06 नवंबर, 2015

ये है कुतिया महारानी मां का मंदिर, जहाँ श्रद्धालु मांगते हैं सुख-समृद्धि व परिवार खुशहाली की मन्नतें

अपने देश में कई मंदिर है जहां भक्त बडी आस्था के साथ जाते हैं और अपना सर झुका कर भगवान् का आशीर्वाद लेते है। लेकिन आप ने कभी ऎसा मंदिर देखा है जहां भगवान की मूर्ति नही होती है इस मंदिर में कुतिया की पूजा होती है। बुंदेलखंड क्षेत्र के झांसी जनपद में स्थित रेवन व ककवारा गांवों के बीच लिंक रोड पर कुतिया महारानी मां का एक मंदिर है, जिसमें काली कुतिया की मूर्ति स्थापित है। आस्था के केंद्र इस मंदिर में लोग प्रतिदिन पूजा करते हैं। श्रद्धालु यहां सुख-समृद्धि व परिवार एवं फसलों की खुशहाली की मन्नतें मांगते हैं। झांसी के मऊरानीपुर के गांव रेवन व ककवारा के बीच लगभग तीन किलोमीटर का फासला है। इन दोनों गांवों को आपस में जोड़ने वाले लिंक रोड के बीच सड़क किनारे एक चबूतरा बना है। इस चबूतरे पर एक छोटा सा मंदिर नुमा मठ बना हुआ है। इस मंदिर में काली कुतिया की मूर्ति स्थापित है। मूर्ति के बाहर लोहे की जालियां लगाई गई हैं, ताकि कोई इस मूर्ति को नुकसान न पहुंचा सके।

इस मंदिर पर आसपास के गांवों की महिलाएं प्रतिदिन जल चढ़ाने आती हैं और यहां पूजा-अर्चना कर अपने परिवार की खुशहाली का आशीर्वाद मांगती हैं। वैसे तो आबादी से दूर यह छोटा सा मंदिर सुनसान सड़क पर बना है, मगर यहां के लोगों की कुतिया महारानी के प्रति अपार श्रद्धा है। ग्रामीणों के मुताबिक, कुतिया का यह मंदिर उनकी आस्था का केंद्र है। बताया जाता है कि दोनों गांवों में जब भी किसी भी आयोजन में होने वाला खाना यानी पंगत होती थी, तो यह कुतिया वहां पहुंचकर पंगत खाती थी। पुराने समय में पंगत शुरू होने से पहले बुंदेलखंडी लोक संगीत का एक वाद्य यंत्र रमतूला बजाया जाता था। उसकी आवाज सुनकर उस आयोजन में आमंत्रित सभी लोग पंगत खाने पहुंच जाते थे।

एक बार ककवारा व रेवन दोनों गांवों में कार्यक्रम था। दोनों जगह पंगत होनी थी। कुतिया को भी दोनों जगह जाना था। मगर वह उस दिन कुछ बीमार थी। ककवारा का रमतूला जैसे ही बजा, वह ककवारा की ओर दौड़ने लगी। जब तक वह ककवारा पहुंची, वहां पंगत खत्म हो चुकी थी। वह थक कर चूर हो गई। उसने सोचा कुछ आराम कर लूं। वह वहीं लेट गई। इसी दौरान रेवन गांव का रमतूला बजने लगा। कुतिया ने सोचा कि यदि देर हो गई तो रेवन की पंगत भी नहीं मिलेगी और उसे भूखा ही रहना पड़ेगा। यह सोचकर वह रेवन की ओर दौड़ गई। जब तक वह रेवन पहुंची, वहां की भी पंगत खत्म हो गई।

दोनों ओर से खाना न मिलने और बीमारी की वजह से वह हताश होकर वापस चल पड़ी और रेवन व ककवारा के बीच एक स्थान पर सड़क किनारे गिरकर बेहोश हो गई और कुछ देर बाद उसकी मौत हो गई। सुबह जब गांव वालों को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने कुतिया के शव को वहीं पर दफना दिया और उसी स्थान पर इस मंदिर का निर्माण करा दिया। तब से यह कुतिया महारानी मां के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।

आपको बता दें कि एक ऐसा ही मंदिर छत्तीसगढ़ में है जहाँ एक कुत्ते की पूजा होती है| छत्तीसगढ़ के राजनंद गांव के एक मंदिर में एक कुत्ते की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर से जुड़ी यह मान्यता है कि इसके प्रदक्षिणा से कुकुर खांसी व कुत्ते के काटने से कोई रोग नहीं होता। ‘कुकुरदेव मंदिर’ राजनंदगांव के बालोद से छह किलोमीटर दूर मालीघोरी खपरी गांव में है। दरअसल यह मंदिर भैरव स्मारक है, जो भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के शिखर के चारों ओर दीवार पर नागों का अंकन किया गया है। इस मंदिर का निर्माण हालांकि फणी नागवंशी शासकों द्वारा 14वीं-15 वीं शताब्दी में कराया गया था। इस मंदिर के प्रांगण में स्पष्ट लिपियुक्त शिलालेख भी है, जिस पर बंजारों की बस्ती, चांद-सूरज और तारों की आकृति बनी हुई है। राम लक्ष्मण और शत्रुघ्न की प्रतिमा भी रखी गई है। मंदिर के प्रांगण में कुत्ते की प्रतिमा भी स्थापित है।

जनश्रुति के अनुसार, कभी यहां बंजारों की बस्ती थी। मालीघोरी नाम के बंजारे के पास एक पालतू कुत्ता था। अकाल पड़ने के कारण बंजारे को अपने प्रिय कुत्ते को मालगुजार के पास गिरवी रखना पड़ा। इसी बीच, मालगुजार के घर चोरी हो गई। कुत्ते ने चोरों को मालगुजार के घर से चोरी का माल समीप के तालाब में छुपाते देख लिया था। सुबह कुत्ता मालगुजार को चोरी का सामान छुपाए स्थान पर ले गया और मालगुजार को चोरी का सामान भी मिल गया। कुत्ते की वफादारी से अवगत होते ही उसने सारा विवरण एक कागज में लिखकर उसके गले में बांध दिया और असली मालिक के पास जाने के लिए उसे मुक्त कर दिया। अपने कुत्ते को मालगुजार के घर से लौटकर आया देखकर बंजारे ने डंडे से पीट-पीटकर कुत्ते को मार डाला। कुत्ते के मरने के बाद उसके गले में बंधे पत्र को देखकर उसे अपनी गलती का एहसास हुआ और बंजारे ने अपने प्रिय स्वामी भक्त कुत्ते की याद में मंदिर प्रांगण में ही कुकुर समाधि बनवा दी। बाद में किसी ने कुत्ते की मूर्ति भी स्थापित कर दी। आज भी यह स्थान कुकुरदेव मंदिर के नाम से विख्यात है।

इस मंदिर में वैसे लोग भी आते हैं, जिन्हें कुत्ते ने काट लिया हो। यहां हालांकि किसी का इलाज तो नहीं होता, लेकिन ऐसा विश्वास है कि यहां आने से वह व्यक्ति ठीक हो जाता है। ‘कुकुरदेव मंदिर’ का बोर्ड देखकर कौतूहलवश भी लोग यहां आते हैं। उचित रखरखाव के अभाव में यह मंदिर हालांकि जर्जर होता जा रहा है। 

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