18 मई, 2016

केंद्रीय मदद वाले रिकार्ड खत्म करने के लिए तो नहीं लगाई गई मंडी भवन में आग…?

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित मंडी परिषद के भवन में रविवार रात लगी में घोटालों का धुंआ उठ रहा है। मंडी परिषद में 70 करोड़ रुपये से ज्यादा के 17 मामलों में गड़बड़ियों पर 12 मई को विधानसभा की ऑडिट आपत्ति निस्तारण कमिटी ने नाराजगी जताते हुए जांच के आदेश दिए थे। इसके चौथे ही दिन लगी आग में मामलों से जुड़ी ज्यादातर फाइलें राख हो गईं। माना जा रहा है कि इन मामलों में कई बड़े अधिकारियों की गर्दन फंस सकती थी, लेकिन आग के बाद अब कार्रवाई मुश्किल हो गई है। 

किसान मंडी भवन में लगी आग में करोड़ों रुपये के मंडी शुल्क घपले से संबंधित रिकॉर्ड भी स्वाह हो गए। निर्यात फर्मों को लाइसेंस में दी गई छूट में हुए घोटाले की जांच अब शायद ही आगे बढ़ सके, क्योंकि उसका रिकॉर्ड भी आग की भेंट चढ़ गया। केंद्र से बुंदेलखंड पैकेज के रूप में मिली भारी-भरकम राशि को खर्च करने में हुई गड़बड़ी की जांच संबंधी फाइलों का भी यही हश्र हुआ। विभागीय सूत्रों के मुताबिक, कुछ समय पहले मंडी शुल्क वसूली में करोड़ों रुपये के घपले की जांच शुरू हुई थी। इस अग्निकांड के बाद इससे जुड़ी अधिकतर फाइलें नहीं बची हैं। नोएडा की एक फर्म के खिलाफ ही एक करोड़ रुपये से ज्यादा के घपले की जांच चल रही थी, उसकी फाइल भी जल गई।

सूत्रों की माने तो इस अग्निकांड के पीछे केंद्रीय मदद वाली योजनाओं का रिकार्ड ख़त्म करने के लिए किया गया। इस अग्निकांड में बुन्देखण्ड पैकेज और कृषि मार्केटिंग हब से सम्बंधित फाइलें ज्यादा क्यों जली।केंद्र की इन दोनों योजनाओं में पिछले पांच वर्षों में एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा के काम दिखाए गए हैं। इस भीषण अग्निकांड में बुंदेलखंड पैकेज से बनीं साढ़े तीन अरब की मंडियों की फाइलें भी जलने का अंदेशा है। इन मंडियों के निर्माण में बड़े पैमाने पर धांधली होने की शिकायतें हुई थीं। कुछ में जांच भी शुरू हो गई थी। मंडियों का निर्माण 2013-14 में पूरा होना था, लेकिन अभी तक अधूरी हैं। करीब 3.35 अरब की लागत वाली मंडियों के निर्माण में करीब 2.28 अरब रुपये खर्च किए जा चुके हैं। खबरों के मुताबिक इस अग्निकांड में बुंदेलखंड पैकेज से सात जिलों में 64-64 करोड़ रुपये की लागत से बनाई जा रही विशिष्ट मंडियों की फाइलें भी जलकर राख हो गईं हैं। मंडियों के कागजात के जलने को लेकर तरह- तरह की चर्चाएं हैं। क्योंकि करोड़ों की लागत से बनने वाली मंडियों के निर्माण में बड़े पैमाने पर धांधली होने की शिकायतें मिलती रही हैं। कुछ शिकायतें शासन स्तर पर भी गई। कुछ में स्थानीय स्तर पर जांच भी हुई थी।

प्रदेश सरकार ने बुंदेलखंड विकास पैकेज से बुंदेलखंड के लिए कुल 73 विशिष्ट मंडियां स्वीकृत की थीं। इनकी लागत 3 अरब 35 करोड़ 85 लाख रुपये बताई गई थी। इस योजना में बांदा में नौ, महोबा में चार, हमीरपुर में 10 और चित्रकूट में तीन मंडियों का निर्माण अधूरा है। यह स्थित तब है, जब प्रदेश सरकार इन मंडियों के लिए दो अरब 28 करोड़ 40 लाख रुपये से ज्यादा दे चुकी है। मंडियों का निर्माण वर्ष 2013 या 2014 में पूरा हो जाना चाहिए था। लेकिन अभी तक अधूरी हैं। इतना ही नहीं महोबा में मंडियों के निर्माण के लिए 4627.53 लाख रुपये अवमुक्त हुए लेकिन खर्च 4669.26 लाख रुपये हुए। कहा जाता है कि ज्यादा खर्च होने पर प्रशासन अन्य व्ययों के लिए आए धन को किसी भी कार्य में लगा सकता है।

कुछ समय पहले मंडी शुल्क में समाधान योजना लाई गई थी, उसमें भी करोड़ों का घपला हुआ था। इस मामले से संबंधित फाइलें भी नष्ट हो गईं। मसालों पर लगने वाले मंडी शुल्क के लिए लाई गई समाधान योजना में भी कुछ वर्ष पहले बड़ा घपला सामने आया था, उससे संबंधित फाइलों को दुबारा तैयार कर पाना अब नामुमकिन होगा, क्योंकि मुख्यालय स्तर की फाइलों में तमाम ऐसी नोटिंग थी, जो और कहीं नहीं मिल सकती। तमाम कामों के लिए विभिन्न फर्म्स को दिए गए एडवांस से संबंधित रिकॉर्ड भी आग की भेंट चढ़ गए। मंडी परिषद में और भी तमाम घोटाले हैं, जो भविष्य में सामने आ सकते थे, लेकिन इस अग्निकांड की वजह से उसकी गुंजाइश ही खत्म हो गई।

तमाम कामों के लिए विभिन्न फर्म्स को दिए गए एडवांस से संबंधित रिकॉर्ड भी आग की भेंट चढ़ गए। मंडी परिषद में और भी तमाम घोटाले हैं, जो भविष्य में सामने आ सकते थे, लेकिन इस अग्निकांड की वजह से उसकी गुंजाइश ही खत्म हो गई। किसान मंडी भवन में हुए अग्निकांड में मेंटेनेंस विभाग की भूमिका भी संदिग्ध लग रही है। घटना के समय न तो फ्लोर इंचार्ज मौके पर मौजूद थे और न ही परिसर में लगा कोई हाइड्रेंट काम कर रहा था।

अग्निशमन विभाग के अधिकारियों ने इसके पीछे किसी बड़ी साजिश की आशंका जताई है। किसान मंडी भवन में सभी फ्लोर पर यूपी सैनिक कल्याण निगम के सुरक्षा गार्डों की ड्यूटी रहती है। इसके अलावा मंडी भवन की अपनी फायर यूनिट है, जिसके कर्मचारी 24 घंटे मुस्तैद रहते हैं। बताया जा रहा है कि आग रविवार रात लगभग सवा बारह बजे लगी। सिक्योरिटी गार्ड लाल बहादुर ने इसकी सूचना मंडी भवन की फायर यूनिट को दी। उन्होंने पहले खुद ही आग बुझाने की कोशिश की। जब रिकॉर्ड रूम पूरी तरह से आग की चपेट में आ गया और खिड़कियों से भीषण लपटें निकलने लगीं तो इसकी सूचना अग्निशमन विभाग और पुलिस को दी गई। इसके बाद फायर ब्रिगेड बुलाई गई।

आपको बता दें कि मंडी शुल्क वसूली में करोड़ों रुपये के घपले की जांच शुरू हुई थी। आग से अधिकांश फाइलें नष्ट हो गईं। कई नियार्त फर्मों को लाइसेंस में दी गई छूट वाली फाइलें भी राख हो गईं। यानी इनमें गड़बड़ियों की जांच नहीं हो पाएगी। केंद्र से बुंदेलखंड पैकेज के रूप में मिली रकम को खर्च करने में हुई गड़बड़ी की जांच संबंधी फाइलें भी आग की भेंट चढ़ गईं। कृषि उत्पादन आयुक्त (एपीसी) प्रवीर कुमार ने अग्निकांड की जांच के लिए विशेष सचिव (कृषि एवं विपणन) मार्कण्डेय शाही की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया है। उसे एक हफ्ते में रिपोर्ट सौंपनी है। एपीसी प्रवीर ने कहा कि आग से कई महत्वपूर्ण अनुभागों में कुछ बचा ही नहीं है।

राजधानी के सरकारी दफ्तरों में छुट्टी के दिन या दफ्तर बंद होने के बाद ही आग लगने की घटनाएं होती हैं और महत्वपूर्ण फाइलें इनकी भेंट चढ़ जाती हैं। जानकारों के अनुसार दफ्तर बंद होने से बिजली का लोड कम होता है। ऐसे में शॉर्ट सर्किट की संभावनाएं काफी कम हो जाती हैं। इसके बावजूद आग लगने की घटनाएं सवाल पैदा करती हैं। इसके पहले इंदिरा भवन व स्वास्‍थ्य भवन में भी इसी तरह की आग लगी थी, जिसमें फाइलें जल गईं थीं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि अगर ये साजिश है तो आखिर इसके पीछे कौन है?

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