13 फ़रवरी, 2016

खलनायकी को नया आयाम देने वाले प्राण के जन्मदिन पर विशेष




”वो आवाज़ का जादू या गर्मी हो लहजे की, वो अन्दाज़ निराला हो या चमक हो चेहरे की, हम किसको करेँ याद और किसको भुलाएँ, तुम्हेँ देखते हैँ जितना, उतना तुम्हेँ चाहेँ” किसी की कही लाईनें प्राण साहब पर खूब जमती हैं। हिन्दी फिल्मों के जाने-माने अभिनेता प्राण का जिक्र आते ही आंखों के सामने एक ऐसा आकृति उभर कर आती है जो अपने हर किरदार में जान डाल देता था। हर किरदार उसके अभिनय से के रंग में नहा कर हकीकत का रूप लेकर खड़ा हो जाता है। हिन्दी फिल्मों के एक लोकप्रिय खलनायक और शानदार चरित्र अभिनेता प्राण की संवाद अदायगी की विशिष्ट शैली को लोग कभी नहीं भूल सकते। सैकड़ों फिल्मों में अपने दमदार और ‘कातिलाना’ अभिनय से नकारात्मक भूमिका में भी प्राण फूंकने वाले अभिनेता प्राण का आज जन्मदिन है।

प्राण का जन्म 12 फरवरी 1920 को दिल्ली में हुआ था। उनके पिता एक सरकारी कॉन्ट्रेक्टर थे और व्यापक दौरे किया करते थे। फील्ड में रहा करते थे। लिहाजा प्राण का सबसे ज्यादा लगाव अपनी मां से था। मां ने उनका काफी ख्याल रखा। उनकी एक लाड़ले बेटे की तरह देखरेख की। प्राण का पढ़ाई में मन ज्यादा नहीं लगता था। पढ़ाई उन्होंने मैट्रिक तक की। उसके बाद वे पढ़े नहीं। बतौर फोटोग्राफर लाहौर में अपना करियर शुरु करने वाले प्राण को 1940 में ‘यमला जट’ नामक फिल्म में पहली बार काम करने का अवसर मिला। उसके बाद प्राण ने पीछे नहीं देखा।

इसके बाद प्राण ने ‘चौधरी’ और फिर ‘खजांची’ में काम कियाजल्द ही प्राण लाहौर फिल्म उद्योग में खलनायक के तौर पर स्थापित हो गए। यह वह दौर था जब फिल्म जगत में अजित, के एन सिंह जैसे खलनायक मौजूद थे। प्राण 1942 में बनी ‘खानदान’ में नायक बन कर आए और इस फ़िल्म इनकी नायिका बनी नूरजहां। वर्ष 1947 में भारत आजाद हो गया। प्राण लाहौर से मुंबई आ गए। यहां उन्हें काफी संघर्ष करने के बाद उन्हें बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘जिद्दी’ मिली। अभिनय का सफर शुरू हो गया। 350 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय करने वाले प्राण साहब एक ‘राम और श्याम’ के खलनायक का ऐसा किरदार निभाया जिसे देख कर हर कोई उनसे घृणा करने लगे। ‘उपकार’ के मंगल चाचा की भूमिका भी है, जिसे दर्शकों का बेइंतहा प्यार और सम्मान मिला। वहीँ जंजीर में प्राण ने दोस्ती की एक नयी मिशाल पेश की। उपकार, आँसू बन गये फूल और 1973 में प्राण को बेईमान फिल्म में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के लिये फिल्म फेयर अवार्ड दिया गया।

दर्शकों के बीच दमदार अभिनय की छाप छोड़ने वाले प्राण के बारे में बहुत कम लोगों को पता है कि वह अभिनेता नहीं, बल्कि एक फोटोग्राफर बनना चाहते थे, लेकिन भाग्य ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था। प्राण की फिल्मों में आने की कोई योजना नहीं थी। हुआ यूं कि एक बार लेखक मोहम्मद वली ने प्राण को एक पान की दुकान पर खड़े देखा, उस समय वह पंजाबी फिल्म ‘यमला जट’ के निर्माण की योजना बना रहे थे। पहली ही नजर में वली ने यह तय कर लिया कि वह अपनी इस फिल्म में प्राण को लेंगे, फिर क्या था.. उन्होंने प्राण को फिल्म के लिए राजी कर लिया। फिल्म ‘यमला जट’ 1940 में प्रदर्शित हुई और काफी हिट भी रही और इसके बाद तो प्राण ने फिर कभी पलटकर नहीं देखा। प्राण ने 1948 से 2007 तक सहायक अभिनेता के तौर पर काम किया, वह बॉलीवुड के ऐसे अभिनेता हैं, जिन्हें मुख्यत: खलनायक की भूमिका के लिए जाना जाता है।

प्राण ने शुरुआत में 1940 से 1947 तक नायक के रूप में फिल्मों में अभिनय किया। इसके अलावा खलनायक की भूमिका 1942 से 1991 तक जारी रखी। इसके बाद प्राण ने कई और पंजाबी फिल्मों में काम किया और लाहौर फिल्म जगत में सफल खलनायक के रूप में स्थापित हो गए। लाहौर फिल्म उद्योग में एक नकारात्मक अभिनेता की छवि बनाने में कामयाब हो चुके प्राण को हिंदी फिल्मों में पहला ब्रेक 1942 में फिल्म ‘खानदान’ से मिला। इस फिल्म की नायिका नूरजहां थीं। देश के बंटवारे के बाद प्राण ने लाहौर छोड़ दिया और मुंबई आ गए। लाहौर में प्राण तब तक फिल्म जगत का एक प्रतिष्ठित नाम बन चुके थे और नामचीन खलनायकों में शुमार हो गए थे, लेकिन हिंदी फिल्म जगत में उनकी शुरुआत आसान नहीं रही। मुंबई में उन्हें भी किसी नवोदित कलाकार की तरह ही संघर्ष करना पड़ा।

प्राण ने 18 अप्रैल 1945 को शुक्ला आहलुवालिया से शादी की। उनके तीन बच्चे हैं। दो लड़के अरविंद व सुनील और एक लड़की पिंकी है, जिनके साथ वह मुंबई आए। आज की तारीख में उनके परिवार में 5 पोते-पोतियां और 2 पड़पोते भी हैं। खेलों के प्रति प्राण का प्रेम सभी को पता है। 50 के दशक में उनकी अपनी फुटबॉल टीम ‘डायनॉमोस फुटबॉल क्लब’ काफी लोकप्रिय रही है। हास्य अभिनेता किशोर कुमार और महमूद के साथ वाली उनकी कई फिल्में भी काफी पसंद की गईं। किशोर कुमार के साथ फिल्म ‘नया अंदाज’, ‘आशा’, ‘बेवकूफ’, ‘हाफ टिकट’, ‘मन मौजी’, ‘एक राज’, ‘जालसाज’ जैसी यादगार फिल्में हैं तो महमूद के साथ ‘साधु और शैतान’ व ‘लाखों में एक’ काफी चर्चित रहीं। नब्बे दशक की शुरुआत से वह फिल्मों में अभिनय के प्रस्ताव को बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य के चलते अस्वीकार करने लगे, लेकिन वह करीबी अमिताभ बच्चन के घरेलू बैनर की फिल्म ‘मृत्युदाता’ और ‘तेरे मेरे सपने’ में नजर आए।

तिरछे होंठो से शब्दों को चबा-चबा कर बोलना ,सिगरेट के धुंओं का छल्ले बनाना और चेहरे के भाव को पल -पल बदलने में निपुण प्राण ने उस दौर में खलनायक को भी एक अहम पात्र के रूप में सिने जगत में स्थापित कर दिया । खलनायकी को एक नया आयाम देने वाले प्राण के पर्दे पर आते ही दर्शको के अंदर एक अजीब सी सिहरन होने लगती थी। प्राण की अभिनीत भूमिकाओं की यह विशेषता रही है कि उन्होंने जितनी भी फिल्मों मे अभिनय किया उनमें हर पात्र को एक अलग अंदाज में दर्शकों के सामने पेश किया । रुपहले पर्दे पर प्राण ने जितनी भी भूमिकाएं निभायी उनमें वह हर बार नये तरीके से संवाद बोलते नजर आये। खलनायक का अभिनय करते समय प्राण उस भूमिका में पूरी तरह डूब जाते थे ।

प्राण अकेले ऐसे अभिनेता हैं, जिन्होंने कपूर खानदान की हर पीढ़ी के साथ काम किया। चाहे वह पृथ्वीराज कपूर हो, राजकपूर, शम्मी कपूर, शशि कपूर, रणधीर कपूर, राजीव कपूर, करिश्मा कपूर, करीना कपूर। सदी के खलनायक प्राण की जीवनी भी लिखी जा चुकी है। उसका शीर्षक ‘प्राण एंड प्राण’ रखा गया है। पुस्तक का यह शीर्षक इसलिए रखा गया है कि प्राण की ज्यादातर फिल्मों में उनका नाम सभी कलाकारों के पीछे लिखा हुआ आता था। कभी-कभी उनके नाम को इस तरह पेश किया जाता था ‘अबव ऑल प्राण’। प्राण सिकंद को सन् 2001 में भारत सरकार ने कला क्षेत्र में पद्मभूषण से सम्मानित किया। फिल्म ‘उपकार’ (1967), ‘आंसू बन गए फूल’ (1969) और ‘बेईमान’ (1972) के लिए प्राण को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। 1997 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट खिताब से भी नवाजा गया। सन् 2013 में उन्हें फिल्म जगत के सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के सम्मान भी प्रदान किया गया।

जीवन के आखिरी सालों में प्राण व्हील चेयर पर आ गए थे। सन् 1998 में प्राण में दिल का दौरा पड़ा था। उस समय वह 78 साल के थे, फिर भी मौत को उन्होंने पटकनी दे दी थी, लेकिन 12 जुलाई, 2013 को वह हम सबको अलविदा कह गए। प्राण भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपने दमदारा अभिनय के कारण वह हमेशा दर्शकों के जेहन में जिंदा रहेंगे।

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