01 जनवरी, 2014

सर्द रातों मे नहीं जलते अलाव, रैन बसेरों पर पड़े ताले, तो कहां जायें गरीब निराश्रित........?

शासन द्वारा कितनी ही योजनायें भले ही चलायी जाती हों लेकिन योजनायें बनाने के बाद शासन द्वारा कभी भी यह देखने की जहमत नहीं उठायी जाती कि उसके द्वारा लागू की गई योजनायें धरातल पर क्रियान्वित भी हो रही हैं या नहीं। ऐसे ही शासन द्वारा गरीब व निराश्रित लोगों को जाड़े के मौसम मे उन्हें सर्दी से बचाने के लिए कम्बल बांटने व अलाव जलाकर उनके स्वास्थ्य की रक्षा का जुम्मा जिला प्रशासन को सौंपा गया है। आइये देखते हैं कि जनपद खीरी मे इसका क्रियान्वयन जिला प्रशासन किस तरह से करा रहा है। शीत लहर व घने कोहरे के कहर ने हिमालय की तलहटी मे बसे जनपद खीरी मे आम जनमानस के जीवन को अस्त व्यस्त कर दिया है, ठिठुरन और शरीर को कपकपा देनी वाली सर्द हवाओं से गरीबों व निराश्रित लोगों को बचाने हेतु जिला प्रशासन द्वारा किया जा रहा दावा खोखला नजर आ रहा है। 

वर्ष 2013 के सबसे ठण्डे दिन 31 दिसम्बर की रात को जब पर्दाफाश संवाददाता द्वारा प्रशासनिक व्यवस्थाओं की हकीकत जाननी चाही गई तो प्रशासनिक व्यवस्थायें अव्यवस्थाओं मे परिवर्तित दिखायी दी। जिला प्रशासन ने गरीब निराश्रितों को ठण्ड से बचाने के जो प्रयास किये हैं वह ऊंट के मुंह मे जीरा नजर आये। ठण्ड से कांपते लोगों ने इस संवाददाता को बताया कि भाईसाहब हमारा हाल तो आप देख ही रहे हैं इतनी ठण्ड मे भी हमारी सुधि लेने वाला कोई नहीं है। गन्ने की थोड़ी सी खोई डालकर कहीं कहीं पर अलाव तो जलाये गये हैं लेकिन उनकी हालत ऐसी ही है जैसे फूस तापना। अलाव के नाम पर लकड़ी का तो कहीं नामो निशान ही नहीं है। रैन बसेरे के नाम पर तो प्रशासन द्वारा गरीब निराश्रितों का मजाक ही उड़ाया जा रहा है। बीती रात हो रही धीमी बारिश और हांड़ कपा देने वाली ठण्डी हवाओं के कारण गरीब निराश्रित इधर उधर आश्रय लेते दिखायी दिये। पहाड़ों पर हुयी जबर्दस्त बर्फबारी और कई इलाकों मे हुयी बारिश से बढ़ी ठण्ड और गलन ने तराई इलाका कहलाने वाले जनपद खीरी मे कहर सा बरपा रखा है। 

जहां एक ओर सर्दी मे जनता प्रशासन से कम्बल, रैनबसेरा, अलाव आदि की और बेहतर व्यवस्था की आस लगाये बैठी है वहीं दूसरी ओर प्रशासन लोगों को ठण्ड से बचाने के लिए केवल कागजो पर आंकड़ों की बाजीगरी मे जुटा है, इसका ताजा उदाहरण तब देखने को मिला जब प्रशासन द्वारा सदर तहसील मे स्थापित किये गये रैन बसेरे मे ताले लटकते दिखायी दिये और साथ ही रैन बसेरा लिखा हुआ एक बैनर भी टंगा दिखायी दिया जो इस बात की गवाही दे रहा था कि प्रशासन द्वारा बैनर टांगकर लोगों को ठण्ड से बचाने के लिए मात्र खाना पूर्ति ही की गई है। इसी तरह रोडवेज बस स्टेशन पर बनाये गये रैन बसेरे मे भी प्रशासन द्वारा महज एक चटाई बिछाकर लोगों को ठण्ड से बचाने के प्रयास किये गये है जहां न कुछ ओढ़ने की व्यवस्था है और न ही बिछाने की। प्रशासन ने गरीबो के साथ इतना ही मजाक नहीं किया बल्कि रेलवे स्टेशन के पास हर वर्ष स्थापित किया जाने वाला रैन बसेरा भी इस वर्ष स्थापित नहीं किया गया है, जिसके चलते रात मे रेलगाडि़यों से आने वाले यात्री खुले आसमान के नीचे जमीन पर ठिठुरने को विवश है। 

लोगों को शीतलहर से बचाने के लिए प्रशासन द्वारा महज इक्का दुक्का स्थानो को छोड़कर अन्य किसी जगह पर भी अलाव जलवाने का प्रबंध नहीं किया गया है और यदि कहीं इक्का दुक्का स्थानो पर अलाव जलवाये भी गये हैं तो वह सिर्फ खानापूर्ति मात्र ही नजर आ रहे हैं। इस बारे मे अपर जिलाधिकारी विद्या शंकर सिंह से जानकारी लेने पर उन्होने बताया कि ‘‘निराश्रित व गरीब लोगों को ठण्ड से बचाने के लिए प्रशासन द्वारा पांच लाख रुपयों के कम्बल बाटे गये है, साथ ही साथ जनपद की प्रत्येक तहसील को अलाव जलवाने के लिए पचास-पचास हजार रुपये भी आवंटित किये गये है।‘‘ अपर जिलाधिकारी विद्या शंकर सिंह भले ही कम्बल बांटने व अलाव जलवाने का राग अलाप रहे हों लेकिन जमीनी हकीकत तो कुछ और ही बयां कर रही है।
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