30 दिसंबर, 2013

2013 में खोई ताकत पाने में जुटी रही बसपा

उत्तर प्रदेश विधानसभा में प्रमुख विपक्षी दल बहुजन समाज पार्टी (बसपा) वर्ष 2013 में पूरे साल सियासी नक्शे पर अपनी खोई ताकत पाने की कोशिश में जुटी रही। पार्टी ने कभी सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले को फिर से आगे बढ़ाया, तो कभी रैली में भारी भीड़ जुटाकर विरोधी दलों को परेशान किया। 

 इन प्रयासों के बीच उसे कोई सफलता तो हाथ नहीं लगी, लेकिन वर्ष बीतते-बीतते मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान व दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों ने उसको जरूर झटका दे दिया। इसके साथ ही भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों को लेकर बसपा के कई नेताओं को जूझते रहना पड़ा।

करीब डेढ़ दशक के लंबे अंतराल बाद प्रदेश में पहली पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा को वर्ष 2012 में राज्य की सत्ता से बाहर होना पड़ा था। इस पराजय ने बसपा को जो दर्द दिया, उससे उबरने की कोशिशों में वर्ष भर जुटी रही।

वर्ष के शुरू में रसोई गैस सिलेंडर, पेट्रोलियम पदार्थो की कीमतों तथा रिटेल में एफडीआई को मंजूरी जैसे मुद्दों पर केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार को समर्थन पर पुर्नविचार का ऐलान करके बसपा प्रमुख मायावती ने देश की सियासत में अचानक गरमाहट पैदा कर लोगों का ध्यान खींचा था।

इस मुद्दे पर राजधानी लखनऊ में आयोजित रैली में भारी भीड़ जुटाकर उसने राज्य की सत्ताधारी समाजवादी पार्टी (सपा) को सोचने को मजबूर कर दिया था। लेकिन इन सबका बसपा के राजनीतिक कद पर कोई असर नहीं पड़ सका। सोशल इंजीनियरिंग के जिस उपाय पर बसपा ने प्रदेश में बहुमत की सरकार बनाई थी, उसी फार्मूले पर फिर से लौटने का बसपा प्रमुख मायावती ने फैसला लिया है।

राज्य में लोकसभा चुनाव की मजबूत जमीन तैयार करने के लिए प्रदेश के तमाम जिलों में ब्राह्मण सम्मेलनों की बड़ी श्रंखला का आयोजन किया गया। जिला स्तर के सम्मेलनों के बाद राजधानी लखनऊ में आयोजित ब्राह्मण महासम्मेलन की मुख्य अतिथि मायावती रहीं।

उन्होंने ब्राह्मणों के साथ-साथ अन्य अगरों को भी पार्टी से जोड़ने का ऐलान किया। इसके लिए मायावती ने ब्राह्मण सम्मेलनों की तरह अन्य जातियों के भी सम्मेलन आयोजित करने की बात कही। इस बीच अदालत द्वारा जाति सम्मेलनों पर रोक लगा दिये जाने के कारण बसपा को अपने कदम वापस खींचने पड़े।

इतना ही नहीं, अदालत के निर्देशों को गंभीरता से लेते हुए मायावती ने आपसी भाईचारा कमेटियों को खत्म करने और उन्हें पार्टी संगठन में विलय करने तक का फरमान जारी कर दिया था, लेकिन बाद में अदालत के निर्णय का मंथन करने के बाद भाईचारा कमेटियों को समाप्त किए जाने के फैसले को अमलीजामा नहीं पहनाया गया।

अपनी राजनीतिक जमीन फिर से हासिल करने के लिए परेशान मायावती लोकसभा उम्मीदवारों के चयन को लेकर बेहद सतर्क रहीं और प्रत्याशी के रिपोर्ट कार्ड में गड़बड़ी नजर आने पर उन्हे बदलने में जरा भी देर नहीं की।

रायबरेली, एटा, कन्नौज, आगरा, बहराइच, कैराना, अलीगढ़, हमीरपुर, सलेमपुर, देवरिया, गोरखपुर सहित डेढ़ दर्जन सीटों पर उम्मीदवारों को बदला गया। नौकरानी की हत्या की साजिश में फंसे पार्टी के बाहुबली सांसद धनंजय सिंह की उम्मीदवारी को भी साल जाते-जाते पार्टी को वापस लेनी पड़ी।

राज्यों के निराशाजनक चुनावी नतीजों के बाद बसपा प्रमुख ने अपने जन्मदिन 15 जनवरी 2014 को बड़ी रैली का ऐलान करके पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश की है, ताकि लोकसभा चुनाव में खोई ताकत वापस लाई जा सके। 

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