09 अक्तूबर, 2013

देश-विदेश में दशहरे की धूम

भगवान राम की रावण का विजय का पर्व दशहरा पूरे देश में पूरे धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। आज भी दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। आज भी उस दिन की याद दिलाता है जब श्रीराम ने रावण को मार कर इस इस धरती को उसके अत्याचार मुक्त कराया था। दशहरा मनाने की परंपरा सदियों से हमारे देश में चली आ रही है। दशहरा को विजयादशमी भी कहतें हैं। भगवान श्री राम की विजय के रूप में मनाया जाए या दुर्गा पूजा के रूप में, दोनों ही रूपों में यह शक्ति पूजा अराधना का उत्सव रहा है।

दशहरा पर्व भारत में ही नहीं बल्कि भारत के बाहर विश्व के अनेक देशों में हर्षो उल्लास के साथ मनाया जाता रहा है। भारत में विजयादशमी का पर्व देश के कोने कोने में बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है।यहां मैसूर का दशहरा, कूल्लू का दशहरा, दक्षिण भारत में तथा इसके अतिरिक्त उत्तर भारत, बंगाल इत्यादि में विजयादशमी के त्यौहार को बडे़ पैमाने पर मनाया जाता है। यहाँ का दशहरा बस देखते ही बनता है।

कुल्लू का दशहरा

हिमांचल के कुल्‍लु का दशहरा पूरे देश में प्रसि‍द्ध है। इसे अलग और अनोखे अंदाज़ में मनाया जाता है। आश्विन मास की दसवीं तारीख को इसकी शुरुआत होती है। कुल्लू का दशहरा पर्व, परंपरा, रीतिरिवाज़ की दृष्टि से ऐतिहासिक महत्व रखता है। जब पूरे भारत में विजयादशमी की समाप्ति होती है उस दिन से कुल्लू की घाटी में इस त्योहार का रंग देखते ही बनता है। स्त्रियाँ, पुरुष सभी रंग-विरंगे वस्त्रों से सुसज्जित होकर अपने वाद्य यंत्रों के साथ बाहर निकलते हैं। इस उत्सव के दौरान पहाड़ी लोग अपने ग्रामीण देवता जुलूस निकाल कर धूम धाम से पूजन करते हैं। इन देवताओं के लिए आकर्षक पालकी सजाई जाती है। साथ ही वे अपने मुख्य देवता रघुनाथ जी की भी पूजा करते हैं। नृत्य का प्रदर्शन किया जाता है । इस प्रकार जुलूस बनाकर नगर के मुख्य भागों से होते हुए नगर परिक्रमा करते हैं और कुल्लू नगर में देवता रघुनाथजी की वंदना से दशहरे के उत्सव का आरंभ करते हैं। इस दशहरे की खास बात ये है कि यहां का दशहरा में रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन करके नहीं मनाया जाता। सात दिनों तक चलने वाला यह उत्‍सव हिमाचल के लोगों की संस्‍कृति और धार्मिक आस्‍था का प्रतीक है। उत्‍सव के दौरान भगवान रघुनाथ जी की रथयात्रा निकाली जाती है। उत्सव के छठे दिन सभी देवी-देवता इकट्ठे होकर मिलते हैं जिसे ‘मोहल्ला’ कहते हैं। रघुनाथ जी के इस पड़ाव में सारी रात लोगों का नाचगाना चलता है। सातवे दिन रथ को बियास नदी के किनारे ले जाया जाता है। जहाँ लंकादहन का आयोजन होता है तथा कुछ जानवरों की बलि दी जाती है।

सन 1660 में यहां पहली बार दशहरा आयोजित किया गया था। कहा जाता है कि कुल्लू में विजयदशमी के पर्व मनाने की परंपरा राजा जगत सिंह के समय से मानी जाती है। कहा जाता है कि एक बार राजा जगत सिंह, को पता चलता है कि पास के एक गाँव में एक ब्राह्मण के पास बहुत कीमती रत्न है, तो राजा के मन में उस रत्न को पाने की इच्छा उत्पन्न होती है और व अपने सैनिकों को उस ब्राह्मण से वह रत्न लाने का आदेश देता है। सैनिक उस ब्राह्मण को अनेक प्रकार से उसे सताते हैं। इन यातनाओं से मुक्ति पाने के लिए वह ब्राह्मण परिवार समेत आत्महत्या कर लेता है। परंतु मरने से पहले वह राजा को श्राप देकर जाता है । इस श्राप के वजह से कुछ दिन बाद राजा का स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है। तब एक संत राजा को श्रापमुक्त होने के लिए रघुनाथजी की मूर्ति लगवाने को कहता है। रजा रघुनाथ जी की मूर्ति लगवाता है। रघुनाथ जी कि इस मूर्ति के कारण राजा धीरे-धीरे ठीक होने लगता है। राजा ने स्वयं को भगवान रघुनाथ को समर्पित कर दिया तभी से यहाँ दशहरा पूरी धूमधाम से मनाया जाने लगा।

मैसूर का दशहरा

कहतें हैं कि मैसूर का दशहरा नहीं देखा तो क्या देखा? यह दशहरा भारत में ही नहीं विश्व में प्रसिध्द है। पहले इसे 'नवरात्रि' के नाम से ही जाना जाता था लेकिन वाडेयार राजवंश के लोकप्रिय शासक कृष्णराज वाडेयार के समय में इसे दशहरा कहने का चलन शुरू हुआ। यहां विजयादशमी के अवसर पर शहर की रौनक देखते ही बनती है शहर को फूलों, दीपों एवं बल्बों से सुसज्जित किया जाता है सारा शहर रौशनी में नहाया होता है जिसकी शोभा देखने लायक होती है। वर्तमान में इस उत्सव की लोकप्रियता देखकर कर्नाटक सरकार ने इसे राज्योत्सव का सम्मान प्रदान किया है।

राजा वाडेयार की इच्छा थी कि इस उत्सव को आने वाली पीढ़ियाँ याद रखें तथा उसी प्रकार से मनाएँ, जिस प्रकार विजयनगर के शासक मनाया करते थे। अत: इसके लिए उन्होंने निर्देशिका भी तैयार की थी, जिसमें लिखा था कि किसी भी कारण से दशहरा मनाने की परंपरा टूटनी नही चाहिए। कहा जाता है कि दशहरे से ठीक एक दिन पहले जब राजा के पुत्र नंजाराजा की मृत्यु हो गई थी परंतु तब भी राजा वाडेयार ने बिना किसी अवरोध के ‘दशहरा उत्सव’ का आयोजन किया और परंपरा को कायम रखा । उनके बाद वाडेयार राजघराने के वंशजों ने भी जीवित रखने की कोशिश जारी रखी। इस मौके पर भव्य जुलूस निकाला जाता है, जिसमें बलराम के सुनहरी हौदे पर सवार हो चामुंडेश्वरी देवी मैसूर नगर भ्रमण के लिए निकलती हैं। वर्ष भर में यह एक ही मौका होता है, जब देवी की प्रतिमा यूं नगर भ्रमण के लिए निकलती है।

पंजाब का दशहरा

पंजाब में दशहरा नवरात्रि के नौ दिन का उपवास रखकर मनाते हैं। इस दौरान यहां आगंतुकों का स्वागत पारंपरिक मिठाई और उपहारों से किया जाता है। अष्टमी और नवमी के दिन मां दुर्गा जी की उपासना की जाती है। यहां भी रावण-दहन के आयोजन होते हैं व मैदानों में मेले लगते हैं।

बस्तर का दशहरा

बस्तर में दशहरे मां दंतेश्वरी की पूजा का विधान है। यह पर्व उनको ही समर्पित है। माँ दंतेश्वरी यहाँ के निवासियों की आराध्य देवी हैं, जो दुर्गा का ही एक रूप हैं। बस्तर में दशहरा का त्यौहार श्रावण मास की अमावस से आश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है। इसका समापन ओहड़ी पर्व से किया जाता है।

बंगाल का दशहरा

यह बंगालियों का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। बंगाल में यह पर्व दुर्गा पूजा के रूप में ही मनाया जाता है। यह पूरे बंगाल में पांच दिनों के लिए मनाया जाता है। यहां देवी दुर्गा को भव्य सुशोभित पंडालों विराजमान करते हैं। इसके साथ अन्य देवी-देवताओं की भी कई मूर्तियां बनाई जाती हैं। त्योहार के दौरान शहर में छोटे-मोटे स्टाल भी मिठाइयों से भरे रहते हैं। यहां षष्ठी के दिन दुर्गा देवी का बोधन, आमंत्रण एवं प्राण प्रतिष्ठा आदि का आयोजन किया जाता है। षष्ठी के दिन दुर्गा जी का पूजन एवं प्राण प्रतिष्ठा आदि का आयोजन किया जाता है इसके उपरांत सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी के दिन प्रातः और सायंकाल दुर्गा पूजा होती है दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।

ओडिशा और असम का दशहरा

यहां भी पर्व दुर्गा पूजा के रूप में ही मनाया जाता है,यहाँ इसे चार दिन तक मनाया जाता है। बंगाल के दशहरे की तरह स्त्रियां देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं, और एक दूसरे को सिंदूर लगाती हैं एक प्रकार से सिंदूर की होली खेली जाती है। इसके पश्चात देवी की प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है।

तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक का दशहरा

तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में दशहरा नौ दिनों तक चलता है जिसमें तीन देवियां लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की पूजा की जाती है। पहले तीन दिन लक्ष्मी-धन और समृद्धि की देवी का पूजन होता है। अगले तीन दिन सरस्वती देवी की अर्चना की जाती है और अंतिम दिन देवी दुर्गा-शक्ति की देवी की पूजा की जाती है। यहां दशहरा शिक्षा या कोई भी नया कार्य जैसे संगीत और नृत्य सीखने के लिए शुभ समय होता है।

महाराष्ट्र में दशहरा

महाराष्ट्र में दशहरे को नवरात्रि कहतें हैं। ये पर्व माँ दुर्गा को समर्पित होता है। दसवें दिन माँ सरस्वती की पूजा कि जाती है। किसी भी चीज को प्रारंभ करने के लिए खासकर विद्या आरंभ करने के लिए यह दिन काफी शुभ माना जाता है। महाराष्ट्र के लोग इस दिन विवाह, गृह-प्रवेश एवं नये घर खरीदने का शुभ मुहूर्त मानतें हैं।

गुजरात का दशहरा

गुजरात में भी दशहरे को नवरात्र के रूप में मनाया जाता है। नवरात्र के नौ दिनों तक यहां पारंपरिक नृत्य गरबा की धूम होती है। रंगीन घड़ा देवी का प्रतीक माना जाता है और इसको कुंवारी लड़कियां सिर पर रखकर एक लोकप्रिय नृत्य करती हैं जिसे गरबा कहा जाता है।

नेपाल, मॉरीशस में दशहरा

जैसे दशहरा भारत में हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है वैसे ही कई अन्य देशों जैसे इंडोनेशिया, मलेशिया, श्रीलंका, चीन और थाइलैंड के अलावा दूनिया के दूसरे देशों में भी मनाया जाता है। विजयादशमी नेपाल में बहुत बडे़ स्तर पर मनाया जाता है। यहां यह वर्ष का सबसे बड़ा त्यौहार होता है। माँ काली तथा माँ दुर्गा की पूजा नौ दिनों तक की जाती है। विजयादशमी वाले दिन राज दरबार में राजा प्रजा को अबीर, चावल, दही का टीका लगाते हैं।

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