है कि वह अभी भी सदमे में हैं और अपराध बोध से गुजर रहे हैं। 

29 वर्षीय पांडेय अपनी 23 वर्षीय फिजियोथेरेपिस्ट दोस्त के साथ उस दुर्भाग्यपूर्ण रात को दक्षिणी दिल्ली के मुनिरका स्थित बस स्टाप से बस पर चढ़े थे। उन्होंने कहा कि उनको केवल एक बात से संतोष है कि दोषियों में से चार को मृत्युदंड दिया गया है। लेकिन पांडेय की मांग है कि अरोपियों में से नाबालिग को भी कठोर दंड दिया जाए। 

पूर्वी उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित अपने घर से पांडेय ने फोन पर कहा, "मैं अक्सर खुद से पूछता हूं कि क्या इस पूरी घटना के लिए मैं जिम्मेदार हूं? मैं मॉल क्यों गया? मैं बस में क्यों चढ़ा? मैं दो हफ्ते तक ठीक से बोल भी नहीं पाया।" पांडेय सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। पांडेय उस रात के हमले में गंभीर रूप से घायल हुए थे और बाद में जीवित बच गए थे। उनकी दोस्त की 13 दिनों बाद मौत हो गई। 

बस में दुष्किर्मियों के बीच गुजरे भयावह 84 मिनटों को याद करते हुए पांडेय ने कहा कि जब उन्होंने 'लाइफ ऑफ पाई' फिल्म देखने का फैसला किया तो उनको पता नहीं था कि इसके कारण ऐसी बर्बर घटना घटेगी जो एक वर्ष बाद भी उनका पीछा करेगी। 

उधर, पीड़िता के परिजनों को अभी भी उस दिन का इंतजार है, जब दुष्कर्मियों को फांसी पर लटकाया जाएगा। चलती बस में दरिंदगी की शिकार होने के बाद 13 दिन संघर्ष करते हुए मौत से हारने वाली 23 साल की फीजियोथेरेपी प्रशिक्षु के पिता ने कहा, "हमारे लिए बस समय ही गुजरा है। लेकिन उसके (पीड़िता) घावों की तरह ही हमारे घाव आज भी हरे हैं। मुझे नहीं लगता कि हम कभी इससे उबर पाएंगे।" उज्जवल भविष्य' की ओर कदम बढ़ाने वाली अपनी 'तेजस्विनी बेटी' के अंतिम दिनों को याद करते हुए उनकी आंखों से आंसू टपक पड़े। पीड़िता ने देहरादून से फीजियोथेरेपी का अध्ययन किया था और दिल्ली के एक निजी अस्पताल में बतौर प्रशिक्षु कार्यरत थी।

पीड़िता के पिता ने कहा, "वह जब भी देहरादून से आती थी, दरवाजे के पीछे छिपकर मुझे चौंका देती थी।" इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे पर कुली का काम करने वाले 54 वर्षीय शोकाकुल पिता ने आगे कहा, "उसकी हर चीज मेरे दिमाग में हमेशा घूमती रहती है। मेरे लिए वह अभी भी जीवित है। मेरे लिए समय जैसे ठहर-सा गया है। लगता है, जैसे वह अभी भी दरवाजे के पीछे छिपी हुई है और अचानक कभी भी मेरे सामने आ जाएगी।"

पीड़िता के पिता की अब एक ही इच्छा है, दरिंदों को जल्द से जल्द फांसी। पश्चिमी दिल्ली के द्वारका में अपने दो कमरों वाले घर में बैठे पीड़िता के पिता ने आईएएनएस को बताया, "अपराधियों को फांसी मिलने के बाद ही मुझे संतुष्टि मिलेगी। इससे मेरे परिवार को कुछ सांत्वना मिलेगी।" वह चार महीने पहले ही सरकार द्वारा आवंटित इस घर में आए हैं। पिछले वर्ष राष्ट्रीय राजधानी में एक चलती बस में पांच व्यक्तियों एवं एक किशोर की हवस का शिकार बनी पीड़िता 13 दिनों तक जीवन के लिए जूझती रही।

दिल्ली की एक अदालत द्वारा चार अपराधियों को सुनाई गई मृत्युदंड की सजा से पीड़िता के परिजन संतुष्ट हैं। एक अपराधी (बस के चालक) ने न्यायिक हिरासत के दौरान तिहाड़ जेल में खुदकुशी कर ली थी। दूसरी ओर, पीड़िता के परिजन अपराधी किशोर को मिली सजा से खुश नहीं हैं। किशोर आरोपी को किशोर न्याय बोर्ड ने तीन वर्ष सुधार गृह में रहने की सजा सुनाई है। चार अपराधियों को मिली मृत्युदंड की सजा के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में अभी सुनवाई चल रही है।

पीड़िता के पिता ने बताया, "हमने सर्वोच्च न्यायालय से किशोर न्याय बोर्ड के फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया है।" पिता ने थोड़ा गुस्से से कहा, "किसी दुष्कर्मी को सिर्फ इसलिए कैसे छोड़ा जा सकता है कि वह किशोर है। वह उस बर्बरता में शामिल था। उसे भी फांसी दी जानी चाहिए, ताकि दूसरों को सबक मिले।"

बगल में ही बैठी पीड़िता की मां सब चुपचाप सुनती रहीं और लगातार आंसू बहाती रहीं। उन्होंने बताया कि उनके मन में बेटी की अंतिम समय की छवि जैसे जम सी गई है। भाव-विह्वल होते हुए उन्होंने बताया, "उस शाम जब वह घर से जा रही थी, मैं कभी भूल नहीं सकती। उसने हाथ हिलाकर मुझसे विदा ली और उसके अंतिम वाक्य थे, "बाय मॉम, मैं कुछ ही घंटों में आ जाऊंगी"।" "पर वह घर नहीं लौटी, कभी लौटेगी भी नहीं।" पीड़िता के परिजन शुक्रवार, 16 दिसंबर को पीड़िता की बरसी पर दिल्ली के मध्य में 'कांस्टिट्यूशन क्लब' में पीड़िता की याद में एक श्रद्धांजलि समारोह आयोजित करने की योजना बना रहे हैं।

पिता ने बताया, "हमारा समर्थन करने वाले सभी लोगों को हम धन्यवाद देना चाहते हैं।" अपनी बेटी के अंतिम क्षणों को याद करते हुए उसके पिता ने कहा कि उनके मन में एक कसक रह गई कि वह अपनी बेटी की अंतिम इच्छा पूरी नहीं कर सके। उन्होंने कहा, "वह पानी पीना चाहती थी, पर चिकित्सकों ने मुझे उसे पानी देने से मना किया था। वह मुझसे पानी पीने के लिए कहती रही, पर मैं नहीं दे सका।" इतना कहते-कहते उनका गला रुं ध गया।

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