नेपाल में विनाशकारी भूस्खलन के 2 साल बाद भी जीने की जंग जारी


दो साल पहले तक मध्य नेपाल के एक गांव में रहने वाले मान बहादुर तमांग को घर और खेती की जमीन का मालिक होने का गर्व था। लेकिन पहाड़ी की ढलान वाले क्षेत्र में हुए विनाशकारी भूस्खलन में उनका सब कुछ तबाह हो गया। इस त्रासदी में 156 लोगों की मौत हुई थी। भारी बारिश के कारण 2 अगस्त, 2014 को इस क्षेत्र में विनाशकारी भूस्खलन हुआ था। इसके चलते नेपाल के सिंधुपालचोक जिले में सुनकोशी नदी में कृत्रिम झील बन गई थी और चीन से जोड़ने वाला अरनिको राजमार्ग करीब पांच किलोमीटर तक टूट गया था।

इस भूस्खलन में तमांग का सब कुछ खत्म हो गया। घर के साथ उसकी जीविका की एक मात्र साधन जमीन भी खत्म हो गई। नजदीक के जंगल से बांस की गठरी सिर पर ले जा रहे तमांग (63) ने कहा, "पर्याप्त खेती की जमीन के मालिक से मैं जीविका चलाने के लिए दैनिक मजदूरी करने वाला मजदूर बन गया हूं। इसी कमाई से अपना छोटा परिवार चलाता हूं।" भूस्खलन से सुनकोशी नदी की धारा अवरुद्ध हो गई थी और एक कृत्रिम झील बन गई थी। इसके चलते एक जल विद्युत संयंत्र भी पानी में डूब गया था। चीन से जोड़ने वाले राजमार्ग को पांच किलोमीटर तक टूटने से प्रतिदिन चार लाख डॉलर का नुकसान हुआ था। यह राजमार्ग 45 दिनों तक बंद रहा था।

सुनकोशी नदी में कृत्रिम झील बनने से बिहार में भी दहशत फैल गई थी, क्योंकि अवरोध से बांध के पीछे अचानक बनी झील को विस्फोट से उड़ाने की स्थिति में नेपाल ने बाढ़ के खतरे की चेतावनी दी थी। भूस्खलन में अपने परिजनों और घर खोने वाले मनखा गांव के 78 वर्षीय जीत बहादुर तमांग ने कहा, "हमारे गांव की बात छोड़ दें, भूस्खलन ने कोदी नदी की प्रवाह, भू-परिदृश्य और खेती की जमीन को बदल दिया।" मनखा गांव में दर्जनों घरों या तो दफन हो गए या फिर ध्वस्त हो गए।

काठमांडू, नेपाल के उत्तरी जिलों और चीन सीमा को जोड़ने वाला अरनिको राजमार्ग के निकट भूस्खलन के मलबे आज भी उस त्रासदी की गवाही दे रहे हैं। मलबे से कुछ दूरी पर नल से पानीपीते समय जीत बहादुर तमांग ने कहा, "मैंने अपना सब कुछ खो दिया। बुढ़ापा में अकेला रह रहा हूं। मेरी देखभाल करने वाला करने वाला कोई नहीं है। भूस्खलन के बाद सरकार जीने के लिए राशन देती है।" भूस्खलन से पहले जीत बहादूर तमांग पूर्णत: खेती पर निर्भर थे। लेकिन भूस्खलन में उनकी खेती की जमीन भी खत्म हो गई। अब उन्हें जीने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

जीत बहादुर ने कहा, "मैं अब एक भूमिहीन मजदूर हूं और चल रही सरकारी परियोजनाओं में मजदूरों के लिए काम पर निर्भर हूं।" अन्य परिवारों के साथ तमांग ने भी रहने के लिए टिन और बांस की झोपड़ी बनाई है। उन्हें उम्मीद है कि सरकार जल्द उन लोगों के लिए घर बना देगी। भूस्खलन का पीड़ित युवक लंका लामा भी है। लामा का भी परिवार कभी खेती पर आश्रित रहा करता था, लेकिन उस त्रासदी में उसका भी सब कुछ खत्म हो गया।

लंका लामा ने कहा, "सरकार को हमलोगों के लिए घर अभी बनाना है। लेकिन आपदा में बचे हमारे जैसे लोगों को जीने के लिए सरकार ने कभी पैसे नहीं दिए।" लामा काठमांडू में ड्राइवर का काम करता है और उसके परिवार के अन्य लोग भी काम करते हैं। लामा ने कहा कि त्रासदी में बचे कई लोग कई लोग जीविका की तलाश में नजदीक के शहरों में और कुछ काठमांडू चले गए।

लामा की दादी सुकु माया ने कहा, "भूस्खलन के बाद हमलोगों को जीने के लिए संघर्ष करना पड़ा था और आज भी कर रही हूं। हमारा भविष्य अनिश्चित है। हमलोग अपनी अगली पीढ़ी को लेकर चिंतित हैं कि वे भय के माहौल में यहां कैसे रहेंगे।" काडमांडू स्थित अंतर्राष्ट्रीय समकेतिक पर्वत विकास केंद्र (आईसीआईएमओडी) के विशेषज्ञों के अनुसार, भारी वर्षा के कारण करीब दो किलोमीटर तक मिट्टी, कीचड़ और चट्टान ढीले पड़ गए थे और पहाड़ी से अलग होकर जुरे गांव की ओर घिसक गए। मलबों से गांव का एक बड़ा भाग पूर्णत: नष्ट हो गया।

आईसीआईएमओडी के विशेषज्ञ अरुण. बी. श्रेष्ठ ने कहा, "इस तरह की प्राकृतिक आपदा को हमलोग नियंत्रित नहीं कर सकते हैं, लेकिन जीविका के साधनों और आधारभूत संरचनाओं पर पड़ने वाले इसके प्रतिकूल प्रभावों को कम किया जा सकता है।"

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