कविता

""""""""""""इस सावन रूठे सजन हमार""""""""""

सावन में साजन घर आवें इस सावन रूठे सजन हमार
मोर संग नाँच रही मोरनी तन में रिमझिम पड़े फुहार

सजन बिना सावन यह सूना का से करूं मै गुहार
स्वाति बूँद को पपिहा तरसे पीऊ पीऊ रहा पुकार
सगरो दिन सखियन संग कटता रात न कटे हमार
पिया बिना यह सेज है सूनी आंखि न लगय हमार

रूठि पिया का हमसे चले गये रूठि गवा सगरो संसार
सावन में साजन घर आवें इस सावन रूठे सजन हमार


घन घमंड कर गरजे जोर छाया अन्धकार सब ओर
बिजुली चमक रही नभ भीतर जियरा में उठे हिलोर
सावन बीति गवा बिनु साजन भादों रात चढ़ी है घोर
हर रात अमावास जैसी लागे रूठा मुझसे मोर चकोर

अँखियाँ गयीं पथरा ये सजनी पिय बाट निहार निहार
सावन में साजन घर आवें इस सावन रूठे सजन हमार

अँखिया बरसा कर सावन बीता ठिठुर ठिठुर कर अगहन
पूष म़ास की ठण्ड बयरिया जला रही विरहन का यौवन
कहिगे थे जल्दी आवे का सखि निकर गये वो सौ योजन
दरश की आस खुली रहिहै अँखियाँ निर्जीव होइ जाई तन

"संदोह"पिया नही तुमरे आइहिहे अब मानो बात हमार
सावन में साजन घर आवें इस सावन रूठे सजन हमार

अंखियन झाई रोय रोय पड़ गयी सूख गयी इनकी जलधार
जिभिया छाला बहुत पड़े है सखि पहुची फिर भी नाहि गुहार
घायल की गति घायल जाने सखि का जग से करूं मनुहार
कहती मौत खड़ी द्वारे हँसि,,,,,,, अब आवहु तुम गोद हमार

पाती पिय के नाम छोड़ कर छोड़ि रहिन हम ई संसार
सावन में साजन घर आवें इस सावन रूठे सजन हमार


चिदानंद शुक्ल (संदोह )

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