शहीद-ए-आज़म भगत सिंह की जयंती पर विशेष.....

आधुनिक विश्व में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि किसी ने सरदार भगत सिंह की तरह कम उम्र में ही अपने मौलिक विचारों का प्रवर्तन करने का प्रयास किया हो। भगत सिंह बुद्धिजीवी थे, लेकिन शहीद-ए-आजम का यह पक्ष अब तक अप्रचारित है। उनके उज्ज्वल व्यक्तित्व के इस पहलू की तरफ वे लोग भी ध्यान नहीं देते जो स्वयं को भगत सिंह की परंपरा के ध्वजवाहक कहते हैं।

भगत सिंह जब 17 वर्ष के थे, तो 'पंजाब में भाषा और लिपि की समस्या' विषय पर आयोजित एक राष्ट्रीय निबंध प्रतियोगिता में उन्होंने हिस्सा लिया था। कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'मतवाला' में उन्होंने एक लेख लिखा था और उसी लेख को इस प्रतियोगिता में भेज दिया। भगत सिंह को इस लेख के लिए 50 रुपये का प्रथम पुरस्कार मिला था।

भगत सिंह एक ऐसे परिवार में पैदा हुए थे जो राष्ट्रवादी और देशभक्त परिवार था। भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह विचारक, लेखक और देशभक्त नागरिक थे। उनके पिता खुद एक बड़े देशभक्त थे। उनका भगत सिंह के जीवन पर गहरा असर पड़ा। लाला छबीलदास जैसे पुस्तकालय के प्रभारी से मिली किताबें भगत सिंह ने दीमक की तरह चाट डाली थी। पुस्तकालय प्रभारी ने कहा था कि भगत सिंह किताबों को पढ़ता नहीं था, वह तो निगलता था। भगत सिंह को फांसी होने वाली थी, फिर भी वह अपने अंतिम समय तक रोज किताबें पढ़ रहे थे। भगत सिंह मृत्युंजय थे।

भगत सिंह को हिंदी, उर्दू, पंजाबी तथा अंग्रेजी के अलावा बांग्ला भाषा भी आती थी, जो उन्होंने बटुकेश्वर दत्त से सीखी थी। जेल में भगत सिंह करीब दो साल रहे। इस दौरान वह लेख लिखकर अपने क्रांतिकारी विचार व्यक्त करते रहे। जेल में रहते हुए उनका अध्ययन बराबर जारी रहा। जेल प्रवास के दौरान उनके लिखे लेख व सगे-संबंधियों को लिखे पत्र वस्तुत: उनके विचारों के दर्पण हैं।

भगत सिंह मानते थे कि केवल अंग्रेजों के चले जाने से देश की आजादी का सपना पूरा नहीं हो सकता। केवल गोरे साहबों के स्थान पर भूरे साहबों का शासन होने से देश की बहुसंख्यक गरीब जनता का भला नहीं होने वाला है। इसलिए भगत सिंह ने समाजवादी विचारों का प्रचार करने और देश में समाजवादी शासन की स्थापना का सपना देखा।

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गांव में हुआ था, जो इस समय पाकिस्तान में है। उनके पिता का नाम किशन सिंह और मां का नाम विद्यावती कौर था। इस सिख परिवार ने आर्य समाज के विचारों को अपना लिया था। उनके परिवार पर आर्य समाज और महर्षि दयानंद की विचारधारा का गहरा प्रभाव पड़ा था। क्रांतिकारी भगत सिंह को 23 मार्च 1931 को मात्र 23 वर्ष की अवस्था में फांसी दे दी। वह शहीद-ए-आजम कहलाए और आज भी लाखों युवाओं के दिल में बसते हैं। 

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